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उ
धूँ-धूँ जलती बस्तियाँ जितेन्द्र जौहर
मिली समूचे शहर को, दंगों की सौगात खूँ से लथपथ दिन मिले, आँसू-भीगी रात ।
चाकू, खंजर गोलियाँ, पत्थर सबके पास हरे रंग के होंठ पर, लाल-लाल-सी प्यास ।
मुल्ला बोला चीखकर, "काफ़िर है ये मार" उग्र भीड़ ने पेट में, खंजर दिया उतार ।
चप्पे-चप्पे पर पुलिस, हथियारों से लैस सन्नाटा लिखने लगी, पल में आँसू गैस ।
मुस्लिम ने 'अल्ला' कहा, हिन्दू बोला 'राम' बस इतनी-सी बात पे, बातें बनीं तमाम ।
दंगों की पटु पटकथा, लिखता है क्यों - कौन मालूम है सबको मगर, सब साधे हैं मौन ।
धूँ-धूँ जलती बस्तियाँ, दंगाई आज़ाद यह सुनकर खुश हो गए, सत्ता के सय्याद ।
न वो मस्ज़िद का हुआ, न ये मंदिर-भक्त दोनों को बस चाहिये, इक-दूजे का रक्त ।
ये कैसा कानून है, वाह, सियासत वाह खेत गधेड़ी खा गए, पकड़े गए जुलाह ।
एन-33/6, रेणुसागर सोनभद्र, उत्तरप्रदेश - 241318
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