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लकडहारिन
पीठ पर अपने दुधमुंहे बच्चे को बांधे हुए,
सर पर उठाये लकडी का गठ्ठा,
हर रोज की इंकार के बाद भी,
वह मेरे घर के सामने रुककर पुकार लगा ही लेती है।
इस एक सी पुकार और एक से इंकार में कोई उम्मीद नहीं है,
बस कुछ खुष्क उत्सुकतायें हैं-
कैसे काट लेती है वह पूरा एक गठ्ठर लकडी
?
कैसे बचाती है उस लकडी को फारेस्ट वालों से
?
कितना कमा लेती है वह
?
कैसे चलता है उसका घर
?
क्या उसका कोई सपना है
?
क्या
वह भी पाले है कुछ तुच्छ सी इच्छायें
?
क्या
वह थकती नहीं
?
क्या उसकी इच्छा नहीं होती है कि सुस्ता ले एक पल,
सोच ले कि आज नहीं जायेगी काम पर,
नहीं सतायेगी खुद को और उसकी पीठ पर चिपकी नन्ही सी जान को
?
हर रोज के इंकार के बाद भी वह क्यों पुकार लगाती है
?
क्या उसे लगता है कि मरने के बाद कोई कष्ट नहीं रहता है
?
क्या
वह खुष होना जानती है,
अपने बच्चे के साथ तुतलाते हुए चहकना जानती है
?
.....................
मेरा उससे इतना ही वास्ता रहा है,
कुछ प्रष्न और कुछ उत्सुकतायें,
और उसका मुझसे इतना ही वास्ता रहा है,
रोज
की एक उम्मीद भरी आकारहीन पुकार....।
एक जगह जहां पहुंच कर समय
हाथी की तरह बैठ गया है,
जहां दिन मठ्ठर से हो गये हैं,
जहां सबकुछ धीरे होकर रुकता हुआ इकठ्ठा हो रहा है,
वहां आतुरता के साथ,
मैं और वह उचककर देख रहे हैं,
कोई रास्ता,
जो निकलता हो आगे को...।
तरुण भटनागर
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