सत्ता
के भरोसे राष्ट्रीय और सामाजिक मूल्यों की रक्षा संभव
नहीं- संजय द्विवेदी![]()
(समसामयिक अध्ययन केन्द्र मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति का आयोजन)
इन्दौर । हमारे समय में जो संकट खड़े हैं उनका सामना हम सामाजिक प्रतिरोधों के माध्यम से ही कर सकते हैं। बाजार ने हमारी भाषाओं, साहित्यों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत की है। इस चुनौती का सामना सत्तासीन लोगों के बस का नहीं है अब इसका एक मात्र निराकरण समाजिक प्रतिरोध ही बचा है। समाज के पास जो दंड देने की ताकत है वहीं अंतिम शक्ति हैं। अब समय आ गया है, जब समाज को अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए । यह उद्गार ख्याति प्राप्त पत्रकार श्री संजय द्विवेदी ने व्यक्त किए।
श्री द्विवेदी समसामयिक अध्ययन केन्द्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। श्री द्विवेदी ने आगे कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय जो मुद्दे राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक थे। वे मुद्दे स्वतंत्रता के बाद गौण हो गए। सन 1947 के बाद राष्ट्रीय मुद्दों का क्या हुआ, इन पर सोचना बंद कर दिया गया है। सत्ता के भरोसे रहकर राष्ट्रीय और सामाजिक मूल्यों की रक्षा नहीं की जा सकती है। इसलिए हर परिवर्तन के लिए सरकार की ओर ताकना उचित नहीं है। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके जागरूक नागरिक होते हैं। सन 1947 से पहले की पत्रकारिता और 1947 के बाद की पत्रकारिता में बहुत फर्क आया हैं। प्रांतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों की संख्या बढ़ी है क्योंकि आम जनता तक अपने उत्पाद की खबर पहुचाने के लिए स्थानीय भाषाओं में विज्ञापन छापना उनके लिए अनिवार्य हो गया है। आज बाजार और अखबार एक दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। भाषाएं प्रदूषण का शिकार हो गई। साहित्य की अनसुनी की जाने लगी तथा पाश्चात्य विचारों का अतिकमण बढ़ा है।
गाँधीजी के नैतिक प्रभाव को कम कर समाज और राष्ट्र को एक अप्रत्यषित विकास की ओर ढकेल दिया गया है। कर लो दुनिया मुट्ठी में कहने वाली कंपनी अब सब्जी बेचने पर उतारू हैं। आज व्यापार के कोई नैतिक पैमाने नहीं बचे हैं। जहाँ और जिस विधइ से पैसा कमाया जा सकता है, इसके कमाने की होड़ लगी हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर दिशा देने वाला कोई एक सर्वामान्य नेता अब नहीं है। इस कार्यक्रम में पत्रिका “मीडिया विमर्श” की प्रकाशक श्रीमती भूमिका द्विवेदी भी उपस्थित हुई ।
प्रारंभ में अतिथि स्वागत समिति के प्रधान मंत्री श्री गणेशदत्त ओझा ने किया। संचालन राकेश शर्मा ने किया तथा आभार श्री सूर्यकान्त नागर ने माना । प्रतीक चिन्ह के रूप में केन्द्र का साहित्य समिति के अर्थ श्री अरविन्द जवलेकर ने भेंट किया। चर्चा में श्री केशव, श्री के.सी. जैन, श्री हर्षवर्धन ला, ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में सर्व श्री चन्द्रसेन विराट सुखदेवसिंह कश्यप, चन्द्रभान भारद्वाज,श्रवणकुमार पाटौदी, एम.के. दसौधी, गिरेन्द्रसिंह भदौरिया ‘प्राण’,अनिल भोजे,सुबोध खण्डेलवाल, श्रीमती चन्द्रकला अवस्थी, श्यामकान्त नाफडे उपस्थित थे। (राकेश शर्मा की रिपोर्ट)
