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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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  लघुकथा

    

अफ़सोस

 

            लछमन प्रसाद ने सुबह-सुबह दुकान खोली ही थी कि बिरजू मुँह लटकाए हुए दुकान की तरफ आता दिखाई दिया। बिरजू ने बिना राम-राम किये ही सीधे पूछा, “सेठ चादरें तो होंगी न?”

 

 लछमन प्रसाद ने किंचित संवेदनापूर्वक पूछा, “बिरजू इतना उदास क्यों है? क्या बात है? सब ठीक तो है न?” बिरजू ने बताया कि रात उसके पिता गुज़र गए। माँ  ने चादर मँगवाई है पिता पर डालने के लिए। बिरजू का ताउफ रामदत्त एक नेक आदमी था और लछमन प्रसाद का पुराना ग्राहक भी था। लछमन प्रसाद ने रामदत्त की मौत पर अफ़सोस ज़ाहिर किया और मौके के हिसाब से एक चादर निकाल कर बिरजू को दे दी। बिरजू ने पैसे चुकाए और चादर को काँख में दबाकर चला गया।

 

            गाँव में एकमात्र लछमन प्रसाद की दुकान ही तो थी जिस पर कपड़ा-लत्ता भी मिल जाता था। लोगों को बड़ी सहूलियत होती थी नहीं तो व़क्त बे व़क्त एक छोटी-सी चीज़ या कपड़े के लिए शहर भागो। उतने की चीज़ नहीं जितना किराया लग जाए और उपर से व़क्त की बरबादी अलग से। लछमन प्रसाद भी इस बात को बखूबी जानता था और हर स्थिति का पूरा फ़ायदा उठाता था लेकिन इसके बावजूद वह बदनाम किस्म का दुकानदार नहीं था। लछमन प्रसाद न तो घमण्डी ही था और न कभी ऊँची आवाज़ में ही बोलता था। मिलनसार भी बहुत था लछमन प्रसाद। दो पैसे ज्यादा ले भी लेता तो बातों से पेटा भर देता था ग्राहक का। ग्राहक का दिल कभी नहीं दुखाता था लछमन प्रसाद।

 

            लछमन प्रसाद ने देखा रामदत्त गुज़र गया है। बड़ा परिवार है रामदत्त का। रामदत्त के कई भाई, बेटे और भतीजे हैं। उन सब की बहुओं को चादरें चाहिए। चादरें खरीदने के लिए अभी लाइन लग जाएगी दुकान पर। लछमन प्रसाद को याद आया कि अंदर गोदाम में दस-बारह चादरें पड़ी हैं जो चूहों ने काट रखी हैं। सस्ती चादरें और ऊपर से कटी हुई। कई साल से पड़ी हैं कोई मुफ़्त में लेने को भी तैयार नहीं होता। आज मौका है इनके दाम उठाने का नहीं तो साल दो साल में इतनी गंदी हो जाएँगी कि फिंकवानी पड़ेंगी।

 

            लछमन प्रसाद ने फौरन से पेशतर दुकान में से नई चादरों के सारे बंडल उठाए और उन्हें ले जाकर अंदर रख दिया तथा अंदर से कटी हुई चादरों का बंडल लाकर दुकान में रख दिया। जैसा कि अनुमान था चादरें लेने के लिए लोगों का आना शुरु हो गया। लछमन प्रसाद ने पहले तो रामदत्त की मौत पर अफ़सोस ज़ाहिर किया और फिर कहने लगा, ``भाई चादरें तो हैं लेकिन उनमें थोड़ा सा नुक्स है। कहीं-कहीं चूहों ने चोंट लगा रखी है। क्या करूँ चूहों ने हजारों का कपड़ा खराब कर दिया। डेढ़-डेढ़ सौ रुपये कीमत की चादरें थीं सारी चादरों का मठ कर दिया इन चूहों ने। एक साफ चादर थी सो वो बिरजू ले गया। अब ये चल जाएँ तो ले जाओ। सौ-सौ रुपये में लगा दूँगा।´´

 

            दोपहर होने से पहले हर हालत में रामदत्त को उठाना था। अब शहर जाने का समय भी नहीं था। लछमन प्रसाद ने समझाते हुए कहा,  “बुजुर्ग आदमी है कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ले जाओ इतनी खराब भी नहीं हैं काम चल जाएगा। जवान मौत होती तो मैं ख़ुद नहीं देता किसी कीमत पर ऐसी चादरें। अब काम तो चलाना ही है न, ले जाओ। और कम कीमत लगा दूँगा । अस्सी-अस्सी रुपये लगा दूँगा । देने को तो मैं मुफ़्त में भी दे दूँ  पर ऐसे मौके पर मुफ्त में कौन लेगा भला ?”

 

मरता क्या न करता वाली हालत थी। एक-एक कर आठ-नौ चादरें बिक गई। लछमन प्रसाद को उम्मीद थी कि शायद एक दो चादर और निकल जाए लेकिन उसकी उम्मीद धूमिल हो गई जब उसने देखा कि रामदत्त को श्मशान की ओर ले जा रहे हैं। फिर भी वह संतुष्ट नज़र आ रहा था।

 

            लछमन प्रसाद ने हिसाब लगाया तो उसके चेहरे पर खुशी दौड़ने लगी। उसने अपने लड़के से कहा कि कटी हुई सभी चादरों के दाम भी पूरे हो गए और दस-बीस रुपये का फ़ायदा भी। ये चार बची हुई चादरें मुफ़्त में समझो। कोई और बुड्ढा स्वर्ग सिधरेगा तो ये चार भी निकल जाएँगी और कुछ  दाम भी मिल जाएँगे। इसके बाद लछमन प्रसाद ने बेटे से कहा, “चल ये सभी कटी हुई चादरें अंदर पहुँचा दे और अंदर से साफ चादरें लाकर यहाँ दुकान में रख दे।

 

            लछमन प्रसाद खुश था और रामदत्त के बारे में ही सोच रहा था। रामदत्त सचमुच एक नेक आदमी था जो मरने के बाद भी फायदा कर गया था। लछमन प्रसाद को ऐसे आदमी के गुज़र जाने पर अब सचमुच अफ़सोस हो रहा था। लछमन प्रसाद उठा और अंदर जाकर लकड़ी के दो बड़े-बड़े टुकड़े उठा लाया। लकड़ी के टुकड़ों को कंधें पर रखे अब वह उस ओर जा रहा था जिस ओर अभी-अभी रामदत्त की अर्थी गई थी।

सीताराम गुप्ता

.ड़ी.106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली-110034

 

 

 

 

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हाथी के दाँत

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प्रगतिशीलता

अफ़सोस

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