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जीवन अब मुश्किल लगें
महानगर यह धन्य है, धन्य यहाँ के लोग ।
क़दम-क़दम उद्योग है, अंग-अंग अभियोग ।।
गली-गली में चाँदनी, घर-घर काली रात ।
कौन किसे असली कहे, किसकी समझे बात ।।
सोया-सोया दिन लगे, और उनींदी रात ।
खान-पान औ’ नींद का, बिगड़ गया अनुपात ।
दंगे, धरने, रैलियाँ, ज़लसे, जाम, ज़मात ।
रोज़-रोज़ होते यहाँ, कई-कई उत्पात ।।
झोंपड़पट्टी-झुग्गियाँ, अतिक्रमण के भाग ।
महानगर की देह के, ये बदसूरत के दाग़ ।।
होटल, महफ़िल, कैबरे, फ़िल्म और रोमांस ।
महानगर को बाँटते, ये मस्ती उल्लास ।।
आते ही मिलते यहाँ, सबको ये उपहार ।
दर्द, दिखावा, दूरियाँ, दहशत के अंबार ।।
महानगर तुमने दिया, हमको यह वरदान ।
जीवन अब मुश्किल लगे, मौत लगे आसान ।।
डॉ. रामनिवास ‘मानव’
अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
सी.आर.एम.जाट पीजी कॉलेज, हिसार
हरियाणा –
125001
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