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सृजनगाथा
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वागर्थ प्रतिपत्तये
वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007
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।। भाषांतर ।।
अपने हाथों का तकिया बना लो।
आकाश अपने बादलों का धरती अपने ढेलों का और गिरता हुआ पेड़ अपने ही पत्तों का तकिया बना लेता है।
यही एकमात्र उपाय है गीत को ग्रहण करने का निकट से उस गीत को जो पड़ता नहीं कान में, जो रहता है कान में। एकमात्र गीत जो दोहराया नहीं जाता। हर व्यक्ति को चाहिये एक ऐसा गीत जिसका अनुवाद असंभव हो।
रोबर्तो हुआरोज़
अनुवाद- कृष्ण बलदेव वैद
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कवि
रोबर्तो हुआरोज़ (अर्जेंटीना)
फ़रूग फ़रूखजाद (ईरान)
कुसुमाग्रज (मराठी)
ग्रेस (मराठी)
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ।बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ।सुधीर शर्मा, डॉ।जे।आर।सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः प्रशांत रथ