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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। लघुकथा ।।

 

 

और वह


रूप देवगुण

 

एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह फूला न समा रहा था । उसे उम्मीद थी कि वह शीघ्र ही नौकरी पा लेगा । किंतु कुछ ही दिनों में उसे अपने आप पर भी विश्वास न रहा था । उसे लगने लगा था कि वह सदा बेकार रहेगा ।

      

कैसे जीवन व्यतीत करेगा वह ?” यह सोचते ही वह डर जाता था ।

      

एक दिन उसके सामने उसके पिताजी बैठे थे, जिनको सरकारी नौकरी से रिटायर होने में केवल एक मास बाक़ी था । अचानक उसके मस्तिष्क में एक सोच उभरी, अगर पिता जी आजकल में मर जाएं तो उसे उनके स्थान पर नौकरी मिल सकती है । यह विचार आते ही उसे अपने जीवन की सार्थकता के चिन्ह दिखाई देने लगे ।

      

लेकिन वह कुछ आगे सोचता कि अचानक उसके पिता के झुर्रीदार चेहरे में से उसे उसके लिए स्नेह, ममता से परिपूर्ण कष्ट झेलती एक अपनत्व समेटे मूर्ति साकार रूप लेती दिखाई दी ।

      

और वह फफक-फफक कर रो उठा ।

  रूप देवगुण

सिरसा, हरियाणा

 

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  लघुकथाकार

 

कैलाश वनवासी

आनंद बहादुर

jरूप देवगुण

डॉ. मधु सन्धु

 

 

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