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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। मूल्याँकन ।।

 

 

हिंदी लेखिकाएं : प्राचीन काल से मध्यकाल तक


आशा रानी व्‍होरा

 

भारतीय सामाजिक व्यवस्था अधिकांशतः पुरुष-प्रधान होने से, अभी कुछ दशक पूर्व तक, साहित्य के विकास में नारी का योगदान स्रष्टा रूप में कम, प्रेरणा रूप में अधिक रहा है। वैदिक युग में यद्यपि ज्ञानार्जन के, अभिव्यक्ति के समान अवसर थे, फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि रचनाकार महिलाएँ संख्या में भी बराबरी के स्तर पर रहीं। आगे चल कर तो, विभिन्न स्थितियों के दबाव में, यह अंतर बढता ही चला गया और नारी स्वयं सर्जक होने के बजाए, सर्जक पुरुष की प्रेरणा ही बनती चली गई।  यह स्थिति कमोबेश हर देश में, हर काल में, भाषा में रही है। हिंदी भाषा और साहित्य इसके अपवाद नहीं।

 

हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इसके आदि काल;विक्रमी सवंत् १०५० से १३७५द्ध को कुछ विद्वानों ने वीर गाथा काल कहा है। इस काल में एक भी उल्लेखनीय कवयित्री नहीं हुई। कारण, नारी की दशा तब तक बहुत ख़राब हो चुकी थी और वह समाज में केवल भोग-विलास की वस्तु बन कर रह गई थी। उस काल में जितने युग हुए, वे लगभग नारी को लेकर लडे गए।  यह अलग बात है कि वीरगाथा काल में उसे युग का माध्यम नहीं, युग की प्रेरणा रूप में चित्रित किया गया, बहुत बार गौरवान्वित करके भी। मध्यकाल; सवंत् १३७५-१७००द्ध में धार्मिक आंदोलन के दौरान उस पर आत्म-पीडाजन्य कुंठाओं का आरोपण कर उसे नरक की खान तक कह दिया गया। सगुण भक्ति-धारा में कृष्ण-भक्त कवियों ने नारी-हृदय की निःस्पृहता का सहारा लेकर उसके मातृ रूप, पत्नी रूप, प्रेयसी रूप को स्वयं पर आरोपित कर भगवत्-प्राप्ति का साधन खोज निकाला। तुलसीदास जैसे महान कवि ने भी एक ओर नारी-पात्रों द्वारा सामाजिक आदर्शों की स्थापना की, दूसरी ओर उनकी भर्त्सना करते हुए तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों को भी उजागर किया। इस भक्ति काल की कवयित्रियों में मीरा का नाम बडे गौरव से लिया जाता है, जो प्रेम-रस डूबी भक्त ही नहीं, सामाजिक विद्रोहिणी भी थीं।  इसके बाद रीति काल में तो कवियों ने नारी के नख-शिख का सांगोपांग श्रृंगारिक वर्णन कर उसे मात्र नायिका, अभिसारिका या भोग्या ही बना दिया।  इसलिए इस काल में स्त्रियों की सृजनशीलता फिर बंधक होकर रह गई या पीछे हट गई।

 

न जाने कितनी पीढयों की गुलामी के बाद तथाकथित प्रेरणा का यह तिलिस्म टूटा पूरी तरह तो आज भी नहीं। अब भी साहित्य में उसे पुरुषों के आईनों में भिन्न-भिन्न रूपों में उतरना पडता है।  यों इधर कुछ वर्षों से स्थिति में खास बदलाव आया है। पर यह परिवर्तन अभीष्ट दिशाओं में भी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अब भी स्त्री रचनाकारों में पुरुषों के दिखाए पूर्व आईनों को नकार कर निजी रूपों का स्पष्ट आईना उनके सामने रखने का साहस उतना नहीं जुटा पा रही है, जितना कि कथित आधुनिकता या बोल्डनेसके नाम पर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे छद्म मुखौटे ओढ लेने की अवांछित प्रवृति का उभार पिछले कुछ दशकों से देखने में आ रहा है।

 

निश्चय ही पश्चिम-प्रभावित इस कथित प्रगतिशीलता की एक लहर के बाद, इधर के साहित्य में; स्त्री साहित्य इससे अलग नहीं फिर से अपनी जमीन की ओर देखने, अपनी सांस्कृतिक जडों की तलाश करने, अपनी अस्मिता की पहचान पाने की बेचैनी दिखाई दे रही है, जो संतुलित दृष्टि के साथ भावी साहित्य के लिए एक शुभ दिशा-संकेत भी है। कहीं कम, कहीं ज्यादा, वर्तमान काल की यह एक सर्वभाषायी नई लहर है। हिंदी साहित्य की भी। सर्वत्र स्त्री साहित्य की भी।

 

प्राचीन साहित्य की काव्य-परंपरा

काव्य मानव के अंतःकरण की लयबद्ध वाणी है।  अतः मुद्रण के आविष्कार से पूर्व सभी भाषाओं में साहित्य काव्य में ही रचा गया। हिंदी का विकास संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश से निकल कर यद्यपि तमिल जैसी कुछ प्राचीन भाषाओं से बहुत बाद में हुआ, पर कई साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध हो चुका है कि अपनी उपरोक्त अभिभावक भाषाओं से अलग भी हिंदी-काव्य की परंपरा सातवीं शताब्दी से चली आ रही है। भले ही इसका प्रवाह कभी मंद, कभी तीव्र रहा हो, यह प्रवाह अविरल, अबाध रहा। चूंकि संस्कृत रचित हाने पर भी ज्ञात साहित्य-इतिहास में हमारी विरासत वैदिक काल से आरंभ होती है, उस युग की संस्कृत साहित्य की महान रचयित्रियों को ही म अपनी पूर्वजाएं मानते हैं।

 

प्राचीन काल

ऋग्वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति समाज में कापफी ऊँची थी और उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे धार्मिक क्रियाओं में भाग ही नहीं लेती थीं, क्रियाएं संपन्न कराने वाले पुरोहितों और ऋषियों का दर्जा भी उन्हें प्राप्त था।  

 

ऋग्वेद के बहुत से मंत्र सूक्त उस समय की विदुषी लेखिकाओं, जिन्हें ऋषिकाएं और ब्रह्मवादिनियाँ कहा जाता था, द्वारा भी लिखे गए।

 

इन कवयित्रियों में सबसे प्राचीन नाम देवी सूक्तकी रचयिता वाक् का मिलता है। ये सूत्र पतझड के मौसम में देवी-पूजा के अवसर पर गाए जाते थे। शेष लेखिकाओं में लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, सूर्या, माधवी, रोमशा, जूही, इडा, श्रगा, कामायनी, शची पोलोमी, यमी, विश्ववारा, रेखा, इंद्राणी, शशिप्रभा, गोधा आदि नाम उल्लेखनीय है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार ऋग्वेद और सामवेद में कुल इक्कीस नाम इनके मिलते हैं।  सूर्या सावित्री ने प्रसिद्ध सूर्या सूक्त की रचना की, इसे विवाह-संस्कार के समय गाया जाता था। आज भी हिंदू विवाह-पगति में ये मंत्र शामिल हैं। वाक् की वाणी तो इतनी समृद्ध मानी गई कि देवी सरस्वती को भी एक अतिरिक्त नाम वाक् दे दिया गया। चारों वेदों में एक वेद सामवेद तो विशेष रूप से स्त्रियों के लिए ही सुरक्षित माना गया। यद्यपि उसमें स्त्रियों की चर्चा नहीं है, यह ज्ञात तथ्य है कि सामवेद का मधुर गायन स्त्री-कंठ से ही फटा।  शची पोलोमी ने ऋग्वेद के दसवें मंडल के १५४ सूत्रों की रचना की थी। इसी मंडल के ३९-४० सूक्त घोषा काक्षावती द्वारा रचे गए।  मंडल ५-२-२८ में विश्ववारा की रचनाएं सम्मिलित हैं। मंडल ८, सूक्त ९१ में अपाला की रचनाएं संकलित हैं।  मंडल १-१२९ में रोमशा की ऋचाएं हैं। मंडल दशम् के १२५वें सूक्त की रचयिता प्रखर विदुषी वाक् तो अपने देवी सूक्त के माध्यम से साहित्य में शाक्त-दर्शन की अधिष्ठात्री आदि कवयित्री है। गृहदेवता में यमी, गोधा, माधवी, इंद्राणी, लोपामुद्रा आदि का उल्लेख है।

 

उत्तर वैदिक काल में महान दार्शनिक राजर्षि जनक की विद्वत्सभा में शास्त्रार्थ करने वाली मैत्रेयी, गार्गी का परिचय विदुषियों के रूप में है, ‘आश्वलायन गृह सूत्र में गार्गी, मैत्रेयी, सुलभा के नाम कवयित्रियों के रूप में उद्धरित हैं। इसका अर्थ है, ये विदुषियाँ कवयित्रियाँ भी थीं।

 

इसके बाद बौद्धकाल में थेरी गाथा की रचयित्री ७३ भिक्षुणी महिलाओं, जैन काल की कवयित्रियों तथा उत्तर बोध-जैन काल में ज्योतिषाचार्य वराह मिहिर की ज्योतिषी पुत्रवधू, गणितज्ञ लीलावती और जगतगुरू शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाली मंडल मिश्र की पत्नी भारती के उल्लेख बिना इन विदुषी पूर्वजाओं का स्मरण अधूरा रहेगा, यद्यपि प्राप्त सूचनाओं में नाम और भी मिलते हैं-शीला, प्रभु देवी, मदालसा, विज्जायिका, भारूला, भोरिका, अवंति सुंदरी, शिला, जयंती देवी, सुभद्रा, कश्मा, विकटनितम्बा, जघनचपली, इदुलेखा, कुंती देवी, सुनन्दा, कनकवल्ली, मधुरांगी, ललितांगी, विजयांका, विमलांगी, पी।  देवी, लक्ष्मी, रजक सरस्वती, वीर सरस्वती, सरस्वती, कादंबरी, विद्या, गौरी, प्रियवंदा आदि। संस्कृत आलेख में विदुषी लेखिका कमला रत्नम ने इनका विशद वर्णन किया है

 

हिंदी साहित्य का आदि काल

हिंदी के आदि काल की पीठिका के रूप में इतिहासकारों ने जैन, सिद्ध व नाथ साहित्य को लिया है। यह सारा साहित्य धार्मिक ही है। सिद्ध साहित्य का विस्तार ७वीं शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक फला है। हिंदी कविता का आदि रूप नालंदा और विक्रमशिला के सिद्धों द्वारा बौद्ध धर्म के बज्रयान-तत्व के प्रचार के लिए लिखे गए साहित्य में मिलता है। धर्म-प्रचार की भाषा संस्कृत नहीं, जन-भाषाएं हुआ करती थीं। इस साहित्य की भाषाएं भी हिंदी की जन-बोलियाँ मागधी, अपभ्रंश से निकली मगही और मिथिला के आसपास बोली जाने वाली संध्या थीं। जन-भाषाओं में होने के कारण इसकी उपेक्षा कर दी गई, इसलिए यह आज दुलर्भ है। जैन साहित्य अपभ्रंश से निकली प्राचीन हिंदी में है और दोहा-चौपाई पगति में चरित्र-काव्य या आख्यानिक काव्य के रूपों में। इसलिए इसमें शांत रस के सिवाय, अन्य रसों का प्रायः अभाव है। नाथ संप्रदाय का साहित्य इसके बाद का है अधिकतर तंत्र-विधान, योग-साधना, आत्म-निग्रह तत्वों की प्रधानता लिए। इस साहित्य का भी सामान्य माननीय अनुभूतियों से विशेष संबंध नहीं रहा, इसलिए महत्वहीन रहा।


यद्यपि हिंदी के विकास में इन तीन धाराओं का भी योगदान रहा, पर अनेक नामी जैन कवियों तथा गोरखनाथ जैसे नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध कवि के बावजूद, धार्मिक साहित्य की इन धाराओं में सूर, तुलसी जैसे महान नामों का अभाव है। स्त्री काव्य पे थेरी-गाथा की बौद्ध रचयित्रियों, कुछ जैन साध्वियों, अपभ्रंश के अंतिम काल में डिंगल-काव्य की झीमी चारिणी के अलावा, अन्य उल्लेखनीय नाम नहीं मिलते।  पिंगल साहित्य में और वीरगाथा काल के रासो साहित्य में कोई स्त्री नाम सामने नहीं आया।  चंदबरदायी, विद्यापति, अमीर खुसरो ही इस काल के प्रमुख नाम हैं, जिनके काव्य की प्रकृति अलग-अलग है।

पूर्व मध्यकाल या भक्ति काल

भक्ति काल को हिंदी साहित्य के विकास की दृष्टि से स्वर्ण युग कहा जाता है। कबीर, नानक, जायसी, सूर, तुलसी जैसी प्रतिभाएं देकर हिंदी साहित्य को विश्व साहित्य में अग्रणी स्थान दिलाने का श्रेय इसी युग को है।  भक्ति-भावना को लेकर इस युग का साहित्य दो धाराओं में बंटा हैः निर्गुण भक्ति-धारा और सगुण भक्ति-धारा। इसी तरह सगुण भक्ति-धारा भी फिर दो धाराओं में विभक्त हैः कृष्ण-भक्ति धारा और राम-भक्ति धारा।  कृष्ण-भक्ति धारा अपने माधुर्य के कारण अधिक व्यापक है। भक्ति-काव्य और संत कवियों की परंपरा में स्त्रियों का भी कापफी योगदान है। मीराबाई एक प्रमुख नाम है। पर दया बाई, सहजो बाई, गौरी बाई, शेख, ताज, रत्नावली, सांई आदि नाम भी कम उल्लेखनीय नहीं।  दया बाई, सहजो बाई निर्गुण भक्ति-धारा के नाम हैं। संत तुलसीदास की कवयित्री पत्नी रत्नावली और कवि गिरधर गोपाल की पत्नी सांई के पद और मुक्तक नीति-साहित्य की रचनाएं हैं। शेष नाम प्रायः मीरा के पद-चिन्हों पर चलने वाली कृष्ण-भक्ति और प्रेम की समर्पित कवयित्रियों के हैं - छत्र कुंवरि बाई, प्रताप कुंवरि बाई, राधा बाई, गौरी बाई, कृष्णा बाई, दीवाली बाई, ताज आदि।

 

मीराबाई : अपनी रचनाओं को मीरा ने स्वयं लिपिबद्ध किया। पर मीरा के सभी पद गेय हैं। पदावली बडी मार्मिक और भक्ति-रस पूर्ण है, प्रेम-पगी है, मधुरता से ओतप्रोत है, सरल बोधगम्य भी है। तो भक्त-जनों द्वारा सहज ही उन्ह कंठस्थ कर लिया गया। यह गीति-काव्य आज भी हिंदी साहित्य में सर्वोत्तम स्थान रखता है। इतना उन्माद, इतनी तीव्रता, इतनी सरसता, इतनी बोधगम्यता, लोकोन्मुखता और इतनी भक्ति-तल्लीनता अन्य किसी कवि-कवयित्री में नहीं मिलती। हृदय के दर्द, प्रेम की टीस, विरह-अनुभूति की तीव्रता, प्रेम की अलौकिकता जैसी मीरा के पदों में है, विश्व-साहित्य में अलभ्य है।  सबल भाव-पक्ष, संगीत की मधुरता और लय-ताल बग तरलता के कारण महाकवि निराला ने उन्हें संगीत की देवी कहा है। चूंकि वह सभी जगह घूम-घूम कर रचती-गाती रहीं, मीरा की रचनाएं राजस्थानी, भोजपुरी, गुजराती, ब्रज भाषा, सभी में मिलती हैं और ये सभी प्रांत उन्हें अपनी कवयित्री मानते हैं। यहाँ तक कि भाषा सीमा को लांघ कर मीरा के पद और भजन दक्षिण भारत तक में गाए जाते हैं। सखि री, मैं तो गिरिधर के रंग राती।‘…’मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई’…’बसो मेरे नैनन में नंद लाल। म्होरो दरद न जाणै कोय। जैसी गीत पंक्तियाँ सदियों से जन-जन की जुबान पर हैं।

 

दया बाई, सहजो बाई : ये दोनों कवयित