vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।।ललित निबंध।।

 

 

चन्द्रमा मनसो जातः


शिवप्रसाद सिंह

 

ज मन बहुत उदास है। कोई खास बात नहीं, कोई माहौल भी बुरा नहीं है। मौसम भी अच्छा ही है। आसमान साफ है। नीली-नीली गहराई में तैरते पंछी अच्छे लगते हैं। गर्म धूप शरीर को सुहाती है। सामने खेतों में सरसों फूली है । पीली-पीली मंजरियाँ वसन्त के उदय की पूर्वसूचना दे रही है, पर मन उदास है।

 

यह मन भी बेढब चीज़ है। यह न तो पृथ्वी के पास है, न समुद्र के। न तो वनस्पतियों के पास है, न पशुओं के। यह सिर्फ मनुष्यों के पास है। यानी यह सिर्फ हमारीमनोपली है। वैज्ञानिक कहता है कि यह कुछ नहीं है। सारा शरीर चीर-फाड़कर देख चुके, इसका कहीं पता नहीं चला। दार्शनिक कहता है कि वाह, है कैसे नहीं, यही तो चीज़ है जो पशु से मनुष्य को अलग करती है। अन्नमय, प्राणमय कोश पशु के पास भी है । मनुष्य के भी। पर मनुष्य पशु नहीं है, क्योंकि उसके पास मनोमय कोश है, जिसे वह चाहे तो विज्ञानमय और आनन्दमय कोशों में बदल सकता है। यानी मन ही वह चीज़ है जिसमें आगे सारी सम्भावनाओं के अंकुर विद्यामान हैं। बड़ी बेशकीमती चीज़ है यह, पर लगता है आजकल कहीं से गड़बड़ा गई है, इसी से तो आजकल मन बड़ा सुस्त है।

 

पच्चीस दिसम्बर वैसे भी अच्छा दिन है। इस दिन मैं काफी खुश रहने की कोशिश करता रहा हूँ। ठीक से तो याद नहीं कि यह कोशिश कितने वर्षों से जारी है; पर दस-बारह वर्षों से ज़रूर ही मैं इस दिन खुश रहने की कोशिश करता रहा हूँ। बड़ा महत्त्वपूर्ण दिन है। इस बार इसका महत्त्व थोड़ा और बढ़ गया । इसी दिन अपोलो-8 चन्द्रकक्षा में दस चक्कर लगाकर पृथ्वी की ओर लौट पड़ा।

 

चन्द्रमा से सिर्फ साठ मील की दूरी पर उसके चौगिर्द दस चक्कर । यानी आखिर  को शताब्दियों बाद, बल्कि कोट्यब्दियों बाद भांजे बूढ़े मामा को इतने नज़दीक से देख सके। आह, कितना सुन्दर, ऐन्द्रजालिक, शीतल, सम्मोहक और आकर्षक था यह दूरस्थ चन्द्रबिम्ब ! संसार के कवियों का परम आत्मीय उप-मान, बच्चों का निरन्तर आहूयमान स्वप्न-लोक,सोने की कटोरियों में दूध-भारत लाने वाला चन्द्रा मामा, नारियों का प्रियस्मारक, प्रेमविवर्धन, प्रेरणास्त्रोत, पुरुषों के झुलसते मस्तिष्क को सहलाने वाला चिरसहचर, प्रेमीयुगल की चटवर्ती लीलाओं का द्रष्टा और साक्षी, सम्पूर्ण जलराशियों को अपने प्रतिबिम्ब से चाँदी की तरलायित मालाओं में बदलने वाला मंडनकार शिल्पी, हर भास्वर, तेजोद्दीप्त पुरुष के उत्तमांग में स्थित प्रभामंजल, और भारतीय दार्शनिकों, तान्त्रिकों, साधकों का प्रिय सोमतत्त्व पहली बार मानव-चक्षुओं के इतना नज़दीक आ गया कि हम उसे नग्न, यथार्थ और सही ढंग से देख सकें। यह मनुष्य-मन के दुर्विजेय दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि यह रहस्यमय अन्तरिक्ष की सारी बाधाओं का उल्लंघन कर के चन्द्रमा के पास पहुँच सका।

 

अपोलो-यान का कमाण्डर फ्रैंक बोरमैन कहता है कि यह चन्द्रमा गहन, स्तब्ध सन्नाटे से भरा बीहड़ विस्तार मात्र है, इसमें कुछ नहीं है। यह भद्दी चट्टानों से बने बादलों के पूँज-सा लगता है। यह निश्चय ही इतना अनाकर्षक है कि यहाँ कोई रहना नहीं चाहेगा। उसका सहयात्री लॉवेल उससे भी एक कदम आगे बढ़कर घोषणा करता है-चन्द्रमा का विराट अकेलापन भयोत्पादक है। अन्तरिक्ष की असीम मरुभूमि में सिर्फ पृथ्वी की मोहक मरुद्यान-सी लगती है। ऐण्डर्स को यह चन्द्रमा वीभत्स लगता है। कम से कम सुबह और शाम तो सुहावनी होनी ही चाहिए। पर यहाँ की सुबहें और शामें तो और भी खतरनाक हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षाकृत कम चका-चौंध पैदा करने वाली रोशनी में चन्द्रमा की प्राकृतिक वीभत्सता और भी अधिक भयानक लगती है।

 

मीलों गहरे अन्ध क्रेटर, वनस्पतियों से बिलकुल वंचित धूसर मरुविस्तार, सीधी डरावनी पहाड़ियों का अस्थिपंजर, हवा की पेटी से रहित नग्न वातावरण जिसमें चमकते तारे अदृश्य दानव के दाह चक्षुओं की तरह अपलक टकटकी बाँधे ताकते हुए, आग उगलता सूर्य और जाने कब के बंजर पड़े वीरान मैदान। यही है हमारी सम्पूर्ण सौन्दर्य-चेतना का धनविग्रह चन्द्रमा।

 

चन्द्रमा का सारा चेहरा अनादिकाल में घटित भीषण उल्कापात से ऐसा विक्षत हो गया है कि उसे दारुण चेचक से विकृत संसार के सबसे बदसूरत आदमी के चेहरे के समान कहने में भी संकोच का अनुभव होता है।

 

मैं बात कर रहा था मन की, चर्चा करने लगा चन्द्रमा की। भला मन और चन्द्रमा में क्या सम्बन्ध सम्बन्ध है ? संबंध है और बहुत गहरा है। इसी से तो कहा गया था- चन्द्रमा मनसो जातः।

 

चन्द्रमा मन से पैदा हुआ । अनेक स्थानों पर चन्द्रमा को विराट् पुरुष का दक्षिण नेत्र कहा गया है। न सिर्फ पुरुषसूक्त में बल्कि उपनिषदों में भी इस धारणा की बार-बार आवृत्ति होती है। चक्षुषी चन्द्रसूर्यों (मुण्डक 2.1.4) गीता में विराटरूप के प्रसंग में भी अनन्त बाहूं शशिसूर्यनेत्रे कहा गया है।

 

भगवान् कृष्ण इस चन्द्रमा पर ऐसे लुभाए कि उन्होंने कहा- नक्षत्राणां-महं शशी। यानी नक्षत्रों में चन्द्रमा मैं ही हूँ। सो यह चन्द्रमा हमारे धर्म, दर्शनादि मे बड़ा महत्त्वपूर्ण माना गया है, इसमें संदेह नहीं। छान्दोग्योपनिषद् जिस पोडशी प्रजापति की बात करता है उसमें नवाँ स्थान चन्द्रमा का है। (4-4-9)

 

असल में चन्द्रमा सृष्टि का इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि इसकी उपेक्षा की ही नहीं जा सरता । सूर्य और चन्द्र या सोम इन्हीं दो तत्त्वों के विमर्श, संघर्ष और समन्वय से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है। सोम तत्त्व बहुत ही महत्त्वपूर्ण दार्शनिक पारिभाषिक शब्द है। यह सामान्यतया शीतलता, जल, दुग्ध, औषधि- जैसे स्थूल तथा ममता, दया, वात्सल्य, शालीनता यानी तमाम सौकुमार्य जैसे सूक्ष्म तत्त्वों का स्त्रोत है । जिमर के शब्दों में – चन्द्रमा जीवन का स्त्रोत है । यह अपस् यानी जय का शासक है। और यही जल सारी सृष्टि में संचरित होकर सभी जीवधारियों का पोषण करता है, उन्हें जीवित रखता है। यह चन्द्रोत्पन्न जल वस्तुतः हमारी पृथ्वी के लिए वही अर्थ रखता है, जो अमृत देव जगत् में । चन्द्रमा से गिरे ओसकण वनस्पतियों का, वनस्पतियाँ दूध का और दूध मनुष्य के भीतर रक्त का निर्माण करता है। (मिथ्य एण्ड सिम्बल्स इन इण्डियन आर्ट एण्ड सिविलिजेशन, पृष्ठ-60)

 

चन्द्रमा या सोमतत्त्व की दार्शनिक व्याख्या में न जाकर हम यदि उसके कुछ पर्यायवाची शब्दों पर विचार कर लें तो चान्द्र तत्त्व का काफी स्पष्टीकरण हो जाएगा। अमर कोश में चन्द्रमा के निम्नलिखित पर्याय दिए गए हैं। हिमांशु, यानी शीतलता देने वाला चन्द्रमा, अर्थात् जो आह्वाद का मानदण्ड हो। इन्दु, जो आर्द्र करे। विधु वह, जिससे ज्ञान प्रेरित हो। सुधांशु, जो अमृत किरणों वाला है। शुभ्रांशु, जो प्रकाशपूर्ण है। ओषधीश, जो वनस्पतियों का स्वामी है, जैवातृक, यानी वह जो जीवन देता है। सोम, वह है जो अमृत स्वरूप है या जो नित नूतन (सूयते जायते नवो वनो भवति) होता रहता है। कलानिधि, स्पष्टतः ही कलाओं की महत् राशि का नाम है। नक्षत्रेश, शब्द उपर्युक्त गुणों वाले नक्षत्र के लिए सहज ही अभिधेय है।

 

ऐसे नक्षत्र के परमपुरुष के मन से उत्पन्न होने की बात कितनी अर्थमयी है। मैं सोचता था कि शायद उसने मेरे जैसे उदास मन की स्थिति में इस ग्रह को बनाया होगा; पर लगता है कि यह सही नहीं है, इतना आह्वादकारी यन्त्र उदास मनःस्थिति की रचना नहीं हो सकता । यदि ऐसा होता तो यह जीवनदातृ नक्षत्र नहीं, तमस् का पूँज होता। पर यह आज तक प्रकाशदायक देवता की तरह पूज्य है। संसार के अनेक अवतार पूर्ण चन्द्र में जन्में, ज्ञान को प्राप्त कर सके, और इसी को उन्होंने अपने महापरिनिर्वाण का समय भी चुना।

 

द्वितीया के चन्द्र का महत्त्व तो कहना ही क्या ? वह परम शिव के मस्तक पर विराजमान है। इसका अर्द्धवृत्ताकार क्षीण चन्द्रमा प्रथम वागोद्भव का प्रतीक है। यह सृष्टि के सबसे प्रथम और सबसे सूक्ष्म तत्त्व नाद का सूचक है। (मिथ एण्ड सिम्बल्स इन इण्डियन आर्ट एण्ड सिविलिजेशन, पृष्ठ-205) यह चन्द्रमा हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मों का पूजास्पद है।

 

उसी चन्द्रमा के भयानक रूप की बातें सुनकर आज मन उदास है। पर जब मैं इस उदासी की व्याख्या करता हूँ, तब लगता है कि यह कितनी निरर्थक है। असल में चन्द्रमा सुन्दर, समतल, हरे-भरे प्रदेशों वाला जनाकीर्ण ग्रह होता, तभी उदास होने की बात होती ।

 

सम्पूर्ण पृथ्वी को अमृत, सोम, शीतलता और जीवन देने वाले ग्रह को ऐसा ही होना पड़ेगा, जैसे चन्द्रमा है। यदि वहाँ स्वयं जीवन होता, हरियाली होती, जल होता, जीवधारी होते तो चन्द्रमा का समूचा रसतत्त्व उन्हीं के पोषण में खर्च हो जाता। चन्द्रमा महान् त्यागी भगिनी-भक्त ग्रह है, जो सूर्य से प्राप्त उष्ण अग्निशक्ति को सोम में बदलकर उसे निःशेष भाव से पृथ्वी को सौंप देता है। वह स्वयं जल रहा है, ऊबड़-खाबड़ है, वीभत्स है, भयानक है, धूसर है, नीरस है; पर यह इसलिए कि वह अपनी सारी शक्ति किसी और ग्रह के पोषण के लिए उत्सर्ग कर देता है। वह असल में पृथ्वी का फेफड़ा और हृदय है। क्या फेफड़े और हृदय का दृश्य बहुत सुन्दर होता है ? किसी भी अस्पताल में इनको देखकर मन घबरान् लगता है, पर क्या यह सही नहीं है कि शरीर में रक्तसंचार और जीवन का अवदान इन्हीं की अनवरत अविश्रमित क्रिया के कारण होता रहता है? चन्द्रमा प्रकृति द्वारा निर्मित ऐसा ही यन्त्र है, उसकी भयानकता से काँपो मत, डरो मत, क्योंकि उसकी ऐसी गठन इसीलिए है कि तुम्हारे जीवन को अमृत देने में वह सक्षम हो सके। वह वक्र है, पर निरन्तर शिवत्व से संयुक्त है, इसीलिए वन्द्य है-

 वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् ।

यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्दः सर्वत्र वंद्यते ।।

◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google