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दो कविताएँ
डर
संगीत लहर
उठथी-गिरती
यह मन भी वैसा
करता है
पा लेने से
आरोह-तान
जाने क्यों इतना
डरता है
यह इन्द्र उसे
भय सदा
न कोई छीने इसका
सिंहासन
अवरोह-तान से
डरता है
विचलित हो जाता
इसका मन
ooo
प्रकृति और पुरुष
दिवस-पंछी उड़
गये
जीवन तरु सूख
गया
वर्षों की
डालियाँ, पत्रहीन
करतीं उपहास
मानों
मानव असफलता का
प्रश्न एक ? जग
में क्या स्थिर है ?
कितना खोखला
दावा है
मनुज का
ऋतुचक्र आज भी
चलता है
जैसा आदिम युग
में
बदला है-तो बस
आदमी
प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'
एफ एफ-4/
बी, ब्लॉक, सनपावर फ्लैट्स
गुरुकुल रोड़, अहमदाबाद,
गुजरात - 380052
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