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दुनिया का स्वर्ग और हमारी गुलामी
गोविंद कुमार
'गुंजन'
स्वर्ग में राजा का पद कभी खाली नहीं
रहता था। वहाँ राजा के पद इतने दावेदार थे कि सेवकों का मिलना
ही मुश्किल । स्वर्ग में सदैव सेवकों की ज़रूरत होती है।
अन्यथा स्वर्ग में सुख कैसे हो?
स्वर्ग भी में रहेगा उसको अपने काम काज
सेवकों से कराने की सुविधा न हो, यदि वहाँ सब कुछ अपने हाथों
से ही करना पड़े, तो वह स्वर्ग कैसा
?
मनुष्य को तो स्वर्ग से निकाले जाने के बाद ही से श्रमजीवी
बनना पड़ा। स्वर्ग में श्रम की कोई ज़रूरत ही न थी। माँ के
गर्भ में जैसे बच्चे कों साँस भी लेने की ज़रूरत नहीं होती,
सकी साँस लेने का काम भी उसकी माँ करती है, ऐसे ही स्वर्ग के
एक-एक निवासी को कई-कई सेवकों की ज़रुरत होती है। इसलिए स्वर्ग
मे हमेशा ही सेवकों की बहुत बड़ी तादात में ज़रुरत रहा करती
है। यही कारण है, कि मरने के बाद स्वर्ग में जाने को आदमी इतना
आतुर है, वह मरते ही स्वर्गीय या जन्नत नशीन हो जाता है। कोई
नहीं पूछता
–
स्वर्ग में वह किस हैसियत या पद से जा रहा है। गरीब मुल्कों से
अरब देशों में नौकरी करने जा रहे ढेर सारे लोगों से कोई नहीं
पूछता कि वो वहाँ क्या काम करेंगे
?
सफाई कर्मी रहेंगे, घरेलू नौकर होंगे या छोटे-मोटे सेल्समेन ।
उन्हें नौकरों की ज़रुरत हैं और हमें नौकरी की। हमें अमीर
इलाकों (स्वर्ग) में नज़र आता है। फॉरेन में सर्विस करता है,
लड़का...सब इतना कहना भर काफ़ी है कि गरीबड़े बिछ-बिछ जाते है,
उनके सामने । लड़की शादी के बाद फॉरेन जाएगी...अरब जाएगी...यह
कल्पना भर इतना अभिभूत कर देती है, कि वो विदेश में नौकरी कर
रहे आदमी का काम-काज, पद या उम्र जैसी कई बातों की सरलता से
उपेक्षा कर देते हैं। सुविधा भोगी होते ही आदमी की बुद्धि पर
एक ऐसी छाया पड़ने लगती है, जो उसे भीतर से कमजोर करने लगती
है। आदमी येन केन प्रकारेण अपनी सुविधा का स्वर्ग पा लेना
चाहता है। वह सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। वह स्वर्ग में
नौकरी मिलने की उम्मीद से भी इतना खुश हो जाता है कि वह भूल
जाता है कि उसकी वास्तविक योग्यता क्या है
?
उसे संसार में क्या पाने का हक़ है
?
उसे क्या मिलना चाहिए था और वास्तव में उस क्या मिल रहा है
?
इस भयानक विस्मृति का परिमाम यह हुआ कि,
स्वर्ग की तलाश में आदमी अपना वास्तविक संसार छोड़कर एक झूठे
संसार में रहने को बाध्य हो जाता है । राजा होने की योग्यता
होने के बावजूद नौकर के रूप में वह अपनी ज़िंदगी मिटा देता है,
और स्वर्ग में रहने का भ्रम उसे अपने नौकरपन को मिटाने ही नहीं
देता । आनंद मिश्र की पंक्तियाँ हैं
–
क्या हुआ इनको कि जो भागे जा रहे हैं ।
घर डगर गिरिवर छलांगे जा रहे हैं ।
कौन सा रस रूप धरती पर नहीं है ।
खोज में जिसकी अभागे जा रहे हैं ।
आदमी के भीतर नौकरपना भर देना ही संसार
के स्वर्ग का सबसे बड़ा षड़यंत्र है । यदि नौकर ना होंगे तो
राजा का क्या होगा
?
संसार में धन का सुख भोगने के लिए आदमी को केवल हाथी, घोड़े,
बैल आदि पशुघन को ही अपना गुलाम बनाया पर्याप्त नहीं है । उसे
दास-दासियों-सेवक के रूप में आदमियों को भी गुलाम बनाना पड़ता
है । प्राचीनकाल में गुलामी की प्रथा खुले आम प्रचलित थी ।
सभ्यता के विकास के साथ धन ने चार रुपों में विकास किया । पहला
रूप था मूल्य । यह रूप वस्तु विनियम के लिए विकसित हुआ । दूसरा
पूँजी के रूप में विकसित हुआ । तीसरा मज़दूरी (पारिश्रमिक) और
चौथा अति संग्रह के कारण खजाने के रूप में विकसित हुआ ।
खजाने का मालिक राजा हुआ । पूँजी का
मालिक व्यापारी । आम आदमी का जीवन मज़दूरी के रूप में मिले धन
के अंश से चलने लगा । उसे इस अंश से उन चीज़ों का मूल्य चुकाना
होता है, जो उसे चाहिए । इस प्रकार धन के द्वारा संसार का चलना
शुरु होते ही स्वर्ग और नर्क की कल्पनाएं नये रूप धरकर सामने आ
गयी । निर्धनता का जीवन नारकीय जीवन होता गया । अतः धन के
निमित्त आदमी वस्तु की तरह बिकने लगा । यह गुलामी प्रथा का
आरंभ था । समय ने गुलामी प्रथा की अमानवीयता को महसूस किया, और
उससे निजात पाने के लिए एक लम्बा संघर्ष पृथ्वी पर हुआ । अब
आदमी बिकता नहीं, मगर किराये पर उपलब्ध है । गुलामी का रूप बदल
गया । नौकर, नौकर भी रहा और नौकरशाह भी हुआ । परंतु बदलकर कायम
रही गुलामी को मिटाया जाना आज भी संभव ना हो सका ।
अँग्रेज़ी के महाकवि मिल्टन की विश्व
विख्यात कृति पेराड़ाइज
लॉस्ट में आदमी के स्वर्ग से निष्कासन
की बाइबिल कथा का मिथक अत्यंत प्रभावशाली ढंग से मानवीय नियति
का प्रतीक बनकर उभरा था। सन्नहवीं सदी में इस कृति को रचने
वाले मिल्टन की अंतःश्चेतना इस सत्य की पहचानने में विफल नहीं
हुई, कि असली नर्क आदमी की गुलामी से शुरू होता है। उसके नर्क
का अंत सिर्फ स्वर्ग में जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात
है आदमी की आत्मा का गुलामी से मुक्त हो जाना ।
समाज की व्यवस्था का सच यह है कि आदमी
की स्वतंत्रता सदैव सीमित होती है। यह अलग बाल है कि किसी की
स्वतंत्रता की सीमा अधिक होती है और किसी की कम।
मिल्टन के पेराड्राइज लॉस्ट में शैतान
नर्कवासियों को संबोधते हुए कहता है कि स्वर्ग की गुलामी से
बेहतर है कि नर्क का राज्य किया जाए। ( इट्स बेटर टु रेन इन
हेल, दैन टु सर्व इन हेवन) ध्यान देने योग्य बात यह है, कि
मिल्टन सर्व शब्द का प्रयोग करता है, जिससे बने हुए शब्द
सर्विस को अँग्रेज़ी शिक्षा ने इतना महिमा मण्डित कर दिया कि
लोग सेवक होने को ही आजीविका का आधार मानने लगे। प्राचीन
भारतीय मान्यता उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, निकृष्ट चाकरी, भीख
निदान का जो पैमाना हमारे जीवन के लिए प्रस्तुत करती थी, वह
अँग्रेज़ी शिक्षा ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। अब शिक्षा के
बाद आदमी की प्राथमिक तलाश नौकरी पा लेना हो गया है।
पूँजीवादी व्यवस्था का दुनियाभर के
सर्वहारा साहित्य में जो विरोध हुआ है, उस विरोध का असली
मंतव्य यही है, कि पूँजी के बल पर आदमी की गुलामी वयस्था को
कायम रखने वाला धन का जो स्वरूप है, उसे नष्ट कर देना । यह
विरोध वस्तुतः धन का नहीं है। विरोध धनवान का भी नहीं है। यह
धन के उस रूप का है, जो पूँजी का रूप धरकर श्रम की शक्ति को
खरीद लेता है अंततः आदमी की स्वतंत्रता समाप्त होते ही
व्यवस्था जो रूप धारण करती है, उसका नाम ही तानाशाही है।
दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद
सगे भाईयों की तरह है, जो ना केवल हम शक्ल है, वरन् अक्सर एक
दूसरे का रूप धारण कर लेते है। दोनों ही मनुष्य के स्वातंत्र्य
का विरोध करते है । मनुष्य अपने छोटे-छोटे सुखों की ख़ातिर
बड़ी-बड़ी गुलामियों में फँसता जाता है, जहाँ से मानवीय मुक्ति
असंभव होती चली जाती है। आदमी की गुलामियाँ बड़ी सूक्ष्म है।
बाहर से इनकी बेड़ियाँ और जंजीरे नज़र नहीं आती, परंतु इनकी
गिरफ्त में आदमी की आत्मा तक जकड़ी रहती है। लेनिन ने सिद्ध
किया है, कि हमारे संसार का जो भी विकसितमान स्वरूप आज दिखाई
देता है, चाहे वह विज्ञान का विकास हो या कोई और रूप हो, यह
खूबसूरत संसार आदमी ने अपने हाथों की शक्ति सेही गढ़ा है। जो
लोग यह सोचते हैं, कि विकास आदमी के दिमाग का कमाल है, वह
अधूरा सच जानते हैं। दिमाग ने तो सिर्फ कागज़ पर नक्शा बनाया
था। महलों के शिख़र तो मजदूरों के हाथों ने ही उठाए है।
धन आदमी ने विनिमय की सुविधा के लिए
पैदा किया था । यह उसी तरह था जिस तरह उसने और दूसरी चीज़े
पैदा की थी, परंतु उसे नहीं मालूम था कि यही धन उसे अपना गुलाम
बना डालेगा।
आदमी ने ज़मीन से लोहा निकाला। उसके
लोहे से तलवारें बनी और जंजीरे भी। भालों और तलवारों ने
जानवरों के साथ-साथ आदमियों को भी जंजीरे पहना दी। पूँजीवादी
व्यवस्था आदमी के जीवन मे यह भ्रम पैदा करती है, कि संसार का
समस्त विकास धन की आधारभूत शक्ति का ही परिणाम है। इसलिए आदमी
धन को इतना महत्त्व देता है। वस्तुतः समस्त विकास श्रम का या
मानवी हाथों की मेहनत का परिणाम है, इस सच को बगैर जाने हम
पूँजीवादियों और साम्राज्यवादियों के स्वर्ग में आजीवन चाकरी
करते हुए ही अपना बहुमूल्य जीवन खपा देंगे। हम उस षड़यंत्र के
शिकार है, जो स्वर्ग के मालिकों न रचा है। उनको हमारी गुलामी
की ज़रूरत है। हमारी गुलामी के बगैर उनका राज्य नहीं चल सकता ।
वो बिना सेवकों के स्वर्ग में नहीं रह सकते। सेवकों के बगैर
स्वर्ग होता ही नहीं, और सेवक चाहे स्वर्ग मे ही क्यों न जीता
हो वस्तुतः वह अपने ही नर्क में साँस लेता है। क्योंकि, असली
स्वर्ग गुलामी में नहीं मनुष्य की स्वतंत्रता में है। यह
स्वतंत्रता हमारी चेतना और विचारों की स्वतंत्रता है।
हमारा यह खूबसूरत संसार अरबों सालों से
की गयी आदमी की मेहनत का परिणाम है। आदमी के भीतर मेहनत करने
की अपार शक्ति है, किन्तु गुलाम बनकर मेहनत करते रहने से आदमी
की आत्मा का विकास नहीं हो सकता। आज भी कुछ जातियाँ आदमी के
नौकरी करने के पक्ष में नहीं है, ये जातियाँ व्यापार करने के
लिए अपने लोगों के बिना ब्याज बिना जमानत के पूंजी भी उपलब्ध
कराती है, कि कोई भी छोटा मोटा धंधा करो, पर नौकरी नहीं।
वैसे यह चेतना है, आदमी की स्वतंत्रता
की, किंत आदमी नौकरी नहीं करे, यह मानने वाला आदमी दूसरों को
अपनी नौकरी में बिना झिझक रख लेता है, यह आदमी की स्वतंत्रता
की पूर्ण नहीं, अधूरी स्वीकृति है। चूंकि प्रत्येक अधूरी चीज़े
तकलीफ पहुँचाती है, इसलिए संसार में आदमी ने अपनी ज़िंदगी का
स्वर्ग रचते-रचते अनजाने अपना नर्क भी रच लिया । किसी काम को
गुलामी के रूप में करने पर और उसी काम को किसी प्रेम के कारण
ये दोनों ही स्थितियाँ कर्म के परिणाम को परिवर्तित कर देती
है। संसार को धन की व्यवस्था से चलने के सारे हानि और लाभों का
अनुभव मनुष्य जाति इस पृथ्वी पर कर चुकी है, और आज भी करती चली
जा रही है, अब प्रेम, सहयोग, और परस्पर सम्मान के बल पर
संचालित होने वाली उच्चतर वैकल्पित व्यवस्था को लागू किया जाना
बाकी है, जहाँ आदमी स्वतंत्रता की साँस के साथ-साथ श्रम का
गौरव अनुभव कर सके। मुस्कुराते हुए वह बकौल दुष्यंत कुमार कह
सके-
दुख नहीं कोई कि उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो ना हो आकाश सी छाती तो है।
गोविंद कुमार
‘गुंजन’
'वृंदावन',
63, नाकोड़ा नगर
खंडवा,
मध्यप्रदेश
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