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बेताब हो रही है भूरी पृथ्वी
गौरेया की भाषा बिखेर नहीं पायेंगे अब मनु के बाज नहीं बन पायेगी अब मेमने की माँसलता किसी दुर्दांत भेड़िये की जीभ का आस्वाद माँस के लोथड़े और हड्डियों के सघन रचाव की आपसदारी में हक़ की पलकें खुल रही हैं धीरे-धीरे और जिंदा प्रश्न नामज़द किये जा रहे हैं हर तरह के शोषण के हलाहल के खिलाफ़ समय के चाक पर स्पष्ट अक्षांसो सहित घूमने को बेताब हो रही है भूरी पृथ्वी (गो कि ख़तरे कम नहीं) झुग्गी-झोपड़ी और फुटपाथ पर भूखे और अधनंगे बच्चों की भयाक्रांत आँखों में डालियों सहित हिल रहे हैं अनार के लाल-लाल फर आप, उदास क्यों हुए जा रहे हैं, मान्यवर सदियों से पपड़ाये होठों की ओर जब बढ़ रहा है एक गिलास स्वच्छ पानी का
रेलवे कॉलोनी नं. 13 260-यू, डॉ. अंडाल (बर्दवान) पश्चिम बंगाल - 713321
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