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फूलों की प्रार्थना
(मराठी कविता )
आइए,
पधारिए
आहिस्ता आहिस्ता
सबेरे चमकती किरनें सूर्य
की
बूँद-बूँद ओस की बिखरी
हरित पत्तों से हम आए
इस दुनिया में हैं
खिले
बस इतने से हृदय हमारे
पर इनमें कोष सुगन्ध के
हंसते डोलते
उछाल
देते
अनुभूति लेने उनकी
आइए,
पधारिए
परंतु आहिस्ता आहिस्ता....
कभी
छुपे आड में पत्तों की
कभी रोयें झूठ मूठ का रोना
झोंको का हलकी हवा
के
कभी ल हम मजा
बहुविध रंग नए
शरीरों पर हमारे
निर्मल
सुंदर
अन्तर्याम हमारा
मिलने हमसे
आइए,
पधारिए
परंतु आहिस्ता
आहिस्ता....
मूल -
कुसुमाग्रज
अनुवाद - डॉ. शैलजा
श्यामा
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