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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

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   भाषांतर

 

तसलीमा नसरीन की पाँच बांग्ला कविताएं


अनुवादः शम्पा भट्टाचार्य

 

खंडित बांग्लादेश

देश था एक सुजलां सुफलां

लोग झूमते थे सुनहली धान की बालियों जैसे हवा में

और उसी तरह लहराते थे पीठे और पकवानों के दिनों में

एक देश था जहाँ शरद के बादल आकाश पर छाते ही

लग जाता था सुखों का मेला, माटी की सोधीं महक

ज़मीन में रच-बस जाती थी

 

देश था एक आम-कटहलों का

बारिश की फुहार में भीगकर, रह-रहकर कँप उठने का

धुंध छँटी धूप में बैठकर देह सेंक लेने का

एक देश था मेरा, उसका, हमारे पुरखों का

 

अचानक, पता नहीं वे कौन थे

जो प्यार से भरे इस देश को

दो हिस्सों में बाँट गये, साथ ही

जिन्होंने इस देश के लोगों के

लौकी के पोर जैसे लहकते सपनों को नोंच लिया

झकझोरकर उखाड़ फेंका जड़ से -

छितरा गये सब न जाने कहाँ ?

कौन बचा कौ मरा इसका कोई हिसाब नहीं

विक्रमपुर से चलकर कोई गड़ियाघाट के मोड़ पर पहुँचा

और वर्तमान से कोई फुलतलि गाँव में

तो कोई जसोर से हावड़ा,

नेत्रकोनो से रानाघाट, मुर्शिदाबाद से मैमनसिंह

हरी-भऱी फूल की बगिया में अरना भैंस के घुसने पर

होता है जैसा

ठीक वैसा ही हुआ

 

देश के दोनों हिस्से एक दूसरे की तरफ़

बढ़ाये हुए हैं अपने प्यासे हाथ

और इन हाथों के बीच पड़ी है

मनुष्य द्वारा रची धर्म की बेड़ी

और काँटेदार दीवार

 

सतीत्व

काया कोई छुए तो हो जाउँगी नष्ट

हृदय छूने पर नहीं ?

हृदय देह में बसा रहता है निरंतर

 

काया के सोपान को पार किये बिना

जो अंतर गेह में करता है प्रवेश

वह कोई और ही होगा

पर जानती हूँ

वो मनुष्य नहीं होगा

 

जलपर्व

घड़े में है पानी

और ताल भी है पास

ले लेना तुम पानी

जगी हो जैसी प्यास

बुझ न जाये प्यास तो लेना कंश नदी भी

 

जल समाप्त होने पर आना,

मेरे अंदर घुमड़ रहा है

सागर एक अकेला

 

पिता, पति, पुत्र

अगर तुम्हारा जन्म नारी के रूप मे हुआ है तो

बचपन में तुम पर

शासन करेंगे पिता

अगर तुम अपना बचपन बिता चुकी हो

नारी के रूप में

तो जवानी में तुम पर

राज करेगा पति

अगर जवानी की दहलीज़

पार कर चुकी होगी

तो बुढ़ापे में

रहोगी पुत्र के अधीन

 

जीवन-भर तुम पर

राज कर रहे हैं ये पुरुष

अब तुम बनो मनुष्य

क्योंकि वह किसी की नहीं मानता अधीनता -

वह अपने जन्म से ही

करता है अर्जित स्वाधीनता

 

तोप दागना

मेरे घर के सामने स्पेशल ब्रांच के लोग

चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं

कौन आता है कौन जाता है

कब निकलती हूँ, कब वापस आती हूँ

सब कापी में लिखकर रखते हैं

किसके साथ दोस्ती है

किसकी कमर से लिपटकर हँसती हूँ

किसके साथ फुसफुसाकर बातें करती हूँ ...सब कुछ

लेकिन एक चीज़ जिस वे दर्ज़ नहीं कर पाते

वह है - मेरे दिमाग़ में कौन-सी भावनाएँ

उमड़-घुमड़ रही है

मैं अपनी चेतना मे क्या कुछ सँजो रही हूँ

सरकार के पास तोप और कमान हैं

और मुझ जैसी मामूली मच्छर के पास है डंक

 

 

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