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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

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   ललित निबंध

 

ऋद्धि और सिद्धि


गोपालराम गहमरी

 

र्थ या धन अलाउद्दीन का चिराग है । यदि यह हाथ में है, तो तुम जो चाहों सो पा सकते हो। यदि अर्थ अधिपति हो, तो बज्र मूर्ख होने पर भी विश्वविद्यालय तुम्हें डी.लिट. की उपाधि देकर अपने तईं सभ्य समझेगा। तुम्हारी रचना में चाहे व्याकरण की जितनी अशुद्धियाँ होंगी, साहित्यिक लोग उसे इस समय का आर्ष-प्रयोग या आदर्श लेख कहकर मानेंगे। तुम अकल के रासभ या बुद्धि के बैल हो, तो भी अर्थ के माहात्म्य से लोग तुमको विलक्षण बुद्धि- सम्पन्न या प्रतिभा का अवतार कहकर आदर करेंगे । लक्ष्मी की कृपा से तुम्हारें गौरव की सीमा नहीं रहेगी। तुम्हारे चारों ओर अनेक ग्रह, उपग्रह आ जुटेंगे, और तुमको केन्द्र बनाकर एक नया सौर-जगत रच डालेंगे तथा तुम उनके बीच में मार्तण्डरूप होकर विराजोगे। विश्वविद्याद्वेषी खुशामदी तुमको घेरे हुए तुम्हारे धूर्त आत्मीय स्वजन तुमको पग-पग पर ठगा करेंगे। धोखेबाज तुम्हारे कृती पुत्र को उल्लू बनाकर उससे उनके हैण्डनोट कटाया करेंगे । तुम्हारे अविद्या-मन्दिर में बड़ी धूमधाम से बन्दर का ब्याह और भूतों के बाप का श्राद्ध होगा।

 

बहरे पर चलने वाला नट हाथ में बाँस लिये हुए बरहे पर दौड़ने के समय हाय पैसा, हाय पैसा करके चिल्लाया करता है।  दुनिया के सभी आदमी वैसे ही नट हैं। मैं दिव्य दृष्टि से देखता हूँ कि खुद पृथ्वी भी अपने रास्ते पर हाय पैसा, हाय पैसा करती हुई सूर्य की परिक्रमा कर रही है। अभी ज्योतिर्विद लोग इस सिद्धान्त पर नहीं पहुँच सके हैं, क्योंकि अर्थ का खिंचाव ही विश्व-ब्रह्माण्ड का मध्याकर्षण है। उनके यह समझने में अभी देर है।

 

विज्ञानाचार्य सर जगदीशचन्द्र बसु ने साबित किया है कि धातुओं में प्राण है। बस, उनकी बुद्धि-गवेषणा की दौड़ यहीं तक है। पर मेरी गवेषणा से यह पक्का सिद्धान्त हो चुका है कि ताँबा, सोना, चाँदी में केवल जीवनी शक्ति ही नहीं, उनमें ऐसी अद्भुत शक्ति है कि जिसके बल से वे सब विश्व-ब्रह्माण्ड को चरखी पर नचा रहे हैं।

 

काल-महात्म्य और दिनों के फेर से ऐश्वर्यशाली भगवान् ने तो अब स्वर्ग से उतरकर दरिद्र के घर शरण लिया है और उनके सिंहासन पर अर्थ जा बैठा है। इसी से अब सबके मुँह से अकेले अर्थ की ही अपार महिमा सुनी जाती है। अर्थ ही इस युग का परब्रह्म है। इस ब्रह्मवस्तु के बिना विश्व-संसार का अस्तित्व नहीं रह सकता। यही चक्राकार चैतन्यरूप कैश-बाक्स (Cash Box) में प्रवेश करके संसार को चलाया करता है। यही ब्रह्म-पदार्थ व्यक्त और अव्यक्त रूप से सृष्टि, स्थिति, प्रलय का कारण-स्वरूप है। जगत् का आधुनिक इतिहास सहस्त्रमुख होकर इसकी महिमा गाता है। साधकों के हित के लिए अर्थ-नीति शास्त्र में इसकी उपासना की विधि लिखी गई है। जगत् के सब जीव और सब जातियाँ ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग द्वारा इस ब्रह्म-वस्तु की साधना करके सिद्धि लाभ करने की चेष्टा करती हैं।

 

यहाँ कुछ योगशास्त्र की बात आ पड़ी। बच्चों की पहली पोथी में लिखा है- बिना पूछे दूसरे का माल लेना चोरी कहलाता है। लेकिन कहकर जोर से दूसरे का धन हड़प लेने से क्या कहलाता है, यह उसमें नहीं लिखा। मेरी राय में यही कर्मयोग का मार्ग है।

 

सुना जाता है कि कितने ही नामी लोग चोरी और डकैती करके अपने घर की गहरी नींव जमा गए हैं । उनके अनेक बंशधरों ने इस समय अनेक खिताब और तमग़े पाए हैं और वे अफसरों के साथ हाथ मिलाया करते हैं। इस तरह कर्मयोग से जो ऋद्धि मिलती है, वह सभी देशों के इतिहास पढ़ने से जानी जाती है।

 

अर्थ चारों वर्गों में प्रधान वर्ग है। बाक़ी तीन इसी के पीछे-पीछे आया करते हैं। इस कारण अब रूपप्रधान वर्ग पाने के लिए ही जितनी बन सके, साधना दरकार है। अधिकारी भेद से इन सब साधनाओं के प्रकार-भेद हैं। एक प्रकार की साधना में हजार बार निन्यानवे के धक्के खा सकने पर लखपती हुआ जा सकता है।

 

निरामिष वैष्णव मत से भी अर्थ की साधना हो सकती है। वैष्णव धर्म मितव्ययी का धर्म है। इसी कारण वैष्णव के देवता तुलसी हैं, जिनको पाने में कुछ खर्च की जरूरत नहीं पड़ती। उनके लिए भोग चाहिए एक पैसे का बताशा। विष्णु भगवान् का नाम लेकर चढ़ा देने से ही हो जाता है। इसमें पुरोहित की दक्षिणा या संकल्प-छुड़ाई देने की जरूरत नहीं।

 

मनुष्य समाज में ऐसे भी लोग देखे जाते हैं, जो खुदा के यहाँ से आये हुए मनीआर्डरों को सबको खर्च कर डालते है। अर्थ मानों इन लोगों का रक्त विकार है। इन लोगों को उलूक की तरह आँख रहते भी दिखाई नहीं देता । कान रहते भी यह लोग सुन नहीं सकते ।

 

भारतवासी बहुत दिनों से कर्ममार्ग छोड़कर भक्तिमार्ग में जा पहुँचे हैं। इस देश के साधारण किरानी से लेकर राजा-महाराजा पर्यन्त सभी भक्तिमार्ग के मुसाफ़िर हैं । कोई-कोई सजधजकर उपास्यदेव के मन्दिर में रोज़ जाते और साष्टांग प्रणाम कर आते हैं। कोई अँगरेज़ी, संस्कृत या हिन्दी में तरह-तरह के स्तव-स्तोत्र कहकर इष्टदेव को प्रसन्न किया करते हैं। किन्तु सभी धनं देहि, धनं देहि की रट से कान फोड़े डालते हैं, क्योंकि धन ही सब साधनों की परम सिद्धि है।

 

अर्थ सबके लिए कामना की वस्तु है। किन्तु अर्थ है क्या चीज,यह कोई नहीं समझता । मैंने दैव-गवेषणा द्वारा अद्वैतवाद की सहायता से अर्थ का असल रूप जान लिया है। चराचर विश्व-संसार में अगर कोई एक पदार्थ है, तो वह अर्थ है। अर्थ के सिवाय यहाँ और किसी का अस्तित्व ही नहीं है। अगर तुम अपने को कृति कहते हो, तो अपना केश बाक्स खोलकर दिखाओ। यदि तुम्हारे पास धन है, तो तुममें मनुष्यत्व हो सकता है। दरिद्र के मनुष्यत्व है, यह बात दुनिया में कोई विश्वास नहीं करता। यदि रूप की बात कहो, तो वह तो खाली अर्थ है । धनी का अन्धा लड़का भी चश्मरोशन कहलाता है। अगर तुम कहो कि तुममें भलमनसाहत है, मैं तुम्हारा जेब टटोलकर कह दूँगा कि तुम ठीक कहते हो या नहीं। अलमति विस्तरेण अतएव साबित हुआ कि अर्थ के सिवाय और किसी का अस्तित्व नहीं है। कम समझ द्वैतवादी कह सकते हैं कि अर्थ और भगवान दोनों हैं। पर मैं तो अद्वैतवाद लेकर दुनियाँ में उतरा हूँ, इस कारण मैं दोनों का अस्तित्व नहीं मानूँगा । कहूँगा कि अर्थ ही है, भगवान् नहीं है।

 

गोपालराम गहमरी

 

 

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