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नोबल ऊँचा है गांधी का
'दर्शन'
तनवीर जाफ़री
महात्मा
गांधी के जन्म दिवस
2
अक्तूबर के आसपास लगभग प्रत्येक वर्ष भारत में
इस विषय को लेकर अक्सर यह बहस छिड़ जाती है कि शान्ति एवं
अहिंसा के ध्वजावाहक एवं भारत को स्वाधीनता दिलाने वाले
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अब तक शान्ति एवं सद्भावना के
लिए दिए जाने वाले विश्व के सबसे बड़े नोबल शान्ति पुरस्कार से
आंखिर क्योंकर नहीं नवाज़ा गया? भारत
में जन्मे या भारत में रहने वाले जिन लोगों को अब तक नोबल
पुरस्कार मिल चुका है, उनमें रविन्द्र
नाथ टैगोर, सी वी रमन,
डा. हरगोविन्द खुराना,
डा. चन्द्रशेखर, मदर टेरेसा,
प्रो. अर्मत्य सेन तथा वी एस नायपाल के नाम
उल्लेखनीय हैं। निश्चित रूप से ये सभी हस्तियाँ अपने-अपने
क्षेत्रों में सर्वाच्च स्थान रखती थीं। परन्तु इसमें भी कोई
दो राय नहीं कि महात्मा गांधी का जीवन दर्शन इन सभी भारतीय
नोबल पुरस्कार विजेताओं से कहीं भिन्न व निराला था।
हमारे देश में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि
'घर का जोगी जोगड़ा,
आन गाँव का सिद्ध'
अर्थात् किसी विद्वान व्यक्ति की उसके अपने देश में उतनी
प्रतिष्ठा नहीं होती जितनी कि अन्य देशों में होती है।
दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी जैसा महान व्यक्ति भी इस कहावत से
अलग नहीं रह सका। गांधी की सत्य,
अहिंसा, सहिष्णुता,
साम्प्रदायिक एकता,
त्याग व बलिदान जैसी बेशक़ीमती बातें भारत के दक्षिणपंथी
विचारधारा रखने वाले लोगों के गले से नहीं उतर सकी। और पूरी
दुनिया में पूजनीय समझे जाने वाले सत्य व अहिंसा के इस पुजारी
का हमारे ही देश, भारत के साम्प्रदायिक
सद्भाव से नफ़रत करने वाले लोगों ने गोली मारकर हत्या कर डाली।
वह भी उस समय जबकि वे नियमित उपासना करने के बाद मन्दिर से
बाहर निकल रहे थे। इतना ही नहीं बल्कि इससे भी बड़ा दुर्भाग्य
यह है कि भारत में गांधी के अपने गृह राज्य गुजरात में आज
साम्प्रदायिक सद्भाव की दुश्मन उन्हीं शक्तियों का इस क़द्र
बोलबाला हो चुका है कि वहाँ गोधरा नरसंहार तथा उसके पश्चात
गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का वह ऐतिहासिक तांडव हुआ जिसने
कुछ समय के लिए तो गोया गांधी की अहिंसा की नीतियों के तो
परखचे ही उड़ा कर रख दिए।
बहरहाल, इसका अर्थ यह
नहीं कि गांधी का बताया हुआ जीवन दर्शन बेमानी हो गया है या
उनके विचार आज प्रासंगिक नहीं रहे। मेरे विचार से गांधी का
विरोध जो भी है और जितना भी है केवल भारत में ही है। भारत के
अतिरिक्त दुनिया के लगभग सभी देशों में गांधी को एक महान
आदर्शवादी महापुरुष के रूप में स्थान दिया जाता है। इरांक व
फिलिस्तीन जैसे देशों में जहाँ कि आम जनता केवल और केवल शान्ति
की ही गुहार लगाती नंजर आ रही है तथा वहाँ के हिंसापूर्ण
वातावरण से तंग आ चुकी है। कई पश्चिमी देशों में जहाँ कि
साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध बड़े प्रदर्शन आयोजित किए
जाते रहते हैं तथा उन प्रदर्शनों में शान्ति,
अहिंसा की बात की जाती है। ऐसे सभी स्थानों पर
महात्मा गांधी की प्रतीकात्मक उपस्थिति को उनके चित्रों तथा
उनके नाम से जुड़े नारों के साथ देखा जा सकता है। हमारे देश में
भले ही कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी विचारधारा रखने वाले एक
सिरफिरे ने उन्हें हत्या करने के योग्य ही क्यों न समझा हो
परन्तु भारत में आने वाला विश्व का कोई भी बड़े से बड़ा
राष्ट्राध्यक्ष, सुलतान अथवा नेता ऐसा
नहीं है जोकि नई दिल्ली स्थित महात्मा गांधी की समाधि राजघाट
पर गांधी के प्रति नतमस्तक न हुआ हो तथा उन्हें अपनी श्रद्धा
के पुष्प अर्पित न किए हों। दक्षिण अफ्रीका की स्वतंत्रता के
महानायक नेल्सन मण्डेला तो अपने संघर्ष का प्रेरणास्त्रोत ही
गांधी को स्वीकार करते हैं।
गत् दिनों महात्मा गांधी की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की
लोकप्रियता एक बार फिर उस समय सिर चढ़ कर बोली जबकि भारत द्वारा
संयुक्त राष्ट्र संघ में रखे गए दो अक्तूबर अर्थात् महात्मा
गांधी के जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने
के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारी समर्थन मिला।
महासभा के सभी
191
सदस्य देशों में से 140
से भी अधिक देशों द्वारा भारत के इस प्रस्ताव
को सह प्रायोजित किया गया था। इस प्रकार इसी वर्ष 2
अक्तूबर 2007 को पहली
बार महात्मा गांधी के जन्म दिवस को विश्व अहिंसा दिवस के रूप
में मनाया गया। इस प्रथम विश्व अहिंसा दिवस के अवसर पर संयुक्त
राष्ट्र महासभा के विशेष अधिवेशन को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सम्बोधित किया। सोनिया गांधी के
अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ही 2
अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस मनाए जाने हेतु संयुक्त राष्ट्र
महासभा द्वारा यह निर्णय लिया जा सका है। परन्तु गांधी के
विचारों से सहमति न रखने वाले वे लोग जिन्हें सम्भवत: 2
अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए
जाने का निर्णय पचाए नहीं पच पा रहा है,
वे इस फैसले का विरोध सीधे तौर पर करने के
बजाए सोनिया गांधी पर ही उँगली उठाने लगे हैं। इन गांधी विरोधी
शक्तियों से यह बात हज़म नहीं हो पा रही है कि आख़िर सोनिया
गांधी के प्रयासों से गांधी जी के जन्म दिवस को विश्व अहिंसा
दिवस के रूप में मनाए जाने की मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ
द्वारा कैसे दे दी गई।
गांधी जी का भारत में साम्प्रदायिकतावादी
शक्तियों द्वारा कितना ही विरोध क्यों न किया जाए परन्तु उनके
विचारों की प्रासंगिकता को भारत तो क्या पूरी दुनिया
नज़रअंदाजज़ नहीं कर सकती। सत्य,
अहिंसा, स्वावलम्बन,
सदाचार आदि उनके बताए हुए वे मार्ग थे जिनपर
चल कर इंसान बड़ी से बड़ी मंजिल को हासिल कर सकता है। हिंसा व
शस्त्रों के बल पर विजय हासिल करने के बजाए वैचारिक दृढ़ता,
सत्य व सद्मार्ग को हथियार बनाए जाने की सलाह
गांधी जी दिया करते थे। ग़रीब-अमीर,
ज़ात-पात तथा साम्प्रदायिक दुर्भावना जैसी विषमताओं के वे
प्रबल विरोधी थे। भारत में कभी-कभार हिन्दू मुस्लिम समुदायों
के मध्य साम्प्रदायिक विद्वेष का वातावरण दिखाई देता है। यह
मतभेद कभी-कभी हिंसा का वह रूप धारण कर लेता है जिसके
परिणामस्वरूप गोधरा व गुजरात जैसे शर्मनाक हादसे दरपेश आते
हैं। ऐसे हादसों में लोगों को ज़िन्दा जलाए जाने के दृश्य
सरेआम देखने को मिलते हैं। गर्भवती महिलाओं के पेट से बच्चे को
निकाल कर उसे त्रिशूलों की नोक पर उछाला जाता है। शरीर के
अंग-अंग तलवार की धार से टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं। ऐसे
साम्प्रदायिकतापूर्ण अमानवीय वातावरण से निपटने का गांधी जी ने
ही एक रास्ता बताया था और वह रास्ता था साम्प्रदायिक सद्भाव,
साम्प्रदायिक एकता तथा सर्वधर्म सम्भाव का
रास्ता। अपने जीवन के अन्तिम दौर में उन्होंने कहा था कि मेरी
दो आँखें हैं। एक हिन्दू और एक मुसलमान। इन दोनों आँखों को
सुरक्षित रखने का जिम्मा भी अब हम पर ही है। ख़ुदा का शुक्र है
कि भारत की अधिकांश हिन्दू व मुस्लिम जनसंख्या अब भी गांधी के
इस दर्शन का पालन करती है तथा साम्प्रदायिकता फैलाने वाल गांधी
विरोधी शक्तियों को समय-समय पर लोकातंत्रिक तरींके से नीचा
दिखाती रहती है।
विश्व के समक्ष शान्ति और अहिंसा का महान
आदर्श पेश करने वाले गांधी जी को बावजूद इसके कि 1937,
1938, 1939, 1947 तथा उनकी हत्या से कुछ दिन
पूर्व 1948 में भी नोबल शान्ति
पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। परन्तु पांचों बार
उन्हें यह सम्मान नहीं दिया जा सका। नोबल पुरस्कार देने वाली
सर्वाच्च समिति यह मानती थी कि गांधी जी को यह सम्मान इसलिए
नहीं दिया जा सकता क्योंकि सही मायनों में गांधी जी न ही
राजनेता थे और न ही एक समर्पित राहत कर्मी। नोबल समिति का
गांधी को नोबल पुरस्कार न दिए जाने के पक्ष में दिया जाने वाला
यह तर्क कितना उचित था और कितना अनुचित यह तो मैं नहीं कह सकता
परन्तु नोबल फ़ाऊंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माईकल सोहलम
द्वारा गांधी जी को नोबल पुरस्कार न दिए जाने के संबंध में
अफ़सोस जताना इस बात की दलील ज़रूर है कि गांधी जी को नोबल
शान्ति पुरस्कार न दिए जाने का नोबल समिति का फ़ैसला सही नहीं
था। माईकल सोहलम ने अभी कुछ समय पूर्व कहा था कि 'हमने
एक महान नोबल विजेता को खो दिया और वे गांधी थे।'
इसी प्रकार नोबल म्यूंजियम के क्यूरेटर डा.
एंडर्स का कहना है कि 'नोबल म्यूज़ियम
में हमें महात्मा गांधी की कमी सबसे ज़्यादा खलती है। मुझे
लगता है वह एक ग़लती थी।'
नोबल पुरस्कार देने वाली सर्वोच्च समिति
प्रत्येक वर्ष 2 अक्तूबर विश्व अहिंसा
दिवस के आसपास गांधी जी को याद कर उन्हें नोबल पुरस्कार न दिए
जा सकने जैसी अपनी ग़लती पर आँसू ही बहाती रहेगी या फिर लीक से
हटकर उन्हें नोबल शान्ति पुरस्कार देकर अपने म्यूज़ियम की शोभा
बढ़ाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। परन्तु मैं इतना ज़रूर
कह सकता हूँ कि गांधी जी का अपना व्यक्तित्व तथा उनका जीवन
दर्शन उस सर्वोच्च शिखर को छूता है,
जिसकी बुलंदी का मुक़ाबला नोबल शान्ति पुरस्कार भी क़तई नहीं
कर सकता।
तनवीर
जाफ़री
(सदस्य, हरियाणा
साहित्य अकादमी, शासी परिषद)
22402, नाहन हाऊस,
अम्बाला शहर, हरियाणा
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