vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

एक बच्चे की हँसी

 

खो गई है

एक बच्चे की हँसी

यहीं कहीं इस भीड़ में ।

कलियों से होंठो पर

जड़ दी गई हज़ारों कीलें

कँटीले विज्ञापनों की ;

जिनमें प्रति नायक के

टेढ़े-मेढ़े चेहरे हैं

और हैं उधार ली गई आवाज़ें

मकड़ जाल में लिपटी

बेहुदी आकृतियाँ

खोखली हँसी

आपाधापी मचाती

दृष्टिहीन भगदड़

इसी में

चिथ गए हैं

अंकुर -से नन्हें पाँव ।

बुझ गई है दृष्टि

गले में फँसकर

रह गई है चीख

यहीं इसी अंधी भीड़  में

गुम हो गई

एक बच्चे की दूधिया हँसी

हो सके तो

ढूँढकर ला दीजिए ।

   रामेश्वर कांबोज

 ◙◙◙

 

कविताएँ

क्रांति

- अभी तो

- नदी नहीं जानती

- सभ्यता के अवशेष

- पिता

- नहीं, आज नहीं

  तरुण भटनागर

- हँसकर

- उस शाम

- लकडहारिन

रामेश्वर कांबोज

- बच्चे और पौधे

- एक बच्चे की हँसी

भगतसिंह सोनी

- चार कविताएं

 

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google