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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  लघुकथा

लकीर

 

महेन्द्रनाथ जैसे ही पंडाल में दाखिल हुआ लंबाई में लगी कुर्सियों की सबसे आगे की पंक्ति में पहली ही कुर्सी पर वेदप्रकाश जी बैठे दिखलाई पड़े। महेन्द्रनाथ ने पहले दोनों हाथ जोड़ कर वेदप्रकाश जी को नमस्कार किया और फिर झुककर उनके चरण स्पर्श किये। महेन्द्रनाथ के साथ उसका बेटा आदित्य भी था जो इंजीनियर है। पिता की ही तरह आदित्य ने भी अभिवादन के उपरांत झुककर वेदप्रकाश जी के चरण स्पर्श किये। वेदप्रकाश जी के न तो हाथों में ही कोई हरकत हुई और न चेहरे पर ही किसी प्रकार के भाव प्रकट हुए। अभिवादन और चरण स्पर्श की प्रतिक्रिया स्वरूप एकदम सपाट लहजे में उन्होंने बस इतना ही कहा, `न म स्ते ।´

 

            महेन्द्रनाथ पास की कुर्सी पर ही बैठ गया और वेदप्रकाश जी की ओर मुखातिब होकर उनसे पूछा, ``मामाजी क्या हाल-चाल हैं? आपका स्वास्थ्य कैसा है?´´

 

 ``ठीक ही तो है,´´ वेदप्रकाश जी ने उसी तरह निस्पंद बने रहते हुए उपेक्षा से संक्षिप्त-सा आध-अधूरा जवाब टिका दिया। उसके बाद वेदप्रकाश जी की निगाहें आने वाले नये मेहमानों को खोजने में लग गई। वेदप्रकाश जी नये मेहमानों का स्वागत करने में व्यस्त हो गए। आदित्य जो अभी तक खड़ा था पापा के इशारा करने पर उनके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया।

 

            पंडाल में खूब गहमागहमी थी। काफी देर हो चुकी थी फिर भी मेहमानों का ताँता लगा हुआ था। वेदप्रकाश जी की नई कोठी का मुहूर्त था आज। बहुत अच्छी कोठी बनवाई है वेदप्रकाश जी ने। देखकर लोग दंग रह जाते थे। कोठी के सामने ही खुले मैदान में विशाल पंडाल लगा था जहाँ दावत चल रही थी। लगभग आध घण्टा हो गया था महेन्द्रनाथ और आदित्य को आए हुए और महेन्द्रनाथ को जोर की भूख भी लग गई थी लेकिन मामाजी ने न तो उन्हें खाने के लिए कहा और न कोई बातचीत ही की। दरअसल वेदप्रकाश जी का भी कसूर नहीं है कुछ उम्र का भी तकाज़ा है। अब अस्सी-बयासी बरस के होने को आए हैं वेदप्रकाश जी तो फर्क तो पड़ेगा ही। यही सोचकर महेन्द्रनाथ ने स्वयं को तसल्ली देने की कोशिश की लेकिन वेदप्रकाश जी बाव़फी सभी लोगों को तो बड़े आग्रह से खाने के लिए कह रहे थे।

 

            महेन्द्रनाथ बहुत ही स्वाभिमानी किस्म का आदमी है। साफ बात करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। न ग़लत करता है और न किसी की ग़लत बात मानता ही है महेन्द्रनाथ। उसके इन्हीं अवगुणों के कारण कुछ लोग हमेशा ही उससे खफ़ा रहते हैं जिनमें मामाजी भी एक हैं। उनका कहना है कि महेन्द्रनाथ की कोई औकात नहीं फिर भी महेन्द्रनाथ अपने आपको न जाने क्या समझता है और कोई भी अवसर हो ये बात उनके दिलो-दिमाग़ पर हावी रहती है। आज उन्होंने स्वयं निमंत्रित किया था महेन्द्रनाथ को। वैसे भी घर आए मेहमान की उपेक्षा ठीक नहीं।

 

            वेदप्रकाश जी की इच्छा थी कि महेन्द्रनाथ कुछ  बोले तो वो उलटा-सीध जवाब देकर उसे अपमानित कर थोड़ा सुख पाएँ । शायद इसीलिए महेन्द्रनाथ को आमंत्रित  किया था उन्होंने लेकिन उनके मनसूबों पर पानी फिर गया क्योंकि महेन्द्रनाथ बिल्कुल  ख़ामोश बैठा था। पास में उसका जवान बेटा बैठा था और ऐसे में वह अपना संतुलन खोने की ग़लती नहीं कर सकता था इसलिए उसने मन में कहा, ``मामाजी सम्मान करना नहीं चाहते तो न सही पर उन्हें अपमान करने का मौव़फा भी हर्गिज नहीं दूँगा।´´ वैसे तो महेन्द्रनाथ शांत बैठा था फिर भी मानसिक उथल-पुथल से बचने के लिए वो आदित्य से बातचीत करने में व्यस्त हो गया।

 

            महेन्द्रनाथ को इस अवस्था में देखकर वेदप्रकाश जी ने पैंतरा बदला। उन्होंने महेन्द्रनाथ को बिना कुछ कहे ही उसकी पूँछ निकालने का मन बना लिया। वेदप्रकाश जी में युवकों जैसी फूर्ती आ गई और अब वे खड़े होकर मेहमानों का स्वागत करने लगे। वे बड़े प्यार से सबका अभिवादन स्वीकारते। बच्चों और युवकों की पीठ थपथपाते उनके देर से आने की शिकायत करते लेकिन बड़े स्नेह और अपनत्व से। वेदप्रकाश जी सबसे कहते कि खाना ठीक से खाना और खाना खाने के बाद कोठी में  ज़रूर देखकर जाना और फिर देर तक कोठी के निर्माण से जुड़ी घटनाओं की चर्चा में लीन हो जाते लेकिन कनखियों से बीच-बीच में महेन्द्रनाथ को देखना भी नहीं भूलते।

           

वेदप्रकाश जी की लकीर महेन्द्रनाथ की लकीर से और ज्यादा बड़ी होती इससे पहले ही महेन्द्रनाथ ने उठते हुए आदित्य से कहा, ``आदित्य बेटे काफी देर हो चुकी है चलो भोजन कर लें और तुम्हें सुबह ऑफिस भी तो जाना है।´´ खाने की ओर जाने से पहले महेन्द्रनाथ ने ही मामाजी से कहा, ``मामाजी आप भी आओ न थोड़ा सा भोजन ले लो या फिर मैं यहीं ले आता हूँ ¡ आप के लिए  लेकिन वेदप्रकाश जी अपनी लकीर को बड़ा करने के लिए महेन्द्रनाथ की बात को अनसुनी कर एक नवागंतुक से कोठी की चर्चा में पुन: व्यस्त हो गए।

सीताराम गुप्ता

.ड़ी.106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली-110034

 

 

 

सीताराम गुप्ता की लघुकथाएँ

गिरेबान

लकीर

प्रतिद्वंद्वी

हाथी के दाँत

व्यस्तता

प्रगतिशीलता

अफ़सोस

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