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भारतीय बालसाहित्य
और विश्व-परिदृश्य
डॉ. श्यामसिंह शशि
आजकल
विश्व बालसाहित्य
में हैरी पॉटर की चर्चा जोरों पर है। भारत तथा विश्व चौंसठ
भाषाओं में उसके अनुवाद छप चुके हैं। करोड़ों बाल पाठकों ने
उन्हें पढ़ा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार हैरी पॉटर श्रृंखला का सातवाँ एवं
अंतिम बालउपन्यास हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोज 21
जुलाई 2007 को बाज़ार में आ जाएगा। बेवसाइट अमेजन और बार्नेस
एंड नोबल ने बिक्री के बारे में जो आँकड़े दिए हैं वे भारतीय
प्रकाशकों के लिए चौंकाने वाले हो सकते हैं । इस श्रृंखला के
छठवें उपन्यास हैरी पॉटर द हाफ़ ब्लड प्रिंस की बिक्री
के पहले दिन जितना व्यावसाय किया गया था, उसके मुकाबले अंतिम
उपन्यास की बिक्री दो सौ फीसदी अधिक दर्ज़ की गई तथा दुनिया-भर
में उसकी अब तक 32 करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं।
उपन्यास की लेखिका जे.के राउलिंग को मनोरंजन-जगत् की सबसे अमीर
महिला घोषित किया गया । वह अपने लेखन द्वारा अरबपति बनने वाली
विश्व बालसाहित्य की पहली रचनाकार हैं।
उक्त पुस्तक की कथावस्तु, लेखन, संपादन, प्रकाशन, तथा वितरण का
मूल्याँकन किया जाए तो पता चलेगा कि लेखिका ने जादुई फेंटसी
तथा रहस्य रोमाँच के ताने-बाने में पिरोकर बालमन को चकराया है।
साथ ही मीडिया हाइप व अन्य व्यय-साध्य प्रचार-माध्यमों द्वारा
बिजनेस एजेंसियों ने उसे प्रमोट किया है। इस पुस्तक का
दुनिया-भर में प्रमोट किया गया है। वस्तुतः विश्व के अनेक
उन्नत देशों में लिटरेरी एजेंट यह काम करते हैं जो व्यापारीकरण
की अद्यतन पद्धति अपनाकर फल-फूल रहे हैं। अमेरिका हो या
इंग्लैड या कोई अन्य उन्नत देश, वहाँ साहित्य का लेखक अपनी
पुस्तक लिखकर प्रकाशक को सौंप देता है, जिसके बदले उसे अच्छी
अग्रिम राशि भी मिलती है। भारत अथवा एशियाई देशों के प्रकाशकों
की तरह लॉलीपॉप की दक्षिणा देकर टा-टा नहीं किया जाता । यहाँ
इच्छित पुस्तकों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उतारने के लिए
व्यावसायिक स्तर पर मुद्रित शब्द, इंटरनेट न दृश्य-श्रव्य
माध्यमों द्वारा मार्केटिंग की आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया
जाता है। यही कारण है कि वहाँ के लेखक को सरकारी अथवा लाला की
नौकरी नहीं करनी पड़ती। वह केवल लेखक होता - लेखक।
इसी संदर्भ में एक प्रश्न बाल शिक्षाशास्त्रियों के समक्ष
उपस्थित होता है और वह यह, कि क्या किसी रचना का आकलन उसकी
बिक्री के आधार पर किया जाना चाहिए अथवा उसके सामाजिक सरोकार
से। यदि मनोरंजन को साहित्य का प्रयोजन मान लिया जाए तो फिर
साहित्य में निहित अर्थ स
-
हित ‘शब्दार्थों
सहितो काव्यम्’
को छोड़कर किस्सागोई, गुलशन नंदा सीरीज अथवा फुटपाथी ट्रेड
प्रकाशनों की तरह मार्केटिंग की उपलब्धि बनना पडे़गा। इसे हैरी
पॉटर प्रमोशन पद्धति का लघु रूप भी कह सकते हैं। हिंदी साहित्य
के लेखक-प्रकाशक जानते हैं कि गुलशन नंदा का उपन्यास कटी
पतंग भारतीय
भाषाओं के अतिरिक्त चीनी भाषा में भी बरसों पहले अनुदित हुआ
था जिसकी लाखों प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक गई थी। उन दिनों न तो
आज की तरह इंटरनेट था और न ही मीडिया हाइक के साधन। । भारतीय
प्रकाशकों की व्यावसायिक वृद्धि ने तो गुलशन नंदा सीरीज ही
शुरू कर दी थी। इसी प्रकार के फुटपाथी लेखन प्रकाशन द्वारा खूब
राशि बटोरी थी। लेकिन बेचारे गुमनाम ट्रेड मार्का लेखक को एक
पूरी पुस्तक की पांडुलिपि के लिए केवल सौ रूपए मिलते थे। काश,
भारतीय बालसाहित्य के वितरण के लिए किसी लक्ष्मी मित्तल की
कृपा दृष्टि पड़ जाती ।
हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के बालसाहित्य को आज भी प्रायः दोयम
दर्जे का साहित्य माना जाता है। इसमें दोष लेखक-प्रकाशक दोनों
का है। हमारे देश का लेखक अपवाद को छोड़कर अपनी रचना के अलावा
किसी और को पढ़ना नहीं चाहता। भारतीय भाषाओं के रचनाकार आपस
में ही एक-दूसरे की भाषाओं का साहित्य में भी केवल अँग्रेज़ी
की पुस्तकें पढ़कर ही अपने को एवरेस्ट मान लिया जाता है।
रुसी, चीनी, जापानी, फ्रेंच, स्पेनिश तथा अन्य भाषाओं के
साहित्य के अँग्रेज़ी अनुवाद पढ़ने की भी किसी को फ़ुर्सत
नहीं। इन भाषाओं की मौलिक कृतियाँ पढ़ने वाले लेखक उँगलियों पर
होंगे।
निराला ने कभी कहा था कि एक-पुस्तक को लिखने के लिए एक सहस्त्र
पुस्तकें पढ़नी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि लेखक दूसरों की
शैली अथवा सामग्री की नकल करें। हाँ-ज्ञान-वृद्धि के लिए तथा
पिष्ट-पेषण से बचने के लिए लेखक को बहुपठित, बहुश्रुत तथा
बहुभाषाविद् भी होना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में
उसे अव्वल नंबर का घुमक्कड़ भी होना चाहिए । जो भी हो, बाल
साहित्यकार का उत्तरदायित्व इसलिए भी और अधिक बढ़ जाता है कि
वह मासूम ज़िंदगी का चितेरा होता है। वह अपनी रचनाओं से बालमन
को नैसर्गिक आनंद प्रदान करता है। साथ ही उसे वैश्विक धरातल पर
मानव-मूल्यों की ओर भी आकर्षित करता है। बालसाहित्य का श्रेष्ठ
लेखक मूल्यपरक शिक्षा के लिए एक विशिष्ट शैली अपनाता है।
वह कोई कथा-वाचक नहीं है और ना ही डुगडुगी बजाने वाला मदारी।
वह शब्दों का जादूगर तो है, पर अंधविश्वासों का सौदागर नहीं
है। उसकी लेखनी मुसोलिनी या हिटलर की प्रजातीयता-राष्ट्रीयता
की पोषक नहीं है और न ही किसी लादेनी जिहाद की प्रचारक।
बालसाहित्य का लेखक बच्चों के लिए गुलाबी गीत लिखता है,
चिड़ियों की मनोरम राइम गाता है। वह बंदर, भालू, बिल्ली, चूहे
से लेकर डायनासोर तक पर कलम चलाता है। प्राकृतिक
प्रतीकों-बिबों से लेकर बाल-सुलभ विषयों को वह अपनी
रचना-धर्मिता से जोड़ता है। हम अपने बालसाहित्य के बिगत पर
दृष्टि डालें तो भारतीय बाङ्मय में बालसाहित्य
का स्वर्णिम इतिहास देखा जा सकता है। विष्णु शर्मा द्वारा
विरचित पंचतंत्र की कहानियाँ न केवल भारतीय भाषाओं में बल्कि
दुनिया-भर की भाषाओं में अनुदित होकर भारतीय संस्कृति की पताका
फहरा रही हैं। जातक कथाएँ हैमिंग्वे की तरह चीनी, जापानी, रूसी
के इतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध हैं। उपनिषदों की
कहानियाँ भी अरबी, फारसी में कभी अनूदित की गई थी।
इसी प्रकार हातिमताई आदि पुस्तकें तथा आदिवासी लोक कथाएं विश्व
के बालसाहित्य
में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। विश्व कवि रवींद्रनाथ
ठाकुर ने बच्चों के लिए भी लिकना अपना लेखकीय धर्म समझा।
परंतु कई बड़े संस्थानों द्वारा प्रकाशित हिंदी साहित्य के
इतिहास में भी न केवल बालसाहित्य
उपेक्षित है बल्कि हिंदी इतर भाषा-भाषी लेखकों के हिंदी लेखन
को भी नकार दिया गया है। फिर अमेरिका, इंग्लैड अथवा अन्य देशों
में रहने वाले भारतीय प्रवासी हिंदी साहित्यकारों को कौन याद
करता ?
वस्तुतः हिंदी साहित्य का संपूर्ण इतिहास लिखने की किसे
फ़ुर्सत है। ग़नीमत है, हिंदी बालसाहित्य
का इतिहास जयप्रकाश भारती जैसे मिशनरी लेखकों ने लिखने की
हिम्मत की तथा कुछेक अन्य लेखकों ने भी थोड़ा-बहुत लिखा, किंतु
भारतीय बालसाहित्य
का समग्र इतिहास आज भी अधूरा है।
विदेशी भाषाओं के बालसाहित्य-लेखकों में चार्ल्स डिकिंस,
मोपांसा, टॉलस्टाय, अरकदे, श़ैदार का कुछ बालसाहित्य
हिंदी में अनूदित हुआ है किंतु तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम
आदि भारतीय भाषाओं के कई वालउपन्यास का अनुवाद शायद ही हिंदी
में हुआ हो। कैसी विडंबना है
?
वास्तव में अनुवाद को भी दोयम दर्जे का लेखन माना जाता रहा है,
जिसकी चर्चा हिंदी साहित्य के इतिहासों में प्रायः नगम्य है।
बांग्ला से हिंदी में कथा साहित्य का जितना अनुवाद हुआ है -
उसकी अपेक्षा एक-तिहाई भी शायद हिंदी से बांग्ला में नहीं हुआ।
हम बालसाहित्य
के लेखकों से कहना चाहेंगे कि वे इक्कीसवीं सदी के बालक को
ध्यान में रखते हुए उत्तर कंप्यूटरी युग तक की कल्पना करेंगे
तो भारतीय बालसाहित्य
विश्व स्तर पर समसामयिक रूप ले सकेगा। हाँ, उसे रामायण,
महाभारत तथा भारत के स्वर्णिम इतिहास का ज्ञान कराना भी आवश्यक
है। हिंदी बालसाहित्य
के लेखकों में प्रायः बहस होती रही है कि उन्हें परी कथाएँ
लिखनी चाहिए या विज्ञान कथाएँ
?
हमारा मानना है कि बचपन को कल्पना लोक में विचरने के लिए री
कथाएँ भी चाहिए किंतु भूत-प्रेत या अंधविश्वास का मनोरंजन बाल
मन से खिलवाड़ होगा।
विज्ञान कथाएँ लिखनी चाहिएँ किंतु उनमें वैज्ञानिक फार्मूले
देकर बाल-मस्तिष्क को बोझिल नहीं करना है, वे पाठ्य पुस्तकों
के लिए हैं अथवा विषय विशेष की-कुंजियों के लिए। परी कथा तथा
विज्ञान कथा एक-दूसरे की पूरक बनेंगी तो बालसाहित्य स्वस्थ
दिशा का पथ प्रशस्त करेगा।
इसी संदर्भ में कुछ अन्य शास्त्रियों के सिद्धांतों को यहाँ
उद्धृत करना समीचीन लगता है। मौटे पर, तीन से 7 वर्ष तक की आयु
के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा के प्रशिक्षुओं के लिए
जहाँ पश्चिम के शिक्षा-शास्त्री कमिनियस, राबर्ट, ओविन, रूसो,
हरबार्ट, फ्रोवेल, माँटेसरी सिपेंसर आदि ने अमूल्य साहित्य
प्रदान किया है वहा भारतीय प्राथमिक शिक्षा प्रवर्तक स्वामी
दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, रवींद्रनाथ टैगोर, मोहन
दास कर्मचंद गांधी का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
डॉ. मेरिया माँटेसरी रोम में (1870-1952) नृविज्ञान की
प्रध्यापिका थी। वह इटली की पहली महिला चिकित्सक थीं जिन्होंने
व्याधिग्रस्त बच्चों और उनकी शिक्षा को अध्ययन का विषय बनाया।
वह 1939 में भारत आई थीं। यहाँ आकर उन्होंने शिक्षण-प्रशिक्षण
पद्धति का प्रचार किया तथा उसी के अनुसार नर्सरी अध्यापकों को
भी प्रशिक्षित किया। वर्ष 1951 में वह हालैंड चली गई। उनका
विश्वास था कि बच्चों का नैसर्गिक ढंग से विकास होना चाहिए।
उन्होंने स्कूल को बच्चों का घर नाम दिया । कर्मेद्रियों का
प्रशिक्षण, बाल-स्वतंत्रता छोटे बच्चों में सम्मान की भावना
आदि इस पद्धिति की विशेषताएँ हैं। भारत में माँटेसरी स्कूलों
की भरमार है। फ्रोवेल शिक्षा-पद्धति की विशेताएँ हैं। भारत में
माँटेसरी स्कूलों की भरमार है। फ्रोवेल शिक्षा-पद्धति स्वामी
दयानंद की गुरुकुल शिक्षा-पद्धति से मेल आती है तथा
महात्मागाँधी की हस्तकला व टैगोर के गीत-संगीत के भी निकट है
किंतु भारत में उसके किंडर गार्टन शिक्षा पर आधारित स्कूलों की
अपेक्षा माँटेसरी की स्कूल अधिक लोकप्रिय सिद्ध हुए। उस काल के
लेखकों तथा अध्यापकों ने नर्सरी गीत लिखे किंतु बाबा ब्लैक शीप
जैसी प्रसिद्धि नहीं पा सके।
भारतीय भाषाओं के प्रारंभिक काल के कुछ बालसाहित्य रचना- कार
हैं-
ओड़िया
-
राधानाथ, मोहन सेनापति, मधुसूदन राय।
बांगला
-
रवींद्रनाथ ठाकुर, जोगेंद्रनाथ सरकार, द्विजेंद्रनाथ।
तमिल
-
सुब्रह्मण्यम भारती, मुदालियर देशिक विनायक पिल्लै।
तेलुगु
-
कुडकूडि वीरासिलिंगम एम. एन. व्यंकटास्वामी, रांगैया शैटिट।
कन्नड -
च वासुदेवच्या, श्रीनिवास राय. ए.एस. कामत।
मलयालम -
वल्लातोल, उल्लूर, कुमारन आशान. जी शंकर कुरुप।
गुजराती
-
दलपत राय, हिम्मतलाल गणेश अंजरिया, उमाशंकर जोशी।
असमिया
-
बलदेव मंहत, दुर्गाप्रसाद, जोगिंदर बरुआ, मो. सुलेमान खाँ।
सिंधी
-
भेरुमल मेहरचंद, किशिन चंद, हरि दिलगीर।
कशमीरी
-
शंभूनाथ भट्ट उर्फ हलीफ कशमीरी, नाजी।
उर्दू
-
मौलाना हुसैन आज़ाद, ख्वाजा अल्ताफ हुसैन मौलाना
आज़ाद,
इस्माइल मेरठी, इकबाल।
पंजाबी - प्यारा सिंह सहराई, धनवंत सिंह सीतल।
हिंदी -
अयोध्या
सिंह उपाध्याय, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, श्रीनाथ
सिंह, सोहनलाल
द्विवेदी, आरसी प्रसाद, सिंह सरस्वती कुमार दीपक,
सुभद्रा कुमारी चौहान आदि।
प्रसंगतः, हम यहाँ एक स्पष्टीकरण देना चाहेंगे। हिंदी में
प्रचलित बाल-बालसाहित्य शब्द बड़ा भ्रामक लगता है जिसमें
बच्चों के लेखक की बजाए बच्चा लेखक का अभावव झलकता है। अतः बाल
साहित्यकार की बजाए यदि बालसाहित्य के रचनाकार अथवा बालसाहित्य
के लेखक कहा जाए तो अधिक उपर्युक्त होगा। वैसे भी लेखक बाल
साहित्यकार या बालसाहित्य के लेखक नहीं होते। रवींद्रनाथ ठाकुर
को कोई बाल साहित्यकार नहीं कहता जबकि उन्होंने बांगला मं
बालसाहित्य भी लिखा।
आज बालसाहित्य में बहुत अच्छी कृतियाँ प्रकाशित की जा रही है।
प्रायः सभी भाषाओं में बच्चों का साहित्य लिखा जा रहा है।
भारतीय भाषाओं की पुस्तकें उत्पाद की दृष्टि से भी अँग्रेज़ी
प्रकाशनों से पीछे नहीं । कुछ बाल-विश्वकोश प्रकाश में आए हैं।
ट्वाय बुक्स (खिलौना पुस्तकें) तथा वैज्ञानिक पद्धतियों पर
आधारित अनेक उपकरण पुस्तकें भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में
उपलब्ध हैं। निश्चय ही भारतीय भाषाओं के बालसाहित्य का भविष्य
उज्ज्वल है। केवल आवश्यक है उसे हैरी पॉटर की तरह प्रमोट करने
की, पर बाल-मन को स्वस्थ साहित्य प्रदान करने के साथ। स्वस्थ
साहित्य के लेखन, प्रकाशन तथा वितरण के द्वारा वैश्विक स्तर पर
हम बच्चों को ‘सत्य
शिवं सुदंर’
का वातावरण दे पाएँगे।
डॉ. श्यामसिंह शशि
बी-4 245 /
सफदरजंग
एन्क्लेव, नई दिल्ली -110029
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