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उस शाम
तुम रोज शाम संवरती हो,
पर उस शाम,
देर तक उलझी रहीं किचन में।
दर्पण अब तक ताक रहा है,
उसके पैर होते तो वह किचन तक तुम्हें देख आता।
उसकी पीडा वैसी ही है,
जैसी हमेशा रही है,
मेरी तरह, तुम्हें
देखकर,
अपनी पीडा समय में घोल देना उसे नहीं आता।
उस शाम हवा नहीं चली।
पर पता चला कुछ पीले पपड़ाये पत्तो,
बरसों से गिरने को आतुर रहे हैं,
उस शाम वे कंपकंपाते रहे पेड़ों पर,
मुझे पता चला क्यों कांपती थीं मेरे बाबाजी की टांगें और गर्दन,
जबकी हम सोचते थे कि वे कुछ दिन और जियेंगे।
कीचड़-बेसरम झाड़ी से अटे किनारे पर,
टकराती रहीं,
नदी की छोटी लहरें,
उस शाम नदी की रुकी सी सतह पर,
रोज की तरह नहीं उतरा था सूरज,
क्योंकी अटका था एक ढ़ीठ बादल नदी और सूरज के बीच,
नदी का पानी रुका सा था सूरज के इंतजार में,
फिर नदी सो नहीं पाई शायद अंधेरों में
भी।
दरवाजे की संद से आई,
सिंदूरी आभा,
दीवार पर अंण्डाकार टिकी रही।
उस शाम,
यूं मुझे याद आई,
तुम्हारी ओवल शेप की सिंदूरी बिंदी।
उस शाम मोहल्ले के बच्चे,
देर तक खेलते रहे पिठ्ठुल।
उनका खेल देखकर,
आकाश थामे रहा,
थोडी सी रौशनी,
जो बितरी रहीं उनके खेल पर,
हवा पकड़े रही,
बच्चों की किलकारी,चिल्लाहटें,...
हर कोई थोडी देर और उनका खेल देखना चाहता था,
और यूं जानबूझकर रात थोड़ा आगे सरक गई।
दूर दिखते पहाड़ों का सलेटी धुंआ,
उस शाम पहली बार उतरा था मेरे भीतर,
वह रोज शाम उन पहाडों पर जम जाता है,
पर वह हमेशा मुझसे दूर-दूर रह आया है,
बाद में पता चला वह मेरे भीतर घुल गया था,
घुल गया था, ऑफिस
की चीकट थकान
में
और तभी मैं,
चाय सुड़कता,
ठूंसता रहा था,
खोल में अपना अंतरतम,
जैसे नाजी ट्रेनों में मासूम औरतों और बच्चाें को ठूंसते
थे,
मानकर उन्हें कूडा।
अक्सर जल्दी जल जाती हैं,
मेरे शहर की स्ट्रीट लाइटें,
और देर तक शाम के सिंदूरी गोले के सामने,
ताकता रहता है पीला सोडियम।
उस शाम,
लगा शायद मुनिस्पलिटी की गलती नहीं है,
वह कई दिनों से इसी तरह जलता रहा है,
बस मैं आज ही अभी-अभी उसे जान पाया हूं,
जान पाया हूं,कि
वह मेरे भीतर से आया है।
और यह भी,
कि कई दूसरे लोगों के भीतर से आये पीले सोडियम भी हैं,
जो शाम की रौशनी में खुद को खो देते हैं,
जाने वे क्या ताकते रहते हैं?
पास ही एक झुरमुट है,
उसमें एक चिड़िया का घोंसला है,
पता नहीं क्या हुआ,
उस शाम देर तक चिडिया वापस घोंसले नहीं लौटी,
मैंने पहली बार देखा,
कि किस तरह घोंसले के चूजे,
चिल्ला-चिल्लाकर चुप होते हैं।
उस शाम सूरज ने बहुरुपिये की तरह कई स्वांग रचे।
पहले वह भिखारी बनकर,
खडा था मेरे दरवाजे पर,
और मैंने उससे कहा-
'बाबा
कोई और दरवाजा देखो'।
फिर वह छोटे बच्चे का भेस बनाकर,
पहाड पर भद्द से बैठ गया।
वह इस तरह भेस बनाता है,
कि मैं एक बार भी नहीं जान पाता हूं,
कि वह सूरज है।
आंगन में अर्जुन के कुछ पेड लगे हैं।
उस शाम उनकी लंबी होती छांव,
मेरे पास आकर ठिठककर रुक गई।
उस शाम,
उसने जिद की कि मेरी विरक्ति समेटे बिना,
वह रात के अंधेरों में डिफ्यूज़ नहीं होगी।
वह छांव रोज शाम लंबी होकर ठिठकती रही है,
पर वह आज ही मुझसे इतना खुल पाई है,
कि मुझसे कह सके.........
पर लगा जैसे मैंने उससे पहले भी बात की है,
और तब उसे घिरती रात ने सिमेट लिया था,
और मैं वहीं छूट गया था,
अपनी विरक्ति के साथ.......।
तरुण भटनागर
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