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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। व्यंग्य ।।

 

 बेताल कथा

 

ज्ञान और शैतान की कहानी


गिरीश पंकज

 

विक्रमार्क बेताल को कंधे पर लाद कर एक बार फिर महल की ओर रवाना हो गए। उसके चेहरे पर तनाव बिल्कुल नहीं था। बेताल बोला- राजन, तुम तो गज़ब कर रहे हो। ऐसा आदमी मैंने आज तक नहीं देखा। बार-बार चुनाव में घर कर के नेता माफिया बन जाते हैं लेकिन तुम तो हाने के बावजूद तो ताज़ा नज़र आते हो। अखिर राज क्या है !

 

विक्रमार्क अपनी मस्ती में चला जा रहा था। उसने कोई बयान नहीं दिया । बेताल  मुसकराया मैं समझ गया राजन तुम मेरे बहकावे में नहीं आना चाहते । सीधे महल पहुँचने की जल्दी में हो। ठीक है, मैं तुम्हें फिर एक सुंदर-सी कहानी सुना रहा है। हमसे तुम्हारा मन बहल जाता और रास्ता भी आदमी से कष्ट जाएगा।

 

विक्रमार्क मन ही मन बड़बड़ाया- तुम चुप रहो तो ...........। बेताल की अज़ीब है। पहले कहानी सुनाना है। फिर सवाल पूछता है। मुझे कुछ कुछ बोलना पड़ता है और उसके बाद ये छूमंतर हो जाता है। इस बार इसके झाँसे में नहीं आने वाला ।

 

राजा विक्रमादित्य चुपचाप चलता रहा बेताल ने मुसकराते चलता रहा।

 

बेताल ने मुस्कराते हुए कहानी शुरु की-

 

किसी राज्य में एक राजा के कुछ कारिंदे थे। कुछ अच्छे थे, कुछ गंदे था। इन्हीं गंदे लोगों के एक था शैतान सिंह । चेहरे से बड़ ही शालीन नज़र आता, लेकिन भीतर से उतना ही कुटिल राजा महेन्द्र कुमार ने शैतान न को राज्य में शिक्षा, एवं न्याय  व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी दे रखी थी। लेकिन शैतान सिंह का पूरा ध्यान शिक्षा पर कम कर्म पर ज़्यादा रहता । शिक्षा के प्रचारप्रसार के लिए जो धनराशि प्राप्त होती, उसे शैतान सिंह हज़म कर जाता ।

 

उसी राज्य में एक छोटा कर्मचारी रहता था ज्ञान प्रकाश वह भी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में भिड़ा रहता । उसका काम था शाला में जाकर बच्चों को पढ़ाना । बच्चों में ज्ञान का तेजी से प्रसार हो, इसलिए ज्ञान प्रकाश घर-पर जाकर बच्चे को पढ़ाता ।

 

ज्ञान प्रकाश के इस समर्पण भाव के कारण धीरे-धीरे उसका यश फैलने लगा। शैतान सिंह अपने नाम के अनुरूप शैतानियाँ करता रहा। वह राजकोष को लूटता रहा लेकिन ज्ञान प्रकाश को प्रताडित करने में भी उसने कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी। 

 

एक दिन शैतान सिंह ने ज्ञान प्रकाश को बुलाया और उसे हड़काते हुए बोला- तुम लोकप्रियता हासिल करने के लिए बच्चों को ज्ञान बाँटना छोड़ो। मैं तुम्हारी चाल समझ रहा हूँ। तुम मेरी कुरसी हथियाना चाहते हो। संम्भल जाओ । मैं आधिकारी हूँ । मेरी, कुरसी खाने की कोशिश करोंगे तो में तुम्हें खा जाऊँगा।

 

लेकिन मैंने तो ऐसा कुछ सोचा ही नहीं - ज्ञान प्रकाश बोला, मैं तो खाली समय में अपनी सेवाएँ देता हूँ। इसके बदले में राज्य से पारिश्रमिक भी नहीं लेता । लोग ज्ञानी बनें , इसलिए में अपना समय दे रहा हूँ इसके पीछे मेरा कोई स्वार्थ नहीं।

 

वो मैं कुछ नहीं जानता, शैतान सिंह बोला, तुमको जो काम दिया गया है, तुम उतना ही करो। शाला जाओ, बच्चों को पढ़ाओ और घर लौट जाओ। इससे ज़्यादा कुछ मत करो।

 

ज्ञान प्रकाश कोई उत्तर नहीं दिया। मनमार कर घर लौट आया पर उसने अपना काम बदस्तूर जारी रखा। लोनों ने देखा कि ज्ञान प्रकाश ने अपना एक विद्यालय शुरू कर दिया है। जो बच्चे पाठशाला तक पहुँच नहीं पाते थे। उन्हें ज्ञान प्रकाश की राजकीय शाला में प्रवेश मिल जाता था।

 

विक्रमार्क को तो अब बोलना की मजबूरी थी। उसने कहना शुरू किया- शैतान सिंह के चिढ़ने का कारण साफ था। कोई मातहत कर्मचारी अपने अधिकारी से ज़्यादा लोकप्रिय हो जाए इसे कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता । ऐसे बिरले हैं। शैतान सिंह भीतर से भी शैतान था, वह ज्ञान प्रकाश  के पीछे पड गया । और राजा से शिकायत करके उसे नौकरी से निकलवा दिया। शैतान सिंह ने सोचा कि ज्ञान प्रकाश उसके पास आकर गिड़गिड़ाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे ज्ञान प्रकाश ने अपना ही एक विद्यालय शुरु कर दिया। इससे ज्ञान प्रकाश की लोकप्रियता और अधिक बढ़ने लगी । आखिर तंगी भी नहीं रही। ज्ञान प्रकाश के इस साहसिक निर्णय से यह संदेश भी लोगों तक पहुँचा कि गुलामी से बेहत्तर है अपना छोटा-मोटा काम । जो सच्चा सुकून देता है।

 

राजा विक्रमार्क के उत्तर बिल्कुल सही था। उसका मौन भंग भी हो चुका था। बस क्या था, बेताल को उड़न छू होने का मौका मिल गया । और फिर बेतलवा डाल पर जाकर लटक गया । राजा को हर बार की तरह उसके पीछे भागना पड़ा।

  गिरीश पंकज

जी-31, न्यू पंचशील नगर

रायपुर, छत्तीसगढ़

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