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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

नहीं, आज नहीं

 

नहीं, आज नहीं फिर कभी

फिर कभी मैं लिखूँगी तुम्हारी याद में कविता

अभी तो टेंशन है भारत-पाक सीमा पर,

अभी तो पकड़ा नहीं गया बिन लादेन,

अभी तो गुजरात के लोग भूले नहीं भूकंप की त्रासदी

मुझे तो इस बार भी उदास लगी छब्बीस जनवरी

 

नहीं, आज नहीं फिर कभी

जब मेरी मुट्ठी में एक समूचा दिन होगा

किसी-तितली की तरह, किसी जुगनू की तरह

लेकिन छोड़ा ना - क्या रखा है तितली में ?

क्या रखा है जुगनू में भी ?

 

तितलियों को पकड़ा ते समझ आया

कितने कच्चे हैं उनके रंग, कैसी फ़ीकी है उनकी छाप

और जुगनू ?

जुगनू भी कहाँ दिखते हैं आजकल

अब तो शहर में बच्चे

झींगुर को भी क्रिकेट के नाम से पहचानते हैं

और अब वो सावन की झड़ियाँ भी कहाँ हैं ?

कहाँ है वह कागज की नाव ?

अब तो हमारे घर की छत भी नहीं टपकती,

अब पिताजी का हाथ भी नहीं रहा सिर पर

और ऐसे में अगर मैंने लिख भी दी कविता

तो वह कहाँ छपेगी ? उसे कौन पढ़ेगा ?

अब तो पुरानी सहेलियाँ भी मिलती हैं

तो दुनिया भर की बाते करती हैं,

अपना मोबाइल चेक करती हैं, इ-मेल एड्रेस देती हैं

मगर नहीं कहतीं, क्यों रे! तू ने कोई नई कविता लिखी ?

लिखी हो तो चल सुना, चाय-वाय तो होती रहेगी बाद में

 

अब किसी के भी भीतर

सुरसुरी नहीं दौड़ती कविता के नाम पर -

नहीं, आज नहीं,  नहीं, आज नहीं

नहीं, मुझे अब कभी नहीं लिखना

तुम्हारी याद में कविता

क्रांति

203, टॉवर-3, साईनाथ स्क्वयेर

मदर्स स्कूल के पीछे, जलाराम का रास्ता,

बडोदरा, गुजरात - 390021

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कविताएँ

क्रांति

- अभी तो

- नदी नहीं जानती

- सभ्यता के अवशेष

- पिता

- नहीं, आज नहीं

  तरुण भटनागर

- हँसकर

- उस शाम

- लकडहारिन

रामेश्वर कांबोज

- बच्चे और पौधे

- एक बच्चे की हँसी

भगतसिंह सोनी

- चार कविताएं

 

 

 

 

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