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उ परचों की सराय डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
कोई एक गिलहरी पत्ती-पत्ती गई कुतर जीवन हुआ अजनबीपन का छालों भरा सफ़र
यह कबंध सा युग बन बैठा भूलों का पर्याय घर अपना हो गया आज परचों की एक सराय
जलता जंगल नये आईने भटके इधर-उधर
रोके नहीं रुके पानी का यह मौसमी बहाव जलावर्तन का दर्द झेलता आँगन का मेहराब
सिरहाने के धरे फूल की किसको रही ख़बर
मणि-हारे तक्षक सी बस्ती की हैं नींद हराम अर्थहीन पैबंद जोड़ते बीते सुबहो-शाम
कितना कठिन यहाँ जी पाना गिनके चार पहर
मुख्य प्रबंधक, हिंदी राजभाषा ओएनजीसी, तेल भवन देहरादून, उत्तरांचल - 240003 डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
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