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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। नवगीत ।।

 

 

तेरे मन की थाह

 

तेरे मन की थाह

न मैंने अब तक पाई है ।

तूने मुझे निहारा-

मेरा तन-मन सिहर गया,

महुए के फूलों का सौरभ

मन में उतर गया,

मेरे कानों में

       आकर कहती पुरवाई है ।

 

ज्यों ही तूने छुआ

कि मैं फूली कचनार हुई,

रजनीगंधी से बतियाती

हरसिंगार हुई,

मेरे गालों की

       ज़्यादा बढ़ गई ललाई है ।

 

रोम-रोम में

गूँज उठी रागों की शहनाई,

आँखों की पुतली में सपनों ने

ली अँगड़ाई,

रंगों के पोखर में

       सुधियाँ उतर नहाई है ।

 

डॉ. यशोधरा, राठौर

102, शिबू टॉवर, होस्पीटो इंडिया के पास

बुद्धा कॉलोनी, पटना, बिहार

  ◙◙◙

 

 छंदकार

माह के छंदकार

राज मलकापुरी

- सच बोलने का तज़ुर्बा

- प्यार जताने को ग़ज़ल कहता हूँ

- पेड़ साया ज़ुदा नहीं करते

- हम तो शायर हैं

- करो वक़्त का इलाज़

नवगीत

सोम ठाकुर

महेश संतोषी

श्यामलाल शमी

डॉ. यथोधरा राठौर

यश मालवीय

दोहा

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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