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सूरज क्यों डूबता है ? शिवबचन चौबे
पूर्व
में उदय हो कर, सूरज सदा पश्चिम में ही क्यों डूबता है
?
जन्मता पूर्व
मुझे इन कतिपय प्रश्नों ने, जब से होश संभाला है घेरे रखा है। इससे मुक्ति कैसे मिले, बार-बार यही सोचता हूँ कभी-कभी दिल में यह भी आता है कि हो सकता है, मेरी और आपकी ही तरह वह भी अपनी जन्मभूमि पर मरना चाहता हो। किन्ही अज्ञात कारणों से उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही है और इसी इच्छापूर्ति की कामना को मन में संजोये यह बार-बार जन्म लेता है। शायद एक बार अपनी जन्मभूमि पर पर उसकी मृत्यु हो जाय, तो वह फिर कभी दुबारा जन्म लेने का नाम ही न ले। लेकिन यह सब तो तभी सम्भव है जब जन्म और लेने का नाम ही न ले। लेकिन यह सब तो तभी सम्भव है जब जन्म और मृत्यु उसके वश में हों। यानी उसे इच्छा-जन्म और इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त हो।
लेकिन यह मेरी व्यक्तिगत कल्पना है। अपनी अवधारणा है। सूरज की वास्तविक मानसिकता से इसका कोई सम्बन्ध नहीं भी हो सकता है। मेरी ये मान्यताएँ सच के निकट भी हो सकती हैं, कोसों दूर भी। तो फिर वास्तविकता क्या है ?
कल्पनाएं कपोल-कल्पित भले हों, वे अमानवीय कदापि नहीं होतीं। स्वप्न की तरह वे सुषुप्त अवचेतन मन की दिशाहीन उड़ान भी नहीं होती। वे जागृत मन की चेतनता का मापदण्ड हैं। चाहे कोई कवि हो या दार्शनिक, खगोलशास्त्री हो या वैज्ञानिक, यथार्थ का पता लगाने के लिए उसे कल्पनाएँ तो करनी ही पड़ती हैं। बिना कल्पना किये सत्य की खोज हो ही नहीं सकती । सृष्टि में किसी के होने या न होने के पहले, उसकी कल्पना होती है। यह सच है कि किसी कल्पना के लिए कुछ ठोस और तर्कसंगत आधार का होना उसी तरह आवश्यकता है, जैसे चलने के लिए पैर और देखने के लिए आँखें।
तो क्या सूरज जिस दिन पूर्व में डूब जायेगा, उसके बाद फिर कभी नहीं उगेगा ? मूल प्रश्न यही है और प्रत्युत्तर में की गयी सारी कल्पनाओं का आधार इसे ही होना चाहिए। अब दूसरा प्रश्न यह उठता है कि स्वयं मूल-प्रश्न कितना निर्विवाद और तर्कसंगत है। क्या कभी सूरज के पूर्व में डूबने या पश्चिम में उगने की कल्पना भी की जा सकती है ? माता की जाँघ पर पुत्र के शव की कल्पना असम्भव भले न हो, लेकिन एक हृदय विदारक स्थिति अवश्य है। सन्तान की इच्छा और अनिच्छा ही माँ की ममता के पैर होते हैं। वैसे तो ममता कभी चलने की चीज़ होती ही नहीं। उसकी प्रकृति तो तरह है, जो अजस्त्र बहती है । उसकी कल्पना में केवल सन्तान के जन्म और जय के चित्र होते हैं मृत्यु और पराभव के नहीं। सूरज जिस दिन भी पूर्व में ठहरेगा, उसकी इच्छा मरने की नहीं, अपनों के बीच जीने की होगी। उसकी माँ उसके लोग और उसकी स्वयं की ममता उसे मरने भी तो नहीं देगी।
वैसे भी सूरज का पूर्व में, अपने लोगों के बीच ठहर जाना कोई नयी और असम्भव बात नहीं है। त्रेता में राम-जन्म के दिन एक बार ऐसी हो घटना घट चुकी है। पूर्व में उदय होने के बाद, एक महीना तक वह पश्चिम नहीं गया। राम-जन्म का महोत्सव देखने की लालसा में यहीं, अपने लोंगों के बीच ठहर गया था। उस समय पूर्व में एक महीने का दिन और पश्चिम में एक महीने की रात हुई थी और किसी को इस रहस्य का पता भी नहीं चल पाया।
मास दिवस के दिवस भे, मरम न जानेउ कोय। रथ समेत रवि थाकेऊ, निशा कवन बिधि होय।।
(रामचरित मानस) कौन जाने सूरज यही चाहता हो, लेकिन होता कुछ और है। माँ और मातृभूमि की निकटता किसे प्रिय नहीं ? लंका-प्रवास के समय उसकी स्वर्णिम छटा देखकर, एक बार रीझ-से उठे थे। वे राम से उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते नहीं अघा रहे थे। लेकिन लक्ष्मण जितना उसका बखान करते, राम को उतनी ही अपनी मातृभूमि अयोध्या की याद आने लगती । अन्त में वे लक्ष्मण को समझाते हुए कहने लगे थे-
अपि स्वर्ममयी लंका, न से लक्ष्मण रोचते । जननी, जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी।। (रामायण) अर्थात् “लक्ष्मण, यह लंका भले सोने की बनी हो, लेकिन मुझे अच्छी नहीं लगती। मुझे अयोध्या की माटी ही प्रिय है। माँ और मातृभूमि का स्थान तो स्वर्ग से भी ऊँचा है।
लगता है, सूरज को राम का जन्म ही नहीं, कर्म भी बहुत प्रिय है। राम-वनगमन की तरह, उसकी पश्चिम-यात्रा भी उसकी विवशता न होकर, कुछ खास प्रयोजन रखती हो। वह वहाँ बसने नहीं, कुछ और करने जाता हो। संयोग या कुयोग, अपने अभियान में यह बार-बार असफल हो रहा है। लेकिन प्रयास नहीं छोड़ता। वहाँ जाकर वह अस्त भले हो जाता है, कभी अस्तित्वहीन नहीं होता। अस्त होना और अस्तित्वहीन होना दो अलग-अलग बातें हैं। यह तो प्रकाश और अंधकार का, सत्य और असत्य का शायद कभी न समाप्त होने वाला एक सनातन युद्ध है, जो अनादिकाल से चल रहा है और अनन्तकाल तक चलता रहेगा। प्रकाश का अंधकार में विलीन होना, अंधकार के अस्तित्व को समाप्त करने का एक सहज प्रयास है।
यह दो संस्कृतियों का युद्ध है। वस्तुतः पूर्व और पश्चिम, दो दिशाएँ नहीं, दो सभ्यताएँ हैं। दो अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं। जिस तरह राम और रावण तत्कालीन उत्तरी और दक्षिणी सभ्यताओं के प्रतीक थे और उनका युद्ध दो विपरीत संस्कृतियों के बीच लड़ा गया युद्ध था, उसी तरह प्रकाश और अंधकार क्रमशः पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं के प्रतीक हैं। पूर्वपुत्र सूरज राम की ही तरह बार-बार अंधकार के विनाश के लिए पश्चिम की ओर प्रस्थान करता है किन्तु उसका प्रकाशपूंज, उसका तेज अस्थायी तौर पर ही सही, पश्चिम के सांस्कृतिक अंधकार के आधिक्य में विलीन हो कर भी उसे समाप्त नहीं कर पाता । वह अपना सब कुछ समर्पण करके भी उनके सांस्कृति दरिद्रता खत्म नहीं कर पाता । वह बार-बार जाता और लुट कर लौट आता है, लेकिन एक उपकारी पुरुष की तरह अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता ।
हम इसे ही सूर्य का अस्त होना कहते हैं जो उसकी मृत्य या अस्तित्व-हीनता की स्थिति कदापि नहीं है। यह तो सूरज का एक अथक और अनवरत प्रयास है - पाप पर पुण्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का । लगता है, अंधकार में डूबती-उतराती पश्चिम की विकल संस्कृति बार-बार सूरज से गुहार करती है-
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय
और वह जन्म लेते ही पूर्व से पश्चिम की ओर असत्य और अंधकार पर विजय प्राप्ति के लिए चल पड़ता है। प्रकाश और अंधकार का यह अनिर्णीत युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक हार या जीत का कोई फैसला न हो जाय। चाहे उदयकाल हो अथवा अस्त की स्थिति, महात्मा सूरज न कभी अपना रंग बदलेगा और न ही कभी अपना परोपकारी स्वभाव छोड़ेगा। सारी धरती को वह अपने सख्त कर्मानुशासन की डोर में बाँधे हुए हैं। उसके अस्त होते ही सारी सृष्टि को जम्हाई आने लगती है। क्या मनुष्य और क्या पशु-पक्षी सब अपने-अपने कर्म-पथ से विरत हो, विश्राम चाहने लगते हैं। लगता है जैसे सृष्टि की क्रियाशीलता का चक्का ही धरती में धँस गया हो । लेकिन उदय होते ही सूरज अपने कर्मक्षेत्र की ओर चल पड़ता है और सारी दुनिया उसके पीछे समभ्वतः यह सोचते हुए अपने-अपने कर्म में पुनर्लीन हो जाती है। –“कर्मण्येवाधिकारस्ते”।।
35, माधव मार्केट, लंका, वाराणसी, उत्तरप्रदेश
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