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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  लघुकथा

    

व्यस्तता

 

            जैसे ही टेलिफोन की घंटी बजी सुरभि ने फौरन फोन उठा लिया। दूसरी तरफ से अनुपम की आवाज़ सुनाई दी, ``थैंक गॉड! कम से कम तुम्हारा फोन तो मिला सुरभि। चार लोगों को फोन कर चुका हूँ लेकिन सभी के फोन एंगेज जा रहे हैं।

 

क्यों क्या बात है? कहाँ से बोल रहे हो इस समय?´´ सुरभि ने अनुपम से पूछा।

``स्टूडियो से ही बोल रहा हूँ, ´´अनुपम ने बताया और सुरभि को आवश्यक निर्देश देते हुए कहा,  “ऐसा करो पहले तो फौरन अपना चैनल वाई प्लस लगाओ। इस समय फोन इन प्रोग्राम चल रहा है जिसमें विशेषज्ञ पैनल को दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर देने हैं। अब तक एक भी दर्शक का फोन नहीं आया। मैं लाइन चालू रखता हूँ जब संकेत मिले तुम्हें फोन पर प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न पूछने के लिए तीन लोगों को और तैयार रखना है।इतना कहने के बाद अनुपम ने भी बता दिया कि क्या-क्या पूछना है।

 

            जैसे ही सुरभि ने चैनल वाई प्लस लगाया कार्यक्रम के समन्वयक की आवाज़ सुनाई दी,  “हमारे पास बहुत से दर्शकों के फोन कॉल्स आ रहे हैं। इस समय लाईन पर हमारे साथ हैं नई दिल्ली से रागिनी। रागिनी हमारे कार्यक्रम में आपका स्वागत है। आप हमारे विशेषज्ञ चैनल से प्रश्न पूछ सकती हैं।

 

           

थैंक्यू सर! पहले तो मैं इस सफल प्रोग्राम के लिए आपको कांग्रेच्युलेट करना चाहूँगी,” सुरभि ने कहा। कार्यक्रम के समन्वयक ने अत्यंत तत्परता से कहा,  “धन्यवाद रागिनी, आप जल्दी से अपना प्रश्न पूछें क्योंकि हमारे पास समय की कमी है और अन्य बहुत से दर्शक भी लाइन पर बने हुए हैं।

 

            नई दिल्ली से रागिनी विशेषज्ञ पैनल से जल्दी-जल्दी प्रश्न पूछ रही थी और उसकी बगल में बैठे हुए दरिया गंज से मोहित रोहिणी सैक्टर सात से स्वाति तथा वसुन्धरा कॉलोनी ग़ाजियाबाद से अशरफ़ प्रश्न पूछने की तैयारी में व्यस्त थे।

सीताराम गुप्ता

.ड़ी.106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली-110034

 

 

 

 

 

सीताराम गुप्ता की लघुकथाएँ

गिरेबान

लकीर

प्रतिद्वंद्वी

हाथी के दाँत

व्यस्तता

प्रगतिशीलता

अफ़सोस

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