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सृजनगाथा


 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। दोहे ।।

 

 

जीवन अब मुश्किल लगें

 

महानगर यह धन्य है, धन्य यहाँ के लोग ।

क़दम-क़दम उद्योग है, अंग-अंग अभियोग ।।

 

गली-गली में चाँदनी, घर-घर काली रात ।

कौन किसे असली कहे, किसकी समझे बात ।।

 

सोया-सोया दिन लगे, और उनींदी रात ।

खान-पान औ नींद का, बिगड़ गया अनुपात ।

 

दंगे, धरने, रैलियाँ, ज़लसे, जाम, ज़मात ।

रोज़-रोज़ होते यहाँ, कई-कई उत्पात ।।

 

झोंपड़पट्टी-झुग्गियाँ, अतिक्रमण के भाग ।

महानगर की देह के, ये बदसूरत के दाग़ ।।

 

होटल, महफ़िल, कैबरे, फ़िल्म और रोमांस ।

महानगर को बाँटते, ये मस्ती उल्लास ।।

 

आते ही मिलते यहाँ, सबको ये उपहार ।

दर्द, दिखावा, दूरियाँ, दहशत के अंबार ।।

 

महानगर तुमने दिया, हमको यह वरदान ।

जीवन अब मुश्किल लगे, मौत लगे आसान ।।

 

डॉ. रामनिवास मानव

अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,

सी.आर.एम.जाट पीजी कॉलेज, हिसार

हरियाणा 125001

 

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दोहे

डॉ. रामनिवास मानव

 

 

 

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