मैं इसे कैद क्यों कह रहा हूँ
!
यह इतना बढ़िया गुदगुदे मैट्रेस वाला डबल-बैड,
आरामकुर्सियाँ,
किताबों से अटी पड़ी अल्मारियाँ,
शो-केस,
अटैच्ड बाथरूम,
जिसमें ठण्डे-गर्म
पानी की सुविधा है। सब कुछ साफ-सुथरा।
सब कुछ तो यहाँ है! क्या हुआ जो इस कमरे में समुद्र की
ओर खुलने वाली कोई खिड़की नहीं है। और तो कोई कमी
नहीं। फिर बम्बई जैसे महँगे शहर में तीन-चार
दिनों के लिए इतनी अच्छी तरह से रहने और साथ में खाने-पीने
की सुविधा को मैं कैद कह रहा हूँ?
जिसे मैं कैद कह रहा हूँ कभी सपने में भी कफ परेड जैसे
पॉश इलाके में
20
वीं मंजिल पर इतने आलीशान फ्लैट के गेस्ट रूम में रहने
के बारे में सोच सकता था। क्या मेरी इतनी औकात है कि
मैं इतनी खूबसूरत जगह में आराम से पसरा रहूँ और चाय,
नाश्ता सब कुछ मेरे कमरे में पहुँचा दिया आए और यह सब
सेवा एक ऐसी नौकरानी करे जो मुझसे भी अच्छी अंग्रेजी
बोलती है,
और स्मार्ट तो इतनी है कि कल जब मैं दिन में यहाँ
पहुँचा था और दरवाजा उसी ने खोला था तो मैं उसे खन्ना
अंकल की लड़की रितु ही समझा था और उसे विश भी उसी के
हिसाब से किया था।
कल शाम को तैयार होकर जब कमरे से बाहर निकला तो उस
वक्त आंटी ड्राइंग रूम में फोन पर किसी से बात कर रही
थीं। मैं यही चाह रहा था कि कोई-न-कोई
ड्राइंग रूम में मिल जाए,
नहीं तो फिर किसी को बुलवाने के लिए या तो आवाज देनी
पड़ती या फिर रूबी को ढूँढना पड़ता। आंटी जब तक फोन पर
बात करती रहीं,
मैं वहीं सोफे की टेक लगाए खड़ा रहा। फोन रखते ही जब
वे मुड़ीं तो मुझ पर नजर पड़ी। चेहरा एकदम तुनक नया।
अभी तो फोन पर हँस-हँसकर
बातें कर रही थीं
!
-
क्या बात है मनीश
!
कहीं जा रहे हो क्या! उन्होंने चेहरे की तुनक कम किए
बिना साड़ी की प्लीट्स ठीक करते हुए पूछा था। मैं एकदम
सकपका गया था,
फिर भी हिम्मत जुटाकर बोला था
-
वो सुबह से कमरे में बैठा-बैठा
बोर हो रहा हूँ। इस समय शायद बरसात रूकी हुई है,
सोच रहा था,
कहीं घूम आऊँ।
मैंने जानबूझकर कार और ड्राइवर की बात नहीं की थी।
हल्की-सी उम्मीद थी कि शायद वे खुद ही ड्राइवर को
बुलाकर मुझे घुमा लाने के लिए कह दें। वैसे भी तो आज
दोनों गाड़ियाँ घर पर हैं। सुबह अंकल ही तो बता रहे
थे। आंटी भीतर के कमरे की तरफ मुड़ते हुए बोली थीं
-
भई! यहाँ बरसात का कोई भरोसा नहीं होता। फिर भी जाना
चाहो तो बिल्डिंग के सामने ही बस स्टॉप है। मैरीन
ड्राइव या फाउंटेन वगैरह घूम आओ,
लेकिन डिनर के वक्त तक लौट आना। रूबी को घर जाना होता
है। बाहर जाने का मेरा सारा उत्साह खत्म हो गया था।
लेकिन कमरे में बैठे-बैठे
कुढ़ते रहने से तो यही अच्छा था कि बरसात में ही घूमता
भीगता रहूँ,
यही सोचकर
-
अच्छा आंटी कहकर मैं बाहर आ गया था। लिफ्ट का बटन
दबाने के बाद मैं आँखें मूँदे दीवार के सहारे खड़ा हो
गया था। मुझे बाउजी पर गुस्सा आने लगा था
-
क्यों भेजा उन्होंने मुझे यहाँ अपने वन-टाइम
लँगोटिया यार और इस समय एक बहुत बड़े आदमी
-
कृष्ण गोपाल खन्ना के घर पर ठहरने के लिए?
मैं कहीं भी दस-बीस रूपये वाले होटल वगैरह में ठहर
जाता। वहाँ कम-से-कम
मुझे हर वक्त ज़लील तो न होना पड़ता। मुझे अपने
आउटसाइडर होने का या मेरे छोटेपन का अहसास तो न कराया
जाता और फिर उस हालत में मैं चार दिन के लिए थोड़े ही
आता। इन्टरव्यू वाला दिन और उससे एक दिन पहले यानी दो
दिन की बात होती और फिर मैं सेकेण्ड क्लास से आया हूँ
और वापसी की टिकट भी तो सेकेण्ड क्लास का बुक करवाया
है,
जबकि कम्पनी मुझे दोनों तरफ का फर्स्ट क्लास का किराया
दे रही है। उससे जो पैसा बचता,
वह रहने-खाने के काम आ जाता।
लिफ्ट आ गई थी। मैं नीचे आ गया। सड़क पर आने के बाद
मैंने आस-पास
देखा,
पानी थमा हुआ था लेकिन लोग तेजी से आ-जा
रहे थे। मैंने यह बात सुबह भी नोट की थी,
अब भी देख रहा था कि यहाँ पर लोग और शहरों की तुलना
में ज्यादा तेज चलते हैं,
कहीं देखते नहीं,
बस लपकते से रहते हैं। सुबह चर्चगेट के बाहर तो मैंने
कई औरतों को भागते हुए देखा था। औरतों को इस तरह भागते
देखना सचमुच मेरे लिए एक नया दृश्य था। स्कर्ट पहने
एक बहुत मोटी औरत भागते हुए बहुत ही अजीब लग रही थी।
अभी मुश्किल से मैंने सड़क पार ही की थी कि एक तेज
बौछार ने मुझे पूरी तरह भिगो दिया। लोगों ने फटाफट
अपने फोल्डिंग छाते खोल लिये। मुझे आस-पास
कोई ऐसी जगह नजर नहीं आई जहाँ शरण ले सकता। ऊपर वापस
जाने का कतई मूड न था। नतीजतन भगता हुआ बस-स्टाप की
तरफ ही चलता रहा। मूड और खराब हो गया था। अब घूमने की
भी कोई तुक नहीं थी। तुक तो मुझे पहले ही नजर नहीं आ
रही थी क्योंकि मुझे यहाँ जगहों के सिर्फ नाम ही मालूम
थे,
उनकी दिशा या दूरी का कोई अन्दाज नहीं था। किसी से कुछ
भी पूछना बेकार लगा। बस-स्टाप से पैदल चल पड़ा। यूँ ही
काफी देर तक भटकता और भीगता रहा। भीगना मुझे अच्छा
लगता है,
लेकिन आज भीगने से मूड और भी बिगड़ता चला जा रहा था।
तभी कोलाबा वाली सड़क पर एक अच्छा-सा
बार दिखाई दिया। मुझे इस वक्त अपना अकेलापन काटने का
इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया। बीयर बार में
जा घुसा। बीयर पीते हुए मुझे हमेशा इस बात का अहसास
होता रहता है कि आसपास कोई है जिससे मैं अपने मन की
बातें कह रहा हूँ। हालांकि मैं उस समय बातें खुद से ही
करता हूँ। जो बात किसी से कहने को बेचैन हो रहा होता
हूँ,
किसी के सामने मन की भड़ास निकालना चाहता हूँ तो खुद
से बातें करके बहुत सुकून पाता हूँ। इस वक्त भी मुझे
सुकून की जरूरत थी।
बीयर के दो घूँट भरते ही मैं अन्तर्मुखी हो गया। मेरे
भीतर की सारी सुगबुगाहट बुलबुलों के साथ ऊपर आने लकी।
फिर से सारी चीजें दिमाग पर हावी होने लगीं। खुद पर
गुस्सा आने लगा
-
क्यों ठहरा मैं खन्ना अंकल के घर पर। बाऊजी को कम-से-कम
एक बार तो सोच लेना चाहिए था कि इन पंद्रह-बीस
सालों में उनका दोस्त कितना बदल चुका होगा। ठीक है
उनकी खतो-किताबत
होती रहती है,
लेकिन वह अलग बात है,
और फिर मुझे इस बात से क्या मतलब कि खन्ना पर बाउजी के
कितने अहसान हैं या दोनों बचपन के दोस्त हैं और दोनों
ने मुफलिसी के दिन एक साथ काटे हैं। बाउजी किस तरह
अपनी और खन्ना की दोस्ती के चर्चे किए जा रहे थे। अब
मैं अगर बाउजी को बताऊँ कि जिस दोस्त की उन्होंने अपने
बच्चों का पेट काट कर मदद की थी,
यहाँ तक कि एक बार हम बच्चों के लिए दीवाली पर पटाखे न
खरीदकर उनके लिए बम्बई टिकट तक जुटाया था,
वह आज इतना बड़ा आदमी हो गया है कि उसके पास उसी दोस्त
के लड़के के लिए जरा-सा भी वक्त नहीं। गर्मजोशी तो दूर,
ढंग से बात करने तक की जरूरत ही नहीं समझी गयी। ये
बातें सुनकर उन्हें कैसा लगेगा
!
मैं बीयर पीते-पीते
दुखी हो रहा था। सुबह से आया हुआ हूँ और कोई बात तक
नहीं कर रहा। आने पर ड्राइंग रूम में चाय पीते हुए जो
दो-एक
बातें हुई थीं,
बाऊजी के हालचाल पूछे गए थे,
उसके बाद तो मुझे जो गेस्ट रूम में पहुँचा दिया गया है,
तब से वहीं घिरा बैठा था। अब बाहर निकला हूँ। यहाँ तक
कि मेरा नाश्ता और खाना भी रूबी वहीं गेस्ट रूम में
पहुँचा गई थी।
बीयर अपना काम कर रही थी। मैं कुढ़ रहा था और सभी को
दोषी मान रहा था। मुझे माँ पर भी गुस्सा आ रहा था,
क्यों उसने इतनी मेहनत करके खाने का सामान बना कर दिया
है खन्ना के बच्चों के लिए। उसे पता तो चले कि बम्बई
के बच्चे ये सब चीजें नहीं खाते। पता नहीं क्या खाते
हैं
!
आंटी हलवे पकवानों का डिब्बा देखते ही किस तरह मुँह
बनाकर बोली थीं
-
क्या जरूरत थी इतना सब भेजने की?
यहाँ तो ये सब कोई नहीं खाता। रूबी ये तुम ले जाना
अपने घर,
और मैं अवाक रह गया था
!
माँ ने कितनी मेहनत से यह बनाया था। कितने घंटे मेहनत
करती रही थी बेचारी और बाऊजी भी तो जिद किए जा रहे थे,
खन्ना को ये पसन्द है,
वो पसन्द है। पता नहीं बम्बई में उसे ये खाने को मिलते
होंगे या नहीं! देख लें न यहाँ आकर
!
और रितु को देखो,
क्या नखरे हैं! मंजू ने इतना शानदार कार्डीगन बनाकर
दिया और वो किस तरह मुँह बनाकर बोली
-
मुझे नहीं पहनना ये सड़ा हुआ कार्डीगन।
और वह स्वेटर वहीं पटककर अपने कुत्ते को गोद में लिए
अपने कमरे की ओर चली गई थी। सच,
उस समय तो मेरा खून ही खौल गया था। मन हुआ था कि अभी
अटैची उठाकर चल दूँ कहीं और। साला यह भी कोई तरीका है
बात करने का! माना तुम लोग रईस हो गए हो। ट्रंसपोर्ट
के बिजनेस में ब्लैक की कमाई करके बीस-तीस लाख के आदमी
हो गए हो लेकिन इसका ये तो कोई मतलब नहीं है कि दूसरों
की इस तरह इज्जत उतार लो। अभी तो मुझे आए हुए कुल आधा
घंटा ही हुआ था और किस तरह से यहाँ से मोहभंग हो गया
था।
मन में हल्की-सी
तसल्ली भी हुई थी कि अगर हम रईस नहीं हैं तो कम-से-कम
इन्सानी मूल्यों पर तो टिके हुए हैं,
तहजीब से बात तो कर सकते हैं।।।। अब यही लोग मेरठ आए
होते तो इनको बता देते कि मेजबानी क्या होती है! सारा
परिवार इनकी जी-हुजूरी
में एक टाँग पर खड़ा होता। क्या मजाल कि कोई जरा ऊँची
आवाज में बोल कर तो दिखाए। बाउजी की यही तो खासियत है।
न तो किसी की बेइज्जती करते हैं,
न अपनी होने देते हैं। अब उनको मैं ये सब बताऊँगा तो
देखना
-
खन्ना अंकल से बातचीत तब बंद न हुई तो बात है। सवालों
के जवाब मैं बीयर के घूँट भरते हुए खुद से पूछता रहा।
बीयर के सुरूर में खुद को,
सबको कोसने के बाद मैं हलका महसूस कर रहा था। सोचा,
कल स्टेशन जाकर इंटरव्यू वाले दिन की टिकट की कोशिश
करूंगा,
ताकि फालतू में यहाँ दिमाग खराब न होता रहे।
दरवाजा अंकल ने खोला था। ड्राइंग रूम में हलकी रोशनी
थी। उनके हाथ में भरा हुआ गिलास था और ड्राइंग रूम के
कोने में बने उनके शानदार बार में बत्ती जल रही थी।
बार स्टैण्ड पर आइस-बॉक्स,
सोडा फाउन्टेन और खुली बोतल रखी थी।
-
यस,
यंग मैन,
उन्होंने अपने गिलास में से लम्बा घूँट लेते हुए पूछा
था
-कहाँ
घूमकर आ रहे हो?
-कहीं
नहीं अंकल,
बरसात की वजह से सारे दिन घर पर ही रहा,
अभी जरा नीचे तक घूमने निकल गया था। मैं उनसे नजरें
नहीं मिलाना चाहता था,
क्योंकि मूड अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था और मैं नहीं
चाहता था कि उन्हें पता चले कि मैं बीयर पीकर आया हूँ।
वैसे भी अपनी और फजीहत करवाने की इच्छा नहीं थी। बेशक
अंकल ने कोई ऐसी बात नहीं की थी,
जिसे मैं अन्यथा लेता,
लेकिन वे सुबह हो रहे पूरे ड्रामे में तो मौजूद थे। जब
मैंने शहर देखने की इच्छा व्यक्त की थी तो वे भी तो
मुझे गाइड कर सकते थे या रितु या ड्रायवर को मुझे घुमा
लाने के लिए कह सकते थे,
या फिर आंटी और रितु को चीजें रख लेने के लिए कह सकते
थे।
-तुम्हारा
खाना तुम्हारे कमरे में रखा है,
हमें पता नहीं था तुम कितने बजे तक लौटोगे। उन्होंने
गिलास खाली किया और तिपाई पर रखते हुए बोले थे
-
हम डिनर पर बाहर इन्वाइटेड हैं। आंटी वगैरह जा चुके
हैं। मैं तुम्हारे लिए ही बैठा था। वे उठ खड़े हुए और
बाहर जाते हुए बोले
-
ओ।के।यंग मैन,
सी यू टुमारो,
गुड नाइट। मैं गुडनाइट कहकर अपने कमरे में आ गया था।
कोनेवाली मेज पर ढका हुआ खाना और पानी का जग वगैरह रखे
हुए थे। देखा-
दो
एक सब्जियाँ,
चावल और रोटी थीं। भूख होने के बावजूद खाने की इच्छा
नहीं हुई। अगर मेरी इतनी ही चिन्ता थी तो मुझे उसी
वक्त बता देते या कह देते,
बाहर ही खा लेता। लेकिन फिर सोचा-अगर
मैं खाना न खाऊँ और सुबह होने पर आंटी देखेंगी तो फिर
भिनभिनाएँगी
-
एक तो स्पेशियली खाना बनवाया और छुआ तक नहीं। नहीं
खाना था तो मना करके जाते। और मैं खाना खाकर सो गया
था।
v
सबेरे से फिर वही रूटीन चल रहा है,
बरसात हो रही है और मैं कमरे में बन्द हूँ। रूबी एक
बार सुबह पूछ भी गई थी वीडियो पर कोई फिल्म देखना
चाहेंगे। लेकिन मैंने मना कर दिया था। फिल्म देखने का
मतलब है
–
ड्राइंग रूम में बैठना और ड्राइंग रूम चूँकि सभी कमरों
के बीच में पड़ता है,
अतः सबकी निगाहों के बीच बैठना मुझे कतई गवारा नहीं
था। रितु के कमरे से अब म्यूजिक की आवाज आनी बन्द हो
गई है,
लगता है कि किसी किताब वगैरह में मन लग गया होगा।
फर्स्ट ईयर में है रितु। सुन्दर है,
पर है अपनी माँ की तरह नकचढ़ी। एक ही नजर में आप मालूम
कर सकते हैं
–
माँ–बाप
की बिगड़ैल और जिद्दी लड़की है। बस ड्राइंग रूम में ही
कल जो हैलो हुई थी,
उसके बाद नजर तो कई बार आई है लेकिन आँखें न उसने
मिलाई हैं न मैंने ही जरूरत समझी है। खासकर कार्डीगन
वाले प्रसंग से तो मुझे उसकी शक्ल तक से नफरत हो गई
है।
इस घर में मुझे एक ही आदमी ढंग का लगा है
–
टीपू। सत्रह साल का टीपू देखने में खासा जवान लगता है,
स्मार्ट भी है। टैन्थ में पढ़ता है। इतना अच्छा लड़का,
लेकिन अफसोस कि वह गूँ