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चुन-चुन कर नफ़रत के काँटे . . . .
जीवन एकमहासागर है भाँति भाँति की जिसमें आ कर मनु रूपी नदियाँ मिलती हैं और विषमताएँ सब मिट कर एक इकाई बन जाती हैं स्वेच्छा से अस्तित्व मिटा कर चिदानंदमय हो जाती हैं । खारा सागर ख़ुद रह कर भी मीठा जल ही वह बरसाए । चुन चुन कर नफ़रत के कांटे प्यार के फूल खिलाते जाएँ ॥
यह कैसा संयोग विधाता कैसी श्रृष्टि रची है तुमने दिन औ रात साथ में रख कर सुख दुख का नाता जोड़ा है जीवन के सारे अंगों का भी प्रतिरूप बना रखा है आने के संग जाना रखा पाने के संग खोना रखा प्रेम भाव उत्पन्न किया तो नफ़रत की भी नीव डाल दी ।
ऐसा लेकिन क्यों करते हो ? जान बूझ कर चुप रहते हो । कुछ तो बोलो आँखें खोलो आ कर देखो यह सुन्दर सी अपनी रचना जिसमें अब केवल नफ़रत है काँटों से दामन जर्जर है प्रेम पुष्प अब कम खिलते हैं । धीरे धीरे जो खोया है कहो ! बताओ ! कैसे पाएँ ? चुन चुन कर नफ़रत के काँटे प्यार के फूल खिलाते जाएँ ॥
है संतों की यह गुरु वाणी और यही उनकी इच्छाएँ चुन-चुन कर नफ़रत के काँटे प्यार के फूल खिलाते जाएँ ॥ मिलजुल कर आओ अब हम सब अपनी अपनी कसम उठाएँ नफ़रत की हर जड़ को काटें प्रेम वृक्ष जिससे फल पाएँ । चुन-चुन कर नफ़रत के काँटे प्यार के फूल खिलाते जाएँ ॥
21 Bideford Drive, Selly Oak Birmingham, B29 QG, U.K.
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