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तेरे मन की थाह
तेरे मन की थाह
न मैंने अब तक पाई है ।
तूने मुझे निहारा-
मेरा तन-मन सिहर गया,
महुए के फूलों का सौरभ
मन में उतर गया,
मेरे कानों में
आकर कहती पुरवाई है ।
ज्यों ही तूने छुआ
कि मैं फूली कचनार हुई,
रजनीगंधी से बतियाती
हरसिंगार हुई,
मेरे गालों की
ज़्यादा बढ़ गई ललाई है ।
रोम-रोम में
गूँज उठी रागों की शहनाई,
आँखों की पुतली में सपनों ने
ली अँगड़ाई,
रंगों के पोखर में
सुधियाँ उतर नहाई है ।
डॉ. यशोधरा, राठौर
102, शिबू टॉवर, होस्पीटो इंडिया के पास
बुद्धा कॉलोनी, पटना, बिहार
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