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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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 हिंदी-विश्व

  

संदर्भः इंग्लैंड

 

हिन्दी एवं प्रवासी भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी


तेजेन्द्र शर्मा

 

म जब भी इंगलैण्ड में हिन्दी के विषय में बात करते हैं तो हम भावनात्मक हो जाते हैं और अपनी तर्क शक्ति को ताक पर रख देते हैं। हम यह सोच कर नाराज़गी ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि युनाईटेड किंगडम में कभी जी.सी.एस.सी. में हिन्दी एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी। आज स्कूलों में हिन्दी कहीं नहीं दिखाई देती। हिन्दी मंदिरों और निजी शिक्षकों के घरों तक सीमित हो गई है।

 

किसी भी विषय पर बातचीत से पहले आवश्यक है कि हम उस विषय की वस्तुस्थिति को ठीक से समझ लें। वस्तुस्थिति यह है कि एक भाषा के रूप में इंग्लैण्ड में हिन्दी का वर्तमान बहुत संतोषजनक नहीं है और इसके भविष्य के लिए भी बिना अति आशावादी बने हमें केवल कर्म करना सीखना होगा। अतीत में हिन्दी इंग्लैण्ड में स्कूलों में एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी, लेकिन हिन्दी स्कूलों से ग़ायब हो गई क्योंकि उन स्कूलों में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी मिल नहीं पा रहे थे। आजकल इंग्लैण्ड में बहुत सी ग़ैर-सरकारी संस्थाएं हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार के कामों में जुटी हैं। देश भर में हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताएं करवाई जा रही हैं, कहानी कार्यशालाएं की जा रही हैं, हिन्दी में कम्पयूटर में काम काज पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन बिना किसी विश्विद्यालय से पंजीकृत हुए बिना यह गतिविधियाँ आधिकारिक स्वरूप नहीं पा सकती हैं।

 

हमें भावनाओं को तज कर इस ओर ध्यान देना होगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों। निरपेक्ष रूप से किसी नतीजे पर पहुंचना होगा। जब हम भारत से इंगलैण्ड आए प्रवासियों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि भारत से इंगलैण्ड आने वालों में सबसे अधिक संख्या गुजरात एवं पंजाब प्रदेशों से है। पंजाब से आने वालों में भी सिख धर्म के अनुयायियों की संख्या कहीं अधिक है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं पंजाबी है। इस के अतिरिक्त तमिल, बंगाली एवं महाराष्ट्रियन भी काफ़ी संख्या में यहाँ प्रवासी बन कर आए। इन सभी के लिए हिन्दी बोलचाल की भाषा तो थी, लेकिन कहीं भी लिखने पढ़ने वाली भाषा नहीं थी। इसलिए जब पहली पीढ़ी के प्रवासियों ने पाया कि उन्हें विलायत में सबसे अधिक समस्या उन्हें अंग्रेजी न आने से हो रही है तो उन्होंने अपनी आगामी पीढ़ी से घर में तो अपनी मातृभाषा में बातचीत जारी रखी लेकिन बाहर दुनिया से संघर्ष करने के लिए उन्हें अंग्रेज़ी सीखने के लिए बढ़ावा दिया। यानी कि इंगलैण्ड आने वाले अधिकतर भारतीय मूल के परिवारों के लिए हिन्दी मात्र एक बोली थी जिस के माध्यम से वे दूसरे राज्य के रहने वालों से बातचीत कर सकते थे यानि कि संपर्क भाषा। और संपर्क भाषा भी निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए। मध्य वर्ग या फिर उच्च मध्य वर्ग की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही थी। हमे याद रखना यह होगा कि यह भी प्रवासियों की पहली पीढ़ी तक ही सीमित था। उसके बाद की पीढ़ियों की अपनी एक जबान बन चुकी थी - अँगरेज़ी।

 

हिन्दी बोलने वाले परिवारों में भी बच्चों को यही कहा जाता था, "अरे हिन्दी सीख लो। कल को भारत जाओगे, तो दादी और नानी से कैसे बात करोगे।'  मूलभूत समस्या यह है कि जो लोग अपने बच्चों को यह समझाया करते थे, आज वही दादा दादी और नाना नानी बन चुके हैं। और उन सबको अँगरेज़ी आती है। इसलिए उनके लिए आजके बच्चों को दादी और नानी के हवाले देकर हिन्दी सीखने के लिए कहना भी संभव नहीं।

 

पहली पीढ़ी के प्रवासियों के पास न तो कोई ज़रिया था और न ही हिम्मत कि वे हिन्दी के लिए समय निकाल पाते। शायद उन्हें इस की आवश्यक्ता भी नहीं थी। उस समय न तो कोई हिन्दी का रेडियो स्टेशन था और न ही किसी अँगरेज़ी के रेडियो अथवा टेलिविज़न सेन्टर से ही कोई हिन्दी के कार्यक्रम प्रसारित होते थे। जीवन इतना संघर्षपूर्ण था कि हिन्दी के लिए समय निकाल पाना लगभग अय्याशी के समान हो जाता।

 

अस्सी के दशक में विडियो रिकॉर्डर की लोकप्रियता और हिन्दी फ़िल्मों की कानूनी और ग़ैर-कानूनी वीडियो केसेटों ने इंगलैण्ड में हिन्दी को लोकप्रिय बनने का अचानक एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया। बच्चे बड़े सभी इकठ्ठे बैठ कर अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखा करते थे। शोले फ़िल्म के डायलॉग याद करके इंग्लैण्ड के बच्चे भारत से आने वाले अतिथियों पर अपने हिन्दी ज्ञान की धाक जमाते थे। प्रवासियों की पहली पीढ़ी को भी अचानक जैसे अपने पैरों तले एक नई ज़मीन का अहसास होने लगा था। डा हरिवंश राय बच्चन अवश्य ही हिन्दी के महान् कवियों में से एक हैं। किन्तु हिन्दी भाषा को लोकप्रिय बनाने के मामले में उनके पुत्र अमिताभ ने उन्हें कहीं पीछे छोड़ दिया।

 

स्कूलों में हिन्दी पढ़ने की न तो किसी को आवश्यकता महसूस होती थी और न ही किसी को इस बात का ख़्याल ही आता था। हिन्दी भाषी परिवारों को इस बात की प्रसन्नता थी कि उनकी संताने कम से कम हिन्दी बोलने तो लगी हैं। वहीं ग़ैर हिन्दी भाषी परिवारों के लिए हिन्दी फ़िल्में भारत से जुड़ने के एक साधन के रूप में उभर कर आई थीं। इंगलैण्ड में भारत से जुड़ाव के लिए हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त भारतीय क्रिकेट का भी खासा योगदान रहा। ख़ास तौर पर कपिल देव की टीम द्वारा 1984 में क्रिकेट के विश्व कप विजेता के रूप में उभर कर आने से भी यहां के बच्चों का भारत के प्रति अधिक सकारात्मक रुख पैदा हुआ। यही वह समय भी था जब बीबीसी ने रामायण और महाभारत जैसे विशुद्ध भारतीय टेलिविज़न सीरियल अपने चैनल पर दिखाने शुरू किये। भारतीय परिवारों के पास आज भी उन सीरियलों की रिकॉर्ड की गई व्हिडियो कैसेट मिल जाएंगी। भारतीय मूल के परिवारों में हिन्दी का माहौल पैदा करने में इन दो महत्वपूर्ण सीरियलों का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता।

 

जी़ टीवी का आगमन इंग्लैण्ड में हिन्दी के लिए एक महत्वपूर्ण घटना माना जा सकता है। अब उन घरों की दीवारें भी हिन्दी सुन सकती थीं जहाँ पहली व दूसरी या तीसरी पीढ़ी या तो अपनी मातृभाषा में बातचीत करती थीं या फिर अँगरेज़ी में। भारत में भी हिन्दी फ़िल्में मुख्यधारा की फ़िल्में मानी जाती हैं तो अन्य भाषाओं की फ़िल्में केवल क्षेत्रीय सीमाओं में बन्ध कर रह जाती हैं। फिर मराठी, गुजराती, पंजाबी, हरियाणवी, आदि भाषाओं की आम फ़िल्मों का स्तर भी कुछ विशेष अच्छा नहीं होता। इसलिए भी ज़ी टीवी के लिए यह एक महत्वपूर्ण पल था और उनके सामने कोई प्रतियोगी भी नहीं था। लेकिन एक बात देखी गई कि भारतीय मूल के ब्रिटिश बच्चे बॉलीवुड की फ़िल्मों में तो रूचि रखते हैं वहीं टेलिविजन सीरियल क्योंकि लम्बे खिंचते जाते हैं, यहाँ के बच्चे उनसे कतराते हैं। जहाँ एक ओर सनराईज रेडियो के रवि शर्मा, सरिता सभरवाल, रिकी लोबो, राम भट्ट इत्यादि तो भारतीय मूल के बच्चों के चहेते बन जाते हैं वहीं हिन्दी टेलीविज़न सीरियल उनके साथ कोई सम्बंध स्थापित नहीं कर पाते हैं।

 

हिन्दी की मूलभूत समस्या यह भी है कि भारत में ही उसको उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। विदेशों में अब तक हुए सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में एकमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाता रहा है कि 'हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए।' किसी भी भाषा के साथ इससे बड़ा मज़ाक हो ही नहीं सकता जो भाषा किसी देश की संसद की भाषा बनने के काबिल भी नहीं मानी जाती, उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा क्यों और किसके लिए बनाया जाए। जब कोई भूतलिंगम या श्रीनिवासन संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा तो उसे स्वयं ही हिन्दी भाषा समझ नहीं आएगी। तो फिर यह नाटक किसके लिए कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए। उसे वहाँ सुनेगा कौन? जब भारतीय मूल के लोग अपने बच्चों को ले कर भारत यात्रा पर ले कर जाते हैं तो बच्चे यह देख कर हैरान हो जाते हैं कि भारत में उनके समवयस्क हिन्दी बोलना छोटेपन का द्योतक मानते हैं। वहाँ का युवावर्ग इंग्लैण्ड के युवाओं से अधिक अंग्रेज़ीदां है।

 

यह पूछना एक फ़ैशन सा भी बन गया है कि यदि जापान और जर्मनी बिना अँगरेज़ी के आर्थिक ऊँचाईयों तक पहुँच सकते हैं, तो फिर भारत में हिन्दी की इतनी दुर्दशा क्यों। भारत एक विशाल देश है जिसकी एक भाषा कभी भी नहीं रही। हिन्दी कभी भी भारत में राजकाज की भाषा नहीं रही है। यह कभी संस्कृत थी तो कभी फ़ारसी तो कभी उर्दू। और आज यह स्थान अँगरेज़ी के हिस्से में है। इसलिए यह प्रश्न एक प्रकार से बेमानी सा हो जाता है। जो भाषा कभी भी पूरे भारत की भाषा नहीं रही, वो भला जापानी या जर्मनी भाषा का मुक़ाबला किस प्रकार कर सकती है।

 

कहीं कहीं ग़लतफ़हमी यह भी है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। वास्तविकता यह है कि हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया था और जब तक हिन्दी पूरी तरह से कामकाज के काबिल नहीं बन जाती राजकाज का काम अँगरेज़ी में भी किया जाएगा। यह 'अँगरेज़ी में भी' आजतक 'अँगरेज़ी में ही' बना हुआ है। भारत सरकार पचपन वर्षों में भी हिन्दी को इतना सक्षम नहीं बना पाई है कि राज काज का काम हिन्दी में किया जा सके। 'अँगरेज़ी में भी' के स्थान पर सरकारी काम काज 'हिन्दी में भी' करवाया जाता है।

 

इंग्लैण्ड में जब कभी किसी भी हिन्दी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा के कार्यक्रम में जाने का अवसर मिलता है तो दिल में कहीं एक अन्जाना सा डर बैठने लगता है कि अगले कार्यक्रम से पहले कौन-सा पीला पत्ता पेड़ से गिर चुका होगा। उन कार्यक्रमों में आने वालों की औसत आयु पचास वर्ष के उपर ही महसूस होती है। इस देश की नई पीढ़ी को हिन्दी साहित्य के कार्यक्रमों में तो कोई रूचि नहीं है, लेकिन देखने को मिला है कि जब कभी बॉलीवुड के कार्यक्रम होते हैं या फिर ऐसे हास्य नाटकों का मंचन हो जैसे कि शादी एट बरबादी डॉट कॉम, नॉटी एट फ़ॉर्टी, हनीमून इत्यादि तो नई पीढ़ी भी हंसने के लिए पहुंच जाती है।

 

जिस प्रकार भारतीय उच्चायोग, यू.के. हिन्दी समिति, कथा (यूके), गीतांजलि बहुभाषी समाज, कृति यू.के., भारतीय भाषा संगम इत्यादि संस्थाएं इंग्लैण्ड में हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुटे हैं, नि:स्सवार्थ भाव से देश भर में हिन्दी पढ़ाते अध्यापक एवं साथ ही साथ बॉलीवुड की फ़िल्मों को इंगलैण्ड के मुख्यधारा सिनेमाघरों में दिखाने की शुरूआत हुई है, उससे उम्मीद बंधती है कि हमें निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। मंजिल दूर अवश्य हो सकती है, किन्तु यात्रा में सफलता अवश्य मिलेगी।

 

एक उदाहरण अपने घर से भी देना चाहूँगा। मेरी गुजराती(भाषी) पत्नी मेरे छोटे पुत्र से (जिसका जन्म लंदन में ही हुआ था) गुजराती में बात करती है। मेरा पुत्र उसे हिन्दी में जवाब देता है लेकिन मेरी ओर देखते ही अँगरेज़ी में बात करने लगता है। है न ख़ासी दिलचस्प स्थिति !

तेजेन्द्र शर्मा

74-A, Palmerston Road

Harrow & Wealdstone

Middx. HA3 7RW

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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