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साहित्य और सामाजिक सौहार्द तनवीर जाफ़री
यह एक आम अवधारणा है कि किसी भी देश का साहित्य उस देश के समाज का आईना होता है। जाहिर है भारतवर्ष भी इस अवधारणा से अलग नहीं है। विश्व के सबसे बड़े धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र भारतवर्ष का इतिहास हमें यह बताता है कि विश्व शांति, धर्म निरपेक्षता, सामाजिक व साम्प्रदायिक सौहार्द्र के जो उदाहरण हमारे देश में सुनने व देखने को मिलते हैं, सम्भवत: दुनिया के और किसी देश में यह विशेषता नहीं पाई जाती। वसुधैव कुटुम्बकम जैसी परिकल्पना हमारे भारतवर्ष की ही देन है। जाहिर है यह या इन जैसे और तमाम ऐसे संदेश जोकि हमें अपने देश का सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखने में या उसे और अधिक मजबूत करने में मददगार साबित होते हैं, हमें भारतीय साहित्य के द्वारा ही प्राप्त होते हैं।
सदियों से भारतीय साहित्य हमें यह बताता आ रहा है कि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना, मलिक मोहम्मद जायसी तथा रसखान जैसे कई मुसलमान कवियों ने हिन्दू धर्म के आराध्य देवी-देवताओं की शान में क़सीदे कहकर सामाजिक सौहार्द्र का बेशकीमती उदाहरण प्रस्तुत किया। गुरु नानक देव जी ने एक मुस्लिम संत से स्वर्ण मंदिर की बुनियाद रखवाकर सामाजिक सौहार्द्र का अनूठा उदाहरण पेश किया। जगतगुरु संत रामानन्दाचार्य जी ने मुस्लिम परिवार में जन्मे कबीरदास को अपना शिष्य बनाकर तथा उन्हें अपना सानिध्य प्रदान कर सर्वधर्म समभाव की एक मिसाल पेश की। अमरनाथ गुफा की खोज एक मुस्लिम गूजर चरवाहे द्वारा की गई जो आज भी उस सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल से जुड़ा हुआ है। जाहिर है यह या इन जैसी और तमाम सामाजिक सौहार्द्र से परिपूर्ण जानकारियों से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है।
परन्तु कभी-कभी इसी तस्वीर का वह कष्टदायक पहलू भी हमें देखने को मिलता है जो सीधे-सीधे हमारे देश के सामाजिक सौहार्द पर कुठाराघात करता है। जहाँ परस्पर प्रेम सद्भाव तथा सामाजिक सौहार्द्र की तमाम मिसालें हमें इस देश में देखने को मिलती हैं वहीं इसी देश में कभी 1947 का रक्त रंजित विभाजन, कभी मेरठ, भागलपुर, मलियाना व गुज़रात जैसे साम्प्रदायिक दंगे तो कभी 1984 के सिख विरोधी दंगे भी दिखाई देते हैं। कभी गोधरा तो कभी दुलीना और कभी गोहाना से सामाजिक दुर्भावना का धुआँ उठता दिखाई देता है। इस्लाम व जेहाद के नाम पर कश्मीर से लेकर पूरे मध्य एशिया में खून की होलियाँ खेली जा रही हैं। जाहिर है इस प्रकार के दुर्भावनापूर्ण वातावरण के परवान चढ़ने में भी कांफी हद तक उस साहित्य की भी जिम्मेदारी है जो इस प्रकार के दुर्भावनापूर्ण तथा सामाजिक सौहार्द्र को छिन्न-भिन्न करने वाले लोगों को प्रेरणा देता है। अपनी इस बात के समर्थन में मैं मराठा शासक छत्रपति शिवाजी तथा मुगल शासक औरंगजेब के जीवन से जुड़ी कुछ उन घटनाओं पर प्रकाश डालना चाहूँगा जिनका समावेश यदि भारतीय साहित्य में किया जाए तो निश्चित रूप से यह हमारे देश के सामाजिक सौहार्द्र को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाने वाली साबित हो सकती हैं। परन्तु अफसोस की बात यह है कि भारतीय साहित्य में ऐसी घटनाओं की अनदेखी की गई तथा ठीक इस के विपरीत साहित्य के माध्यम से ही हमें शिवाजी व औरंगजेब के बारे में वह नकारात्मक तथ्य परोसे गए जो समाज को जोड़ने में नहीं बल्कि तोड़ने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
यदि शिवाजी और औरंगजेब जैसे दो प्रमुख शासकों का ही जिक्र किया जाए तो आमतौर से हम यह पाएंगे कि शिवाजी को तो कुछ लोग हिन्दुत्व का प्रतीक मानते हैं जबकि कुछ कट्टरपंथी इस्लाम परस्त, औरंगजेब को एक रूढ़िवादी मुस्लिम शासक के रूप में देखते हैं। परन्तु यदि हम शिवाजी व औरंगजेब के व्यक्तिगत् जीवन में झाँक कर देखें तथा उनके धर्म निरपेक्षता से परिपूर्ण जीवन पर नज़र डालें तो हम पाएंगे कि यह शासक सामाजिक सौहार्द्र, सर्वधर्म सम्भाव व राष्ट्रीय एकता के पक्षधर तथा कट्टरपंथी विचाधारा के घोर विरोधी थे। अंग्रेंज लेखकों ने अपने जहरीले व भारतीय सामाजिक सौहार्द्र को छिन्न-भिन्न करने वाले साहित्य के माध्यम से भारत में हिन्दू व मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरी करने के लिए शिवाजी को इस्लाम व मुसलमानों का दुश्मन तथा औरंगजेब को घोर हिन्दू विरोधी शासक के रूप में पेश किया तथा इनके जीवन के सामाजिक सौहार्द्र से जुड़े पहलुओं को पूरी तरह से नज़रअंदाज किया।
शिवाजी के दादा मालोजी जोकि अहमदनगर रियासत में एक सुप्रतिष्ठित फौजी कमाण्डर थे, उन्हें शादी के दस वर्षों तक भी कोई सन्तान नहीं थी। जबकि उनके छोटे भाई के घर आठ संतानें थीं। मालोजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तीर्थ, व्रत, पूजा-पाठ आदि सब कुछ कर डाला परंतु उन्हें संतान की प्रप्ति नहीं हुई। अन्त में किसी शुभचिन्तक की सलाह मानकर वे अहमदनगर किले के बाहर स्थित शाह शरफ की मजार पर गए और सन्तान के लिए उस पीर से मन्नत व दुआयें माँ गीं। उसी वर्ष मालोजी के घर एक पुत्र पैदा हुआ तथा अगले ही वर्ष दूसरे पुत्र ने भी जन्म ले लिया। मालोजी को इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि उन्हें शाह शरफ बाबा के आशीर्वाद से ही दोनों पुत्र प्राप्त हुए हैं। तभी उन्होंने अपने बडे बेटे का नाम शाहजी और छोटे बेटे का नाम शरफ जी रख दिया। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी उसी पीर के आशीर्वाद का परिणाम अर्थात् शाहजी की सन्तान थे।
हैदराबाद (सिन्ध) से आकर केलसी में बसे बाबा याँ कूत एक बड़े सन्त थे। उनका मानना था कि ईश्वर, अल्लाह एक ही हैं तथा कुल इन्सान आपस में भाई-भाई हैं। शिवाजी बाबा याकूत शहरवर्दी के इतने बड़े भक्त व मुरीद थे कि उन्होंने बाबा को 653 एकड़ ज़मीन जागीर के रूप में अता की तथा वहाँ एक विशाल ख़ानंकाह का निर्माण करवाया। शिवाजी की मृत्यु के एक वर्ष बाद ही बाबा याँ कूत का भी देहान्त हो गया था। जब भी शिवाजी किसी युद्ध के लिए जाते थे तो अपनी विजय के लिए बाबा याकूत से आशीर्वाद लेकर तथा मुरादें माँगकर जाते थे। अपने फ़रमान में शिवाजी ने लिखा भी है - 'हजरत बाबा याकूत बहवत थोरू बे' अर्थात् बाबा याकूत बहुत बड़े सूफी-सन्त हैं। एक अन्य मुस्लिम सूफी मौनी बुआ जो कि पाड़ गाँव में रहते थे उन पर भी शिवाजी को अत्यधिक विश्वास था तथा वे मौनी बुआ के बहुत बड़े भक्त थे। युद्ध के लिए जब शिवाजी कर्नाटक मोर्चे पर जाने लगे तो उन्होंने मोर्चे पर जाने से पहले मौनी बुआ के पास जाकर उनका आशीर्वाद लिया।
इतिहास कभी भी विश्वास के उस दस्तावेज को झुठला नहीं सकता जो हमें यह बताता है कि शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सहयोगी एवं उनके निजी सचिव का नाम मुल्ला हैदर था। शिवाजी के सारे गुप्त दस्तावेज मुल्ला हैदर की सुपुर्दगी में ही रहा करते थे तथा शिवाजी का सारा पत्र व्यवहार भी उन्हीं के जिम्मे था। मुल्ला हैदर शिवाजी की मृत्यु होने तक उन्हीं के साथ रहे। शिवाजी के अफ़सरों और कमाण्डरों में बहुत सारे लोग मुसलमान थे। हालांकि कुछ अंग्रेंज व मराठा इतिहासकारों ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि शिवाजी का लक्ष्य हिन्दू साम्राज्य स्थापित करना था। परंतु 'पूना महंजर' जिसमें कि शिवाजी के दरबार की कार्रवाईयाँ दर्ज हैं, 1657 ई में शिवाजी के अंफसरों और जजों की नियुक्ति का भी उल्लेख उसमें किया गया है। शिवाजी की नई सरकार में जिन मुस्लिम काज़ियों और नायब क़ाज़ियों को नियुक्त किया गया था उनके नामों का जिक्र भी 'पूना महजर' में मिलता है। जब शिवाजी के दरबार में मुस्लिम प्रजा के मुकद्दमे सुनवाई के लिए आते थे तो शिवाजी मुस्लिम काज़ियों से सलाह लेने के बाद ही फैसला देते थे। शिवाजी के जीवन से जुड़ी एक और ऐसी घटना है जो कि इस बात का प्रमाण देती है कि वह कतई तौर पर सम्प्रदाय या धर्म के आधार पर कोई पक्षपात नहीं करते थे। उनका हमेशा यह प्रयास रहता था कि उनके साम्राज्य में पूरी तरह से सामाजिक सौहार्द्र का वातावरण ंकायम रहे। शिवाजी के मशहूर नेवल कमाण्डरों में दौलत ख़ां और दरिया ख़ां सहरंग नाम के दो मुसलमान कमाण्डर प्रमुख थे। जब यह लोग पदम् दुर्ग की रक्षा में व्यस्त थे उसी समय एक मुसलमान सुल्तान, सिद्दी की फौज ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। शिवाजी ने अपने एक ब्राह्मण सूबेदार जिवाजी विनायक को यह निर्देश दिया कि दौलत खां और दरिया खां को रसद और रुपये पैसे फौरन रवाना कर दिए जाएं। परन्तु सूबेदार विनायक ने जानबूझ कर समय पर यह कुमुक नहीं भेजी। इस बात से नारांज होकर शिवाजी ने विनायक को उसके पद से हटाने तथा उसे कैद में डालने का हुक्म दिया और अपने आदेश में शिवाजी ने लिखा कि- 'तुम समझते हो कि तुम ब्राह्मण हो, इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारी दगाबांजी के लिए माफ कर दूंगा? तुम ब्राह्मण होते हुए भी कितने दगाबांज हो, कि तुमने सिद्दी से रिश्वत ले ली। लेकिन मेरे मुसलमान नेवल कमाण्डर कितने वंफादार निकले, कि अपनी जान पर खेलकर भी एक मुसलमान सुल्तान के विरुद्ध उन्होंने मेरे लिए बहादुराना लड़ाई लड़ी।'
शिवाजी कुरान शरीफ, मस्जिदों, दरगाहों तथा औरतों का बहुत आदर करते थे। एक बार शिवाजी के एक हिन्दू सेनापति ने सूरत शहर को लूटा तथा वहाँ के मुगल हाकिम की सुन्दर बेटी को शिवाजी के दरबार में कैद कर लाया। शिवाजी के समक्ष उस सुन्दर कन्या को पेश करते हुए वह सेनापति बोला कि- 'महाराज मैं आपके लिए यह नायाब तोहफा लाया हूँ ।' शिवाजी अपने कमाण्डर की इस हरकत को देखकर गुस्से से आग बबूला हो गए तथा अपने उस सरदार को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- 'तुमने न सिंर्फ अपने मजहब की तौहीन की बल्कि अपने महाराज के माथे पर कलंक का टीका भी लगाया।' फिर कैद करके लाई गई मुगल हाकिम की सुन्दर बेटी की ओर देखकर शिवाजी बोले- 'बेटी, तुम कितनी ख़ूबसूरत हो। काश मेरी माँ भी तुम्हारी तरह ख़ूबसूरत होती तो मैं भी तुम्हारे जैसा ही ख़ूबसूरत होता।' उसके पश्चात शिवाजी ने ढेर सारे तोहफ़े देकर उस मुसलमान शहंजादी को उसके माता-पिता के पास अपनी एक फौजी टुकड़ी की देख रेख में आदर सहित वापस भेज दिया। इतना ही नहीं शिवाजी ने अपने उस सेनापति की करतूत के लिए सूरत के मुगल हाकिम से क्षमा याचना भी की। शिवाजी की फौज को उनका आदेश था कि लड़ाई के दौरान किसी भी मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुँचे और यदि कहीं कोई कु रान शरीफ मिल जाए तो उसे आदर सहित मेरे पास लाया जाए। इस प्रकार प्राप्त किये गये कुरान शरीफ को शिवाजी प्राय: मुसलमान काजियों को तोहफ़े के रूप मे पेश कर दिया करते थे। बड़े दु:ख की बात है कि आज शिवाजी के नाम का चोला धारण किए हुए कुछ लोग सत्ता स्वार्थ हेतु उन्हें कट्टरपंथी एवं कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में पेश करने की कोशिश में लगे रहते हैं। आज यदि स्कूलों, पाठशालाओं तथा महाविद्यालयों में इन महानायकों के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का सही चित्रण प्रस्तुत करने वाले सामाजिक व साम्प्रदायिक सौहार्द्र से परिपूर्ण साहित्य को छात्रों के अध्ययन हेतु उपलब्ध कराया जाए तो आने वाली पीढ़ी जिन पर कि गंगा यमुनी तहजीब वाले इस महान धर्म निरपेक्ष देश का भविष्य निर्भर करता है उनकी सोच में नि:सन्देह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा। इतना ही नहीं बल्कि इस प्रकार शिवाजी को मात्र एक हिन्दू छत्रपति के रूप में पेश किए जाने की चन्द राजनैतिक लोगों की सांजिशें भी नाकाम हो सकेंगी।
जिस प्रकार भारत के सामाजिक सौहार्द्र के ढांचे को शिवाजी के कुछ कथित चाहने वालों ने उनके धर्म निरपेक्ष एवं असाम्प्रदायिकतावादी स्वरूप पर पर्दा डालकर तथा अंग्रेंजों द्वारा परोसे गए साहित्य को ही अपनी सोच का आधार मानकर उन्हें मात्र हिन्दुओं का ही प्रेरणा स्त्रोत प्रचारित कर दिया है, ठीक उसी प्रकार कुछ साहित्यकारों ने औरंगजेब के धर्म निरपेक्षता व सामाजिक सौहार्द्र से जुड़े पहलुओं का इतिहास में समावेश न कर उनकी भी एक कट्टरवादी मुस्लिम रूपी छवि स्थापित करने में अपना पूरा योगदान दिया है। आज भारत के आम गैर मुस्लिम जनमानस में औरंगजेब की छवि एक मन्दिर तोड़ने वाले, हिन्दुओं व शिया समुदाय के लोगों का कत्ल करने वाले तथा सिक्ख समुदाय से लड़ने वाले एक क्रूर, कट्टर एवं अत्याचारी मुगल शासक के रूप में बनी हुई है।
यह सत्य है कि अपने सत्तास्वार्थ से जुड़े, कुछ पूर्वाग्रहों के चलते तथा अपनी विस्तारवादी नीतियों का पालन करते हुए लगभग सभी विदेशी शासकों ने चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न रहे हों, अपने साम्राज्य की स्थापना या विस्तार में बाधक सिद्ध होने वाले हर ख़ास-ओ-आम का तोपों व तलवारों से मुंकाबला किया। निश्चित रूप से औरंगजेब को भी इसका अपवाद नहीं माना जा सकता। मगर इतिहास औरंगजेब के उस सामाजिक सौहार्द्र से जुड़े धर्म निरपेक्ष स्वरूप का भी बखान करता है जो सामाजिक सौहर्द्र के प्रति उनकी सकारात्मक विचारधारा को दर्शाता है। उनके जीवन से जुड़ी उन घटनाओं को साहित्य के माध्यम से आज न तो हमारे देश की पाठशालाओं में पढ़ाया जाता है, न ही हमारे नेताओं द्वारा उनके धर्म निरपेक्ष कार्यकलापों को जनता के बीच प्रचारित किया जाता है, न ही उनसे कोई प्ररणा ली जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि जहाँ एक ओर कट्टरपंथी हिन्दूवादी संगठन औरंगजेब को एक क्रूर शासक के रूप में प्रचारित कर स्वयं को नंफरत ंफैलाने की अपनी रणनीति में कामयाब समझते हैं वहीं मुस्लिम समुदाय का एक रूढ़िवादी वर्ग भी औरंगजेब को एक कट्टरपंथी मुगल शासक के रूप में पाकर न सिंर्फ ख़ुश नज़र आता है बल्कि औरंगजेब को 'हंजरत औरंगजेब' के रूप में भी देखता है।
वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक तथा उड़ीसा के गर्वनर रह चुके श्री विशम्भर नाथ पाण्डे जी, जो कि नगर महापालिका इलाहाबाद के चेयरमैन भी रह चुके थे, मेरे शुभचिंतकों व संरक्षकों में एक प्रमुख थे। प्राय: वे मुझे देश के सामाजिक सौहार्द्र से जुड़ी ऐतिहासिक व तथ्यात्मक जानकारियाँ देकर मेरा ज्ञानवर्धन करते रहते थे। जब वे नगर महापालिका इलाहाबाद के चेयरमैन थे, उस दौरान त्रिवेणी संगम के निकट स्थित सोमेश्वरनाथ महादेव के मन्दिर के पुजारी की मृत्यु के बाद उस मन्दिर व मन्दिर से सम्बन्धित जायदाद के दो दावेदार पांडे जी के सामने आए। दोनों दावेदारों ने नगर महापालिका में अपने नाम के दाख़िल ख़ारिज करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया था। उनमें से एक दावेदार के पास तो कुछ दस्तावेज उपलब्ध थे जबकि दूसरे के पास कोई भी कागजी सुबूत मौजूद नहीं था। जब श्री पाण्डेय ने उस दस्तावेज पर नज़र डाली तो पता चला कि वह कोई मामूली फ़रमान न होकर औरंगजेब का फ़रमान था जिसके द्वारा औरंगजेब ने मन्दिर के पुजारी को ठाकुर जी के भोग और पूजा के लिए जागीर में दो गाँव पेश किये थे। श्री पाण्डेय को यह शक हुआ कि यह दस्तावेज तो असली हो ही नहीं सकते, क्योंकि इतिहास के अनुसार औरंगजेब तो बुतों को तोड़ा करता था। आख़िर मन्दिर में बुत रखे जाने को वह अपने नाम के साथ कैसे जोड सकता था। श्री पाण्डेय उस फ़रमान को देखकर हैरत में पड़ गए तथा उसी समय जाने-माने बुद्धिजीवी तथा फारसी के महान विद्वान डॉ. सर तेज बहादुर सप्रू के पास उनके घर गए। सप्रू साहब ने उस फ़रमान को पढ़ कर कहा कि यह फ़रमान असली है। श्री पाण्डेय को तब भी विश्वास न हुआ। उन्होंने औरंगजेब के बारे में अपने दिलो दिमाग में बनी एक कट्टरपंथी एवं रूढ़िवादी मुस्लिम शासक की छवि को ध्यान में रखकर कहा कि- 'डॉ. साहब, आलमगीर तो मन्दिर तोड़ता था, बुत शिकन था, मूर्तियों को तोड़ने वाला कट्टर मुस्लिम शासक था, आंखिर वह ठाकुर जी के भोग व पूजा के लिए जायदाद कैसे दे सकता था?' उसी समय डॉ. सप्रू ने अपने मुन्शी को आवांज दी और कहा- 'मुन्शी जी, ज़रा बनारस के जंगमवाड़ी शिव मन्दिर की अपील की मिसिल तो ले आओ'। मुन्शी जी मिसिल लेकर आये तो डॉ. सप्रू ने उन्हें दिखाया कि उसमें औरंगजेब के जारी किए हुए चार फ़रमान और भी थे जिसमें जंगमों को माँ फी की ज़मीन उनके धार्मिक कार्यकलापों हेतु औरंगजेब द्वारा पेश की गई थीं।
डॉ. सप्रू हिन्दुस्तानी कल्चरल सोसायटी के अध्यक्ष थे। डॉ. पाण्डेय भी इस संस्था के एक सक्रिय सदस्य थे। एक बार डॉ. सप्रू की सलाह पर पाण्डेय जी ने भारत के प्रमुख मन्दिरों की एक सूची तैयार की तथा उन सबके नाम यह पत्र लिखा कि - 'अगर आप के मन्दिरों को औरंगजेब या किसी अन्य मुगल बादशाह ने कोई जागीर अता की हो तो उनकी फोटोकॉपियाँ कृपा करके भेज दें'। इस पत्र के लिखे जाने के बाद जो तथ्य सामने आए वह आश्चर्यचकित करने वाले थे। महाकाल मन्दिर (उज्जैन), बालाजी मन्दिर (चित्रकूट), कामाक्षा मन्दिर (गुवाहाटी), जैन मन्दिर (गिरनार), दिलवाड़ा मन्दिर (आबू) तथा गुरुद्वारा रामराय (देहरादून) आदि स्थानों से सूचनाएं प्राप्त हुईं कि उपरोक्त सभी धर्म स्थलों को औरंगजेब द्वारा ही जागीरें अता की गई थीं। क्या औरंगजेब द्वारा जारी किए गए वह फ़रमान जिनके आधार पर ंगैर मुस्लिम धर्म स्थान का निर्माण किया गया हो औरंगजेब | ||||||||||