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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। कविता ।।

 

 

पिता

 

पिता के जाने के बाद

बोलने लगा उनका चश्मा, छाता

इंक पेन, स्वेटर, कोट

यहाँ तक कि बोलते हुए लगने लगे

उनके जूते-चप्पल भी

 

पिता के हँसते-मुस्कराते

और यदा-कदा के अवसाद भरे चेहरे पर

हम जो कभी न पढ़ सके

उस थकान की एक-एक लकीर

अब साफ़ झलक रही है

फ्रेम जड़ी उनकी तस्वीर में

 

अपने मौन में

बहुत मुखर हो गये हैं पिता

 

क्रांति

203, टॉवर-3, साईनाथ स्क्वयेर

मदर्स स्कूल के पीछे, जलाराम का रास्ता,

बडोदरा, गुजरात - 390021

 ◙◙◙

 

कविताएँ

क्रांति

- अभी तो

- नदी नहीं जानती

- सभ्यता के अवशेष

- पिता

- नहीं, आज नहीं

  तरुण भटनागर

- हँसकर

- उस शाम

- लकडहारिन

रामेश्वर कांबोज

- बच्चे और पौधे

- एक बच्चे की हँसी

भगतसिंह सोनी

- चार कविताएं

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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