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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  लघुकथा

    

प्रगतिशीलता

            प्रोफ़ेसर अनिल कुमार और डॉक्टर मोनिका दोनों ही अत्याधुनिक प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति हैं लेकिन अपनी बेटी सुरंजना की शादी के मामले में दोनों ने ही ज़िद पकड़ ली। उन्होंने फैसला कर लिया कि सुरंजना की शादी होगी तो सिर्फ रविश से लेकिन सुरंजना ने बगावत कर दी। वह रविश को पसंद नहीं करती थी। रविश अच्छा लड़का है इसमें शक नहीं इसलिए सभी परिचितों और घरवालों ने सुरंजना को समझाने का पूरा प्रयास किया कि वह ज़िद छोड़ दे लेकिन सुरंजना ने किसी की एक नहीं सुनी। थक-हारकर प्रोफ़ेसर अनिल कुमार ने अपनी बूढ़ी माँ से कहा कि माँ  तुम्हीं समझाओ न सुरंजना को। माँ बेचारी पुराने ज़माने की अनपढ़ औरत! प्रोफ़ेसर अनिल कुमार को पूर्ण विश्वास था कि माँ सुरंजना पर माँ-बाप की इच्छा के अनुसार रविश से शादी करने के लिए पूरा दबाब डालेगी। माँ  ने सारी बात ध्यानपूर्वक सुनने के बाद कहा, “बेटा अनिल इसमें ज़िद की क्या ज़रूरत है। जब सुरंजना को ही वो लड़का पसंद नहीं तो क्या ज़रूरी है उसी लड़के से सुरंजना की शादी करना? यदि सुरंजना को कोई और लड़का पसंद है तो उससे उसकी शादी कर दो वरना कोई और अच्छा लड़का मिल जाएगा। लड़कों की कोई कमी थोड़े ही है।

 

            प्रोफ़ेसर अनिल कुमार माँ  का मुँह देखते रह गए। वे कभी सोच भी नहीं सकते थे कि उनकी माँ के विचार इतने आधुनिक हो सकते हैं। प्रोफ़ेसर अनिल कुमार की प्रगतिशीलता उन्हें ही मुँह चिढ़ाती प्रतीत हो रही थी।

सीताराम गुप्ता

.ड़ी.106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली-110034

 

 

 

 सीताराम गुप्ता की लघुकथाएँ

गिरेबान

लकीर

प्रतिद्वंद्वी

हाथी के दाँत

व्यस्तता

प्रगतिशीलता

अफ़सोस

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