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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  व्यंग्य

 

 श्मशान घाट का इंडेक्स यमराज के हवाले


अविनाश वाचस्पति

 

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने 2400 लोगों पर एक सर्वेक्षण किया और उसके नतीजों का खुलासा करके वही बातें दोहराई हैं जो हमारे बुजुर्ग पहले ही बतला गये हैं कि दूध का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है और रोगों को मानव रीर के पास फटकने भी नहीं देता है।

 

परन्तु आज हरों में खालिस दूध नहीं मिलता है। दूध और इनसे बने उत्पाद इतने जहरीले हो चुके हैं कि सापों को भी र्म आने लगी है कि हम से अधिक जहरीले लोग, नागफनी के कांटे क्या हैं, उनसे अधिक कटीले लोग। वो लोग जो सिंथेटिक दूध का उत्पादन और व्यापार कर रहे हैं। वो लोग जो जानवरों की हड्डियों से देशी घी बना कर लाभ कमा रहे हैं। उनसे अधिक काटे इनके सिवाय पब्लिक को और कौन चुभो रहा है ?

 

इनका सेवन करके जब इंसान रोगी हो जाता है तो जो डॉक्टर इलाज के लिए मिलता है, वो फर्जी डिग्रीधारी होता है। दवाई जो खरीद कर रोग से बचाव के लिए खानी होती है वो नकली होती है। कब तक और कहाँ तक बचेगा इंसान तू। बचने का उपक्रम मत कर।

 

उनसे बच गया तो इनसे कैसे बचेगा जो ब्लू लाईन ड्राईवरों का रूप धर कर दिल्ली की धरा पर उतर आये हैं। सड़कों पर यमराज ने और उनके दूतों ने उतर कर मनमानी मचा रखी है। जो बस यात्रियों को विव, पैदल को खून से लथपथ, कार वालों को रीर से बेकार, साईकिल वालों को चक्करघिन्नी की तरह घुमा रहे हैं और पब्लिक से पिटने पर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

 

मौत का खूनी खेल सड़कों पर बदस्तूर जारी रहा तो लोग बीमारी से नहीं मरेंगे, बेरोजगार ढूढे नहीं मिलेंगे, बुढ़ापा नहीं सतायेगा ? आज के बच्चे कल के नेता जिन्हें ये ढू-ढूढ कर, पैदल या वैन में टक्कर मार मार कर श्मशान पहुँचा  रहे हैं। सबका यही हश्र होना है।

 

इनसे आजिज आकर अखबार वाले मंगल को अमंगलकारी मानने को मजबूर होकर कह रहे हैं कि गति और क्रोध के ब्रेक फेल हो चुके हैं। यही आज की भयावह सच्चाई है। पब्लिक के दिल पत्थर के हो चुके हैं और दिमाग कुंद। वही पब्लिक जिसे अपनी और अपने परिवार की जान से अधिक किसी की परवाह नहीं रही।

 

एक जिंदा हिन्दू आदमी जितना नुकसान अपने समूचे जीवन काल में पर्यावरण को नहीं पहुँचा  पाता, उससे अधिक नुकसान तो वो मरने के बाद पहुँचा  देता है क्योंकि हिंदू रीति रिवाज के तहत जब उसे जलाया जाता तो जलाने में व्यर्थ हुई लकड़ी और जलने पर बनने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस - दोनों ही पर्यावरण के घोर त्रु हैं। जो खाक बचती है वो नदियों में बहा दी जाती है - लिहाजा तीनों ही स्थितियाँ  खतरनाक हैं।

 

अब तो खाक होने के लिए भी कई विकल्पों के दरवाज़े खुले हुए हैं। जबकि नकली लकड़ी की खोज अभी तक वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं पर असली लकड़ी में मिलाने के लिए जानवरों की हड्डियों वाला देशी घी दे में बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है। इन दोनों को ही खरीदने पर असली नोट लगेंगे। मन की आखें खोल रे बंदे। पर्यावरण को और जहरीला मत बना।

 

अपने नेत्रदान करता जा, किसी की आँखों  का उजाला बन और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी अपनाकर कम्प्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) से अपना अंतिम सफर पूरा कर। सीएनजी जीवन के इस हाईवे पर अधिक माईलेज देती है। इसी से सच्ची मुक्ति मिलेगी।  कम मात्रा और खर्चे में तुझे सुपुर्दे खाक कर देगी। तेरा समय तो पूरा हो चुका है।  तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला। हजारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते।

 

मैं इतना तो जानता हूँ कि जीते जी हम जल पाना चाहते हैं और मरने के बाद जल जाना चाहते हैं। हवा तो हमें जीते जी भी चाहिए और मरने पर भी, हम तभी जलेंगे जब खूब सारी ऑक्सीजन सींच लेंगे।

 

अब दाह संस्कार के लिए भी जगह कम पड़ रही है। सूत्रों के मुताबिक यह सब चढ़ते पारे का कमाल है जिसने श्मशान घाट को वों के जंगल में तब्दील कर दिया है। मरने में चौगुनी प्रगति जारी है। श्मशान घाट का इंडेक्स तेजड़ियों की चपेट में है। यह तो राजधानी का हाल है। वैसे भी राजधानी के मसले ही सुर्खियों में रहते हैं। अब वो भारत की राजधानी हो या उत्तार प्रदे की। स्थितिया परिस्थितिया कमोवे एक जैसी ही हैं।

 

विना वाचस्पति

साहित्यकार सदन, 195 सन्त नगर

नयी दिल्ली 110065

 

 

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