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आज मुझे तुलसी बहुत याद आते हैं
विजय कुमार दुबे
आज
मुझे तुलसी बहुत याद आते हैं । इसलिए याद आते हैं, क्योंकि
तुलसी के समय में अकबर का शासन था भारतवर्ष में, फिर भी तुलसी
ने अपने रामचरित मानस में जिस धर्म की व्याख्या की वह एक
व्यापक धर्म था, जिसे तुलसी के पहले शंकराचार्य ने
“सनातन
धर्म”
कहा था। “सनातन
धर्म”
एक लोक धर्म था और वह एक संस्कार के रूप में लोगों में उतरता
था । आज जब लोगों को हिन्दु धर्म पर बड़ा गर्व हो रहा है, आज
जब “मनुवाद”
कहकर “सनातन
धर्मियों”
को गरियाया जा रहा है, आज जब हर धर्मावलम्बी
“लोक”
और “मनुष्य”
की कीमत पर धर्म की रक्षा के लिए तलवारें भाँज रहा है, तब मुझे
तुलसी बहुत याद आ रहे हैं। तुलसी बाबा ने कहा---
“जब
जब होहिं धरम कै हानी,
बाढ़हिं असुर महा अभिमानी।
तब तब लै प्रभु मनुज शरीरा,
हरही सकल सज्जन भवपीरा।।”
भगवान
राम ने वन में वाल्मीकि जी से पूछा कि हम वन में कहाँ रहें,
उपयुक्त स्थान बतावें। गोस्वामी जी ने कहा---
“पुछहूं
मोहु रहौ कहं मैं पूछत सकुचाऊं,
जहंन होहु तहं देहुकहि तुम्हहि देखावों ठांऊं।”
कर्म
प्रधान और सन्यास प्रधान दृष्टियों में जब-जब अन्तर आया है
तब-तब उसके समन्वय का प्रयत्न हुआ है। भगवद् गीता ने समन्वय का
एक मार्ग दिया । मध्य युग के भक्तों ने उसके आगे का एक दूसरा
मार्ग दिया। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, तिलक, गांधी और
अरविंद ने आधुनिक युग में फिर नया मार्ग दिया । इन सबका
प्रयत्न यही रहा कि कर्म, सन्यास के रूप में परिणित हो जाए और
वह सन्यास समस्त भूतों की सेवा के रूप में । जब सिद्ध पुरूष
नीति-अनीति से ऊपर उठ जाता है और वह भूमा की स्थिति में आ जाता
है, वह व्यक्ति प्रकाश की स्थिति में काम करता है। उसकी
उपस्थिति में विभिन्न प्रकार के आचारों की सीमा की पहचान
स्पष्ट होती है। व्यवस्था की गतिशीलता के लिए यह पहचान बहुत
आवश्यक है।
श्रवण परम्पराओं और भक्ति सम्प्रदायों की उपलब्धि का मूल्याँकन
हमें इसी दृष्टि से करनी चाहिए । हमें देखना चाहिए कि इन्होंने
हमें कितने ऐसे प्रकाश स्तम्भ दिए जिन्होंने नीति धर्म की
पुनर्व्याख्या की है। तुलसी धर्म और कर्म की व्याख्या इस
प्रकार करते हैं-
“सौ
सब धर्म-कर्म जरि जाऊं,
जिहि न राम पद पंकज भाऊ।
जांत-पांत धन धर्म बड़ाई,
सब तजि रहै, तुम्हहि मन लाई।।”
सारा संसार कहता है तुलसीदास हिन्दू धर्म के उद्धारक थे।
तुलसीदास की किसी पुस्तक में
“हिन्दू”
शब्द नहीं हैं। जिन्होंने कहीं हिन्दू शब्द का उपयोग नहीं किया
। वह हिन्दू धर्म का उद्धारक कैसे होगा। रामजी ऋषि से पूछते
हैं, प्रभु, वन में मैं कहा रहूं। उपयुक्त जगह बतावें। ऋषि
बड़े चतुर थे। उन्होंने उन्हें किसी शहर, क्षेत्र, मुहल्ले का
नाम नहीं बताया और कहा जो व्यक्ति धर्म से चिपका रहे, जाति से
चिपका रहे वहाँ तुम मत रहो। तुम्हारे लिये वह जगह नहीं है,
जहाँ हाहाकार होता है हरिकीर्तन का, हरिकीर्तन ने नाम से जहाँ
साम्प्रदायिकता होती है, वहाँ तुम मत रहो। तुम वहाँ रहो, जहाँ
इस सबको छोड़कर केवल तुममें ध्यान रहता है। तुममे ध्यान का
अर्थ होता, सबमें ध्यान । छोटे से छोटे प्राणी के दुःख का
ध्यान । उसकी आवश्यकता का ध्यान का । राम में ध्यान का अर्थ
चुपचाप माला जपना नहीं है, पूरे जीवन को देखना है। उस व्यक्ति
ने एक सीमित धर्म की बात नहीं कही। एक बड़े मानवीय मूल्य की
बात कहीं। जिससे जुड़कर आदमी कहीं का हो, ज़रूरी नहीं कि वह
हिन्दू हो, ज़रूरी नहीं कि वह ब्राह्मण हो, ज़रूरी नहीं कि वह
भारत का ही हो, क्योंकि राम, कृष्ण ये सिर्फ भारत के नहीं हैं।
तुलसी का राम “दृष्टि-चेतना”
का एक ज्वार है, जिसने राम को व्यापक बनाया। हमने आज वह
व्यापकता खो दी और उस व्यापकता को खोने का सीधा परिणाम हुआ कि
देश भी संकुचित हुआ, प्रदेश भी संकुचित हुआ।
“जग
मंगल गुण ग्राम राम के,
दानि मुकुति धन धरम धाम के।”
जीना सबसे बड़ा धर्म है। जिससे जिया जाये वह धर्म है।
विश्वामित्र ने कुत्ते का मांस खाया तो उनकी निंदा हुई।
उन्होंने निंदकों को उत्तर दिया, जीना सबसे बड़ा धर्म है। धर्म
है जीने के लिए, जीने से ही सारी चीज़े चलती हैं। एक बार उस
धर्म से निरपेक्ष हुआ जा सकता है। पश्चिम में द्वैव भाव था।
वहां धर्म पिता शासक होता था, हमारे यहाँ ऐसा नहीं था। पश्चिम
में द्वैत का आधार था उन्हें सेकुलर की आवश्यकता थी। हमारे
यहाँ द्वैत था ही नहीं । हमारे यहाँ लोकायत या लोकतंत्र से
शासन होता था। शासन का आधार आध्यात्म नहीं था। शासन का आधार
प्रत्यक्ष जीवन में, प्रत्यक्ष प्रमाण में जो दिखता था वही था।
लोक में जो होता है उसे ही लोकायत कहते हैं। प्रत्यक्ष कार्य
के लिए प्रत्यक्ष व्यवस्था का स्वीकार यही लोकायत है भारत का।
इसका अर्थ “नास्तिकता”
नहीं है। हम अप्रत्यक्ष के लिए परोक्ष को स्वीकार करते थे।
प्रत्यक्ष के लिए प्रत्यक्ष को । इसमें द्वैत कहाँ था । दोनों
एक दूसरे के पूरक थे।
तुलसी का भाव देखिए—सगुण-निर्गुण
की व्याख्या कैसे करते हैं—
“हिय
निरगन
नयनन सगुन
रसना नाम ललाम”
आज
की “सेकुलर”
व्याख्या ने “धर्म
निरपेक्ष”
शब्द के द्वारा धर्म को लंगड़ा कर दिया। यही दुर्गति
“संस्कृति”
की “कल्चर”
ने किया है।
हमें तो
कल्चर का अनुवाद ही भाया
।
धर्म के लिए “रिलीजन”
शब्द अच्छा लगा। रिलीजन में
“बायस
पूर्व राग”
है । आज प्रिज्युडिस पूर्ण द्वेष है। यानी रिलीजन में
“राग”
और “द्वेष”
दोनों हैं। कल्चर बड़ी चीज़ है कहकर समेट लिए । फिर छांटना
शुरू किए। संस्कृति को निराकार, निर्गुण, धर्म निरपेक्ष आदि
बनाने के लिए चल पड़े ।
“तुलसी”
नहीं चाहिए, ब्राम्हणवादी था। कबीर को कल्चर में ले लो। चैतन्य
महाप्रभु को भी हटा दो गड़बड़ होगा। शंकराचार्य को तो पूरी तरह
छोड़ो, बुद्ध चलेंगे। कल्चर में हमने यह काट-छाँट की संस्कृति
विकसित की । एंथ्रोपोलाजी के हमारे नृतत्वशास्त्री कल्चर के
कटघरे कें कैद हमारी संस्कृति की ऐसी-तैसी कर रहे हैं।
हमारे पास हजारों वर्षों का इतिहास है। हमारे पास शब्द है
संस्कार, इसका गंभीर अर्थ है। संस्कार और संस्कृति में बड़ा
भेद है। तुलसी ने समाज को एक संस्कार दिया, एक अर्थ, एक दृष्टि
दी। गांधी ने “रामराज्य”
की कल्पना की, वह राज्य तुलसी के
“रामचरित
मानस”
का राम राज्य
था
। गांधी से 300 वर्षों पूर्व उसकी परिकल्पना तुलसी ने की ।
उसकी सारगर्भिता गांधी ने महसूस की । गांधी के सारे सहचर हिंदू
नहीं थे और गांधी के राम अवतारी नहीं वे नाम थे-
ईश्वर अल्ला तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान
तीन सौ वर्षों बाद तुलसी के संस्कार और तुलसी के राम को समझाने
वाला एक संत आया - गांधी । उसने तुलसी के लोक मंगल को समझा।
प्राध्यापक तो द्वैत में उलझे रह गए। मैं उन्हीं तुलसी को
थोड़ा-थोड़ा जानता हूँ। थोड़ा-थोड़ा पहचानता हूं । आज जब धर्म
की व्याख्या “दंभ”
के साथ की जा रही है। आज जब देश में किसी भी धर्म को, किसी भी
सम्प्रदाय को, किसी से कोई खतरा नहीं है, फिर भी भयभीत किया जा
रहा है। और कहा जा रहा है, कि धर्म के लिए उत्सर्ग करो तब
बार-बार मुझे तुलसी आद आते हैं।
एक समय जब काशी के पण्डित रामचरित मानस को अधर्म और पाप कह कर
आग लगाते हैं, तुलसी को मार-मार कर अधमरा कर देते हैं। किसी भी
मंदिर में उन्हें जगह नहीं मिलती, किसी भी मठ में उन्हें टिकने
नहीं दिया, तब तुलसी मस्जिद में जाकर रामचरित मानस को पूरा
करते हैं और कहते हैं—
“मस्जिद
में रहिबे,
और राम गुन गइबे।”
ऐसा
कहते हुए वे “लोक-मंगल”
और “धर्म”
की व्याख्या करते हैं। धर्म विषय में हमारे सभी शास्त्रों में,
ग्रंथों में व्यापक परिभाषा है—
“तर्कों
अप्रतिष्ठः श्रुतियों विभिन्नः,
न एको ऋषि यस्य वचनं प्रमाणं।
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां,
महाजनो येन गतः स पन्थाः।।”
महाभारत काल में उपस्थित यक्ष प्रश्न का उत्तर धर्मराज
युधिष्ठिर ने इसी प्रकार दिया था। यह कौन-सा धर्म था । यह
“हिन्दू”
धर्म तो नहीं था। यह तो एक संस्कार था हिन्दुस्तान का-
“महाजनो
ये न गतः स पन्थाः”
फिर तुलसी ने पुनः धर्म की व्याख्या की। तुलसी ने अपने राम को
अधिकतर समय वन में रखा । अधिकतर समय लोक के समक्ष रखा। अधिकतर
समय वह जन और व्यापक परिप्रेक्ष्य से जुड़ा है। आज वह राम
“अयोध्या”
तक सीमित हो गए। तुलसी ने धर्म की व्याख्या इस प्रकार की—
“परहित
सरिस धर्म नहिं भाई
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई
निर्णय सकल पुराण वेद कर
कहऊँ तात जानहि कोबिद नर
नर सरीर धरि जे पर पीरा
करहिं ते सहहि महा भव भीरा
कालरूप तिन्ह कहं मैं भ्राता
सुभ अरू असुभ कर्मफल दाता”
तुलसी ने अपने राम के मुँह से धर्म की ये व्याख्या कराई है। आज
इस जबर्दस्त “राम”
क्रान्ति और “हिन्दू”
क्रान्ति के अवसर पर मुझे तुसली बहुत याद आते हैं। उनके
जन्मदिन के अवसर पर मैं यह महसूस करता हूँ कि कलियुग मे
“तुलसी”
और “गांधी”
से बड़ा कोई राम भक्त नहीं हुआ। दोनों ने अपने-अपने ढंग से
“लोक”
रूपी राम की उपासना की। तुसली ने मानस में उस चरित्र का वर्णन
किया और “गाँधी”
ने अपने चरित्र में उस राम भक्ति को उतारा।
आज एक और वर्ग है, जो न गांधी को मानता न तुलसी को मानता। उनके
राम क्रुद्ध राम हैं।
“जब-जब
होहिं धर्म कै हानी”
से इन्हें सिर्फ कुछ मंदिर और कुछ मस्जिद दिखते हैं । और सच तब
मुझे तुलसी बहुत याद आते हैं।
विजय कुमार दुबे
जाँजगीर, छत्तीसगढ़ -
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