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तसलीमा नसरीन से
कौन डरता है?
संजय द्विवेदी
पश्चिम
बंगाल में नंदीग्राम पर मचे संग्राम की हकीकत को समझा जा सकता
है,
लेकिन कोलकाता में जिस तरह एक
अल्पसंख्यक संगठन
के लोग तसलीमा के मुद्दे पर सड़कों पर उतरे वह मामला साधारण
नहीं है। लेखिका तसलीमा नसरीन अपने वतन बंगलादेश से निर्वासित
जीवन जीते हुए पिछले कई वर्षों से कोलकाता में रह रही हैं।
उनकी वीजा की अवधि बढ़ाने को लेकर कुछ अल्पसंख्यक संगठन नाराज
हैं। एक लेखिका से लेखन के स्तर पर ही बातचीत होनी चाहिए।
उन्हें जबरिया प्रताड़ित करने या कष्ट देने का कोई कारण नहीं
बनता।
यह पहली घटना
नहीं है,
इसके पहले भी हैदराबाद में तसलीमा नसरीन के
कार्यक्रम में इसी तरह का हंगामा हुआ था। उन पर हमला हुआ,
जिसमें आंध्र के एक विधायक भी शामिल थे। किसी
भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज के लिए यह घटनाएँ अच्छी नहीं कही
जा सकतीं। तसलीमा ने अपने लेखन के माध्यम से बंगलादेश में
अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को दर्शाया है। उनकी पुस्तक
लज्जा को लेकर शायद इसीलिए उन्हें अपने देश से निर्वासित होना
पड़ा। एक लेखक के स्तर पर उनकी रचनाएँ किस स्तर की हैं,
इसका मूल्याँकन तो साहित्य के श्रोष्ठ आलोचक
ही करेंगे किंतु जिस मुद्दे को लेकर तसलीमा का विरोध हो रहा है,
वह बेहद मानवीय पहलू है। किसी भी विरोध को
हिंसक होते देखना बहुत पीड़ादायक होता है। इससे विरोध की
गंभीरता भी नष्ट हो जाती है।
तसलीमा ने अपने
देश बंगलादेश में जो कुछ भी देखा और महसूस किया,
उसे अपनी पुस्तक में बयान किया। यह किताब बहुत
से लोगों के लिए पीड़ादायक भी हो सकती है,
लेकिन इससे लेखिका की हैसियत कम नहीं होती। हर
लेखक को अपने समय के सच को लिखने,
व्यवस्था से जूझने और प्रतिवाद करने का हक है। तसलीमा ने भी
यही किया। वे अपने लेखकीय धर्म का पालन कर रही हैं,
लेकिन दुनिया इतनी सहज नहीं है। वह एक लेखक के
लेखक होने पर भी उसके लेखन के विषयवस्तु का भी नियमन करना
चाहती है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी
लेखक को अपने
लेखन के पूर्व धार्मिक नेताओं की स्वीकृति लेनी होगी। किसी भी
समाज में घट रहे सच को बयान करना क्या अपराध बन जाएगा?
और यह अपराध अगर लेखक करेंगे,
तो क्या उनका सर कलम कर दिया जाएगा।
दुनिया का कोई भी
सभ्य समाज इस तरह की चीज़ों को स्वीकार नहीं करता। धर्म के नाम
पर जिस तरह के अधर्म दुनिया ने देखे हैं,
उससे वह विचलित है किंतु धार्मिक नेताओं की
फौजों के नाते बहुत-सा सच सामने नहीं आ पाता। लेखकों,
चिंतकों और विचारकों का यह धर्म है कि वे अपने
युग सत्य के साथ संवाद करते हुए उन विषयों को रेखांकित करें,
जो विषय जनमन में चल रहे हैं या जनता जिसका
समाधान चाहती है। ज़मीनी हकीकतों पर लिखना बहुत कठिन होता है
और इसके अपने
खतरे भी हैं।
प्रख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने इसीलिए कहा
था-अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे। तसलीमा शायद इस सत्य
को सबसे ज़्यादा करीब से महसूस कर रही हैं। एक लेखक के खिलाफ़
किसी समुदाय को भड़काया जाना और उसके लेखन का गलत तरीके से
प्रतिवाद शुभ प्रवृत्ति नहीं है। लेखन को लेखन के स्तर पर ही
काटा जाना चाहिए। किसी भी संवाद का जवाब विवाद नहीं होता,
किसी भी लेखन का जवाब लेखक का सर नहीं होता।
लेखक अपने समय के सच को अपनी नजर से व्याख्यायित करता है। यह
ज़रूरी नहीं कि दूसरे भी उस विषय वस्तु को उसी ही नज़र से
देखें या सहमत हों। तसलीमा से सहमत होना ज़रूरी नहीं है।
बावजूद इसके असहमति को इतने विकृत तरीके से व्यक्त करना गलत
ज़रूर है। एक लोकतांत्रिक समाज में एक लेखक के लेखन के लिए
अवकाश नहीं होगा। शब्दों के लिए स्पेस नहीं होगा। संवाद के लिए
जगह नहीं होगी, तो वह समाज किन अर्थों
में लोकतांत्रिक होगा।
भारत परंपरा से
ही एक लोकतांत्रिक जीवंत और प्राणवान समाज है,
जहाँ बहस, विमर्श और
समाज की एक लंबी और सनातन परंपरा रही है। भारत के ऋषि-मुनि,
साधकों और विद्वानों ने विरोध को सदा मंच दिया
और स्वीकार किया। शायद इसीलिए चारवाक का दर्शन भी यहाँ एक अलग
विचार के रूप में मान्यता पाता है। उनका सुखवाद का दर्शन भारत
की किसी परंपरा से मेल नहीं
खाता,
बावजूद इसके उनके विचारों को सुना गया और उस
पर सोचा भी गया। लेखक या विचारक अपनी चिंतनधारा से नए-नए विषय
लेकर उपस्थित होते हैं। यह कतई आवश्यक नहीं कि उनकी मान्यताओं
पर समाज अपनी मुहर लगाए ही। तसलीमा का प्रसंग भी हमारी नैतिकता
और समझदारी पर सवाल
खड़े करता है।
किसी स्त्री से लड़ने का यह तरीका कौन सा धर्म सिखाता है?
संवाद का जवाब संवाद,
लेखन का जवाब लेखन यही परिपाटी हमें अपनानी होगी। तस्लीमा से
लड़ रहे लोग दरअसल बहुत डरे हुए लोग हैं,
जो एक लेखक के लेखन से घबराकर राजकीय संपत्ति
को नुकसान पहुँचा रहे हैं। आम जनता की ज़िंदगी में कड़वाहट घोल
रहे हैं। मेहनत, मजदूरी कर अपना
जीवन-यापन करने वाले लोगों के दैनिक जीवन को कष्टमय बना रहे
हैं। लाठियों और तलवारों से लैस लोग जिस तरह नारे लगाते हुए
कोलकाता की सड़कों पर पुलिस पर ईंट,
पत्थर और सोडावाटर की बोतलें फेंक रहे थे,
वह उनकी बेबसी ही बयान करता है।
एक धर्म निरपेक्ष
और लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते भारत की ज़िम्मेवारियाँ
बहुत अलग हैं। उसे ऐसे तत्वों को किसी भी सूरत में बढ़ावा नहीं
देना चाहिए,
जो धर्मांधता की राजनीति कर भारतीय समाज में
ज़हर घोलने का काम कर रहे हैं। तोड़-फोड़ और हिंसा के माध्यम से
अपनी बात कह रहे लोग हमारी सामुदायिक एकता को छिन्न-भिन्न करना
चाहते हैं। यह समय विवेक के आधार पर फैसले लेने का है,
जिससे भारतीय समाज में इस तरह की प्रवृत्तियों
का विस्तार रोका जाना चाहिए। क्योंकि किसी भी प्रकार की
सांप्रदायिकता दूसरे तरह की सांप्रदायिकता को प्रेरित करती है,
जो अंतत: राष्ट्र और राज्य दोनों के लिए
ख़तरनाक है।
संजय द्विवेदी
स्थानीय
संपादक, दैनिक हरिभूमि
रायपुर,
छत्तीसगढ़
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