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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

दो कविताएँ

 

डर

संगीत लहर उठथी-गिरती

यह मन भी वैसा करता है

पा लेने से आरोह-तान

जाने क्यों इतना डरता है

यह इन्द्र उसे भय सदा

न कोई छीने इसका सिंहासन

अवरोह-तान से डरता है

विचलित हो जाता इसका मन

ooo

 

प्रकृति और पुरुष

दिवस-पंछी उड़ गये

जीवन तरु सूख गया

वर्षों की डालियाँ, पत्रहीन

करतीं उपहास मानों

मानव असफलता का

प्रश्न एकजग में क्या स्थिर है ?

कितना खोखला दावा है

मनुज का

ऋतुचक्र आज भी चलता है

जैसा आदिम युग में

बदला है-तो बस आदमी  

  प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'

एफ एफ-4/ बी, ब्लॉक, सनपावर फ्लैट्स

गुरुकुल रोड़, अहमदाबाद, गुजरात - 380052

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कविताएँ

त्रिलोचन

नीलाभ

कुमार अंबुज

विश्वरंजन

प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'

सीमा सोनी

विपिन चौधऱी

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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