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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007
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।। कविता ।।
एक बच्चे की हँसी
खो गई है
यहीं कहीं इस भीड़ में ।
कलियों –से होंठो पर
जड़ दी गई हज़ारों कीलें
कँटीले विज्ञापनों की ;
जिनमें प्रति नायक के
टेढ़े-मेढ़े चेहरे हैं
और हैं उधार ली गई आवाज़ें
मकड़ जाल में लिपटी
बेहुदी आकृतियाँ
खोखली हँसी
आपाधापी मचाती
दृष्टिहीन भगदड़
इसी में
चिथ गए हैं
अंकुर -से नन्हें पाँव ।
बुझ गई है दृष्टि
गले में फँसकर
रह गई है चीख
यहीं इसी अंधी भीड़ में
गुम हो गई
एक बच्चे की दूधिया हँसी
हो सके तो
ढूँढकर ला दीजिए ।
रामेश्वर कांबोज
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कविताएँ
क्रांति
- अभी तो
- नदी नहीं जानती
- सभ्यता के अवशेष
- पिता
- नहीं, आज नहीं
तरुण भटनागर
- हँसकर
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- लकडहारिन
- बच्चे और पौधे
- एक बच्चे की हँसी
भगतसिंह सोनी
- चार कविताएं
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