ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  कविता

                        

साँप को रस्सी समझता जो रहा

 

बीज से वह

वृक्ष बन

अब

सामने मेरे खड़ा है

देखता हूँ वह बहुत

मुझसे बड़ा है

लोग सब

अब दे बधाई

कह रहे हैं

वृक्ष के नीचे चलो

छाया मिलेगी

मानता हूँ सत्य ही

सब कह रहे हैं

जानता हूँ पर नियति

पीछा करेगी

पर कदाचित

ज़िंदगी का सत्य तो

कुछ और ही है

दीप के नीचे

अंधेरा ही अंधेरा

मोह-भय का व्याकरण

सबसे निराला

साँप को रस्सी

समझता जो रहा   

 
कृष्ण कुमार

21 Bideford Drive, Selly Oak

Birmingham, B29 QG, U.K.

                       

 

माह के कवि

कृष्णकुमार (इंग्लैंड)

कवि का परिचय-यहाँ पढ़ें

साँप को रस्सी समझता जो रहा

अन्त में रोता है

उसी को ढ़ूँढना

टूटने को

चुन-चुन कर नफ़रत के काँटे

कालजयी रचनाकार

मुक्तिबोध, गजानन माधव

समकालीन कविताएँ

ओमप्रकाश वाल्मीकि

कृष्णमोहन झा

निर्मल नवेन्दु

प्रीति

प्रवासी कवि

सुदर्शन प्रियदर्शिनी - अमेरिका

अंजना संधीर - अमेरिका

नयी कलम

सी.आर. राजश्री

के.सी दुबे

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google

 
 WWW http://www.srijangatha.com