vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। भाषांतर ।।

 

 पंजाबी उपन्यास(धारावाहिक-3)

रेत


हरजीत अटवाल

अनुवादः सुभाष नीरव

 

(आपने अब तक पढ़ा - भाग एक / भाग दो )

स्कूल में मैंने करीब दो साल ही लगाये। पढ़ने मे मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। इन दो-ढाई सालों में मैं अंग्रेजी पढ़ने और बोलने योग्य हो गयी थी। स्कूल में अधिकांश छात्र गुजराती थे, इसलिए दिल भी अधिक नहीं लगता था। पंजाबी छात्र तो हम तीन ही थे। गुजरातियों के दिन-त्यौहार स्कूल में मनाये जाते। एक गुजराती लड़का बंगी मेरे साथ कुछ अधिक ही बातें किया करता। मेरे पास आकर बैठता। जब उसने मुझे हाई रोड पर मिलने का न्यौता दिया तो मुझे कुछ होश आया कि अगर डैडी को पता चल गया तो क्या होगा। इसके बाद मैंने बंगी से कतराना शुरू कर दिया।

स्कूल छोड़ते ही मुझे हाई रोड पर एक स्टोर में काम मिल गया। स्टोर के मालिक से डैडी ने पहले ही बात कर रखी थी। हाई रोड हमारे घर से दूर नहीं था। मैं पैदल ही काम पर चली जाती। काम पर मेरा दिल लग गया। स्टोर वाले मेरे काम से खुश थे। मैं अन्य लड़कियों की तरह बातों में समय नहीं गंवाया करती थी। जो काम मुझे सौंपा जाता, मैं ध्यान लगाकर कर देती। उन्होंने जल्द ही मुझे टिल्ल (गल्ले) पर लगा दिया, जहाँ मैं ग्राहक भुगताने का काम करती। मेरा काम देखकर वे मुझे ओवर-टाइम पर भी बुला लेते।

मम्मी भी काम पर जाती और डैडी भी। नीता मेरे से पाँच बरस छोटी थी। बिन्नी तो उससे भी छोटा था। जब हम इंग्लैंड आये थे, उस वक्त उसने अभी बोलना भी शुरू नहीं किया था। वे दोनों अब स्कूल जाते थे। स्कूल करीब होने के कारण वे स्वयं ही चले जाते।

डैडी गुरुद्वारे के प्रेमी थे। हमारा इतवार का दिन गुरुद्वारे में बीतता। अगर किसी इतवार डैडी का ओवर-टाइम लगना होता तो हम शाम का लंगर खाने गुरुद्वारे जाते, पर जाते अवश्य। डैडी हर रोज पाठ करते। उन्होंने मुझे गुटका ला दिया। लेकिन, मुझे पाठ करना अच्छा न लगता। कभी-कभी मम्मी भी पाठ किया करती। वह डैडी की तरह नित्य-नेमी नहीं थी। कभी मम्मी मुझे भी पाठ के अर्थ बताने लगती। कोई साखी सुनाने लग जाती। डैडी ने पाठ की कैसेट लाकर रखी हुई थी। कई बार सवेरे-शाम वह कैसेट लगा देते। घर में पाठ का स्वर मुझे अच्छा लगता, पर मेरे से गुटका पढ़ा न जाता।

हमारे यहाँ आने से पहले ही डैडी ने एक कार खरीद रखी थी, पर उसे चलाते बहुत कम थे। जब कभी गुरुद्वारे या किसी के घर जाना होता, तभी चलाते। नहीं तो कार घर के बाहर ही खड़ी रहती। कार चलाने को मेरा बहुत दिल करता। मेरे संग काम करतीं लड़कियों के पास कारें थीं। डैडी से कहकर मैं भी कार चलाना सीखने लगी। कई बार टैस्ट भी दिया, पर पास न हो सकी। वैसे डैडी कहते थे कि मैं कार बढ़िया चला लेती थी।

एक दिन, मैं काम पर से लौटी तो घर में डैडी का कोई दोस्त आया बैठा था। मैं उन्हें हैलो कहकर रसोई में चली गयी। पीछे-पीछे मम्मी आ गयी और कहने लगी,  तेरे लिए लड़का बता रहे हैं।"

रहने दे मम्मी, मैंने नहीं करना विवाह।"

क्यों नहीं करना?”

मैं… मैं अभी तैयार नहीं।"

बेटी, विवाह तो करवाना ही है, एक साल आगे या एक साल पीछे। तेरे डैडी चाहते हैं कि तेरा विवाह जल्दी हो जाये।"

बाद में मम्मी ने बताया कि डैडी ने ना कर दी है क्योंकि उन्हें रिश्ता पसन्द नहीं था। लड़का कद में छोटा था।

एक दिन मम्मी मुझसे पूछने लगी, “कंवल, ज़रा सोचकर बता कि किस तरह का लड़का चाहिए तुझे।"

मैं बगै़र सोचे ही बोली, “जो पगड़ी न बांधता हो।"

मम्मी ने दोनों हाथों से मुझे हल्के से धौल मारा, कभी-कभी वह ऐसे ही किया करती है। बोली,  तेरा बापू पगड़ी बांधता है!

ये तो डैडी हैं, डैडी तो तुझे पगड़ी के साथ ही मिले थे, मेरे पास तो चुआइश है अभी।"

यह तो ठीक है, तेरे डैडी कहते हैं कि कंवल की मर्जी के बग़ैर विवाह नहीं करना।"

 

 

क्रिसमस पर हमारा इंडिया जाने का प्रोग्राम बन गया। डैडी ने मेरा काम छुड़वा दिया। मम्मी के अनुसार डैडी कहते थे कि अगर कोई लड़का पसन्द आ गया तो वे मेरा विवाह कर देंगे। इसके लिए पता नहीं कितनी देर इंडिया में रहना पड़े। नहीं तो फिर से काम कर लेगी। इस स्टोर में नहीं तो किसी दूसरे स्टोर में काम मिल जाएगा।

हम इंडिया पहली बार गये थे। डैडी का चक्कर लगता रहा था, पर जब से हम इधर (लंदन) आये थे, अब ही जाना हुआ था हमारा। इंडिया जाना बहुत अच्छा लगा। आसपास अपना-अपना-सा लग रहा था। सारे चाचा-ताऊ और उनके बेटे-बेटियाँ हमारे साथ कुछ अधिक ही मोह कर रहे थे। सब अलग-अलग रहते थे, पर हमारे इंडिया आने पर सब एक जगह पर इकट्ठा हो गये। एक ही जगह पर रोटी बनने लगी। विवाह जैसी रौनक लगी रहती। गाँव के लोग भी मिलने के लिए आते रहते। मुझे सबसे प्यारी गुलाबां बुआ लगती। बुआ हर समय मेरे साथ रहती। अन्दर-बाहर जाने से लेकर सोने तक हम इकट्ठा रहते । बुआ कितनी ही छोटी-छोटी बातें मेरे साथ करती। हमारा प्यार देखकर मम्मी भी ईर्ष्या करने लगी थी। एक दिन, बुआ मेरे पास से हटी तो मम्मी कहने लगी, “देख तो ज़रा, गज भर की ढाक(कमर, पार्श्व) है, चाहती तो दर्जन भर बच्चे जन देती, पर यह तो कलमुंही रूठकर यहाँ आयी बैठी है।"

मुझे मम्मी की बात अच्छी न लगी। बुआ की अपने पति से बनी नहीं थी, इसलिए उसे छोड़ आयी थी और लौट कर ससुराल नहीं गयी थी। अब वह हमारे हिस्से वाले घर में रहती थी, लेकिन पूरे परिवार में बुआ का सत्कार होता था, किसी ने माथे पर शिकन नहीं आने दी थी। मम्मी शायद मेरे सामने ही ये शब्द बोल रही थी।

बुआ ही मुझे बताती कि कितने जोर-शोर से मेरे लिए लड़का ढूँढ़ा जा रहा था। जहाँ कहीं कोई बताता, डैडी और ताऊ जी कार लेकर दौड़ पड़ते। पर कोई भी लड़का उन्हें पसन्द नहीं आ रहा था। बुआ बड़े प्यार से मेरी गाल पर हाथ फेरते हुए कहती, “हमारी बेटी के लिए तो कोई राजकुमार ही चाहिए।"

एक दिन डैडी बहुत खुश-खुश घर लौटे। बुआ बताती थी कि जालंधर लड़का देखने गये थे। सारे आदमी बैठकर सलाह करने लगे। बाबा जी कह रहे थे, “न भाई, ये दुआबे वाले अच्छे नहीं होते, इधर ही अपनी बिरादरी का कोई लड़का मिल जाएगा, थोड़ा सब्र रखो।"

बापू जी, वहाँ (इंग्लैंड में) हम दुआबियों के बीच ही रहते हैं, कोई फर्क नहीं होता। तुम सब पहले लड़के पर ज़रा नज़र तो डाल लो, फिर कहना।"

मैं और बुआ दरवाजे की ओट में खड़ी थीं। बुआ ने मेरे चिकोटी भरी। मैं भी अब तक विवाह का सपना देखने लग पड़ी थी।

सबने जा कर लड़का देखा। अपनी-अपनी तसल्ली की। मम्मी और बुआ भी हो आए। बुआ बहुत खुश थीं, मम्मी भी उसकी तारीफें करती रही। डैडी ने मुझे अपने पास बुला कर कहा, “देख बेटा, हमने तेरे लिए लड़का देखा है। हम तब तक कोई हाँ नहीं करेंगे, जब तक तुझे पसन्द न हो। तू मम्मी और गुलाबां के संग जाकर देख आ और हमें आकर बता।"

मैं कुछ न बोली। बोलती भी क्या, मुझे तो शर्म ही आये जा रही थी। मेरा मन तो करता था कि एक बार लड़का देख लूँ, पर फिर सोचती कि जब सब इतने खुश हैं तो लड़का ठीक ही होगा। मैंने मम्मी से कह दिया कि मुझे लड़का नहीं देखना। लेकिन, डैडी जिद्द कर रहे थे कि मैं लड़के को देखूँ और उससे कुछ बातें अवश्य करूँ।

हम जालंधर पहुँचे। किसी होटल में सब इकट्ठा हुए। लड़के के साथ उसकी माँ और बहन थी। रास्ते में मैंने मन बना लिया था कि लड़के से दो-एक प्रश्न पूछूँगी और कहूँगी कि मुझे इंडियन पत्नी नहीं बनना, अपने बराबर समझना है तो विवाह करवाये। पर इतनी भीड़ में कोई बात न हो सकी। लजाते-लजाते दो-एक बार उसने मेरी ओर देखा और मैंने उसकी ओर। मुझे वह बहुत खास भी नहीं लगा कि मैं खुशी में उछल पड़ती, पर इतना बुरा भी नहीं था। ठीक-ठाक था। मैंने वहीं हाँ कर दी। सभी इतने खुश थे कि मैंने हाँ करना ही ठीक समझा।

पहले मुझे विवाह का चाव नहीं था, पर अब चढ़ने लगा था। जैसे-जैसे विवाह निकट आ रहा था, वैसे-वैसे वह लड़का मुझे सुन्दर लगने लगा। मेरा मन होता कि उससे एक बार मिलूँ ताकि जी भरकर देख सकूँ। उस दिन तो ठीक से देख भी नहीं सकी थी। मैं जानती थी कि जालंधर बहुत दूर था। दरिया पार करके जाना पड़ता था। अगर कहीं नज़दीक होता तो बुआ को संग लेकर उसके कालेज चली जाती, जहाँ वह पढ़ता था।

मुझे विवाह से कभी डर नहीं लगता था, पर ताऊ जी की बहू बहुत डराती। तरह-तरह की कहानियाँ सुनाने बैठ जाती। मुझे लगने लगता कि न जाने मेरा क्या होगा। मेरा पति पता नहीं कैसा होगा, ससुराल वाले कैसे पेश आएँगे मेरे साथ। पर मेरा डर निरा डर ही रहा। सब कुछ ठीक था। मेरी सास और ससुर बहुत अच्छे थे। घर के अन्य सदस्य भी। रवि तो मुझे बहुत पसन्द था। विवाह के बाद मुझे मालूम हुआ कि विवाह एक खूबसूरत चीज़ थी। यह तो एक बहुत बढ़िया और आनन्दमयी हादसा था, बेशक पहले ही घटित हो जाता।

विवाह के बाद मेरी ज़िन्दगी ही बदल गयी। हर चीज़ मेरे लिए बिलकुल नई हो गयी। मुझे आसपास का वातावरण बहुत प्यारा-प्यारा-सा लगा। ससुराल का छोटा-सा घर था, पर अच्छा लगता था। ससुराल में अगर कुछ अच्छा नहीं लगा था तो उनकी बोली। जो भी आता, अजीब-सी बोली बोलता। कई बार समझ में ही नहीं आता कि क्या कहा जा रहा है। सब लोग कुछ और ही तरह से बोलते।

मैंने अपनी अथाह खुशी मम्मी के साथ साझी की, तो वह खीझती हुई बोली, “रहने दे कंवल, ज्यादा न मचल, सारी दुनिया के ही विवाह होते हैं, हिसाब से ही खुशी ज़ाहिर की जाती है।"

बुआ रवि को देखकर बहुत खुश होती और कहती, “अपने मर्द को सम्भाल कर रखना कंवल, ऐसे मर्द कहाँ मिलते हैं! अच्छे मर्द डिबिया में डालकर रखने पड़ते हैं। पकी हुई फसल की तरह हर समय इनकी रखवाली करनी पड़ती है।" मेरे आसपास पतिनुमा लोगों की संख्या अधिक नहीं थी। हमारे मामा की बेटी शमिंदरजीत का पति भगवंत ही था। वह मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता था। हर समय बुझा-सा रहता। किसी से हँसकर बात न करता। शमिंदरजीत की किसी खुशी का ध्यान तो वह रखता ही नहीं था। और जहाँ कहीं भी सुनने को मिलता, सब औरतें भारतीय पतियों की बुराई करते न थकतीं। मेरे पर यही प्रभाव था कि हमारी स्त्रियाँ, पत्नियाँ कम और गुलाम अधिक होती हैं। पर रवि का व्यवहार कुछ अलग था। वह आम पति से हटकर था। यद्यपि वह कालेज में एम.ए. का विद्यार्थी था, पर व्यवहार में बहुत गम्भीर था।

 

 

मेरे विवाह के बाद डैडी ने जब मुझे बहुत खुश देखा तो उन्होंने अपनी वापसी की तैयारी कर ली। उनके लौट जाने के बाद, मैं महीना भर इंडिया में रही, फिर मैं भी लौट आयी। कुछ महीनों के बाद रवि भी आ गया। ये कुछ महीने मेरे लिए कुछ साल जैसे थे। मुझे लगता था, जैसे मैं काफी समय से अकेली होऊँ।

रवि आया तो पूरे घर में एक नई महक भर गयी। वह हर समय छोटे-छोटे मजाक करता रहता। घर के छोटे-मोटे काम दौड़-दौड़ कर करता। स्वयं को घर का एक जिम्मेदार सदस्य समझता। डैडी उससे खुश थे। मम्मी को तो वह बहुत पसन्द था। मम्मी हर समय कहती रहती, “कंवल, तू बड़ी लक्की है, ऐसे लड़के कहाँ मिलते हैं आजकल!

रवि को कारों की किसी फैक्टरी, जो कि डैग्नम में थी, में काम मिल गया था। दो हफ्ते दिन और दो हफ्ते रात। फिर, रवि ने फैक्टरी के अन्दर ही कोई कोर्स कर लिया और उसकी ड्यूटी स्थायी रूप से दिन की हो गयी। यह फैक्टरी घर से काफी दूर थी, पर वहाँ तनख्वाह काफी थी। फिर, रवि के कुछ मित्र भी वहाँ काम करते थे। आने-जाने की तकलीफ़ के बावजूद रवि वहाँ खुश था। वहाँ उसका मन रमा हुआ था।

रवि काम से कभी जी नहीं चुराता था। सप्ताह भर फैक्टरी में काम करके वीक एंड पर किसी दोस्त के साथ मार्किट लगवाने चला जाता। रवि को डैडी के घर रहना अच्छा न लगता। वह कई बार कह चुका था कि किराये पर कोई कमरा ले लेते हैं, लेकिन डैडी नहीं मानते थे। जब रवि ऐसी बात करता तो मम्मी उससे नाराज हो जाती। मम्मी मुझे किराये के मकान में रहते नहीं देख सकती थी।

इन्हीं दिनों में रवि ने ड्राइविंग का टैस्ट पास कर लिया। उसके साथ ही मैंने भी टैस्ट के लिए अप्लाई कर दिया। मैं भी पास हो गयी। टैस्ट पास करने के बाद रवि एक कार भी कहीं से ले आया। डैडी वाली कार अब तक खड़े-खड़े ही खराब हो गयी थी। उसकी एम.ओ.टी. करवाने ले गये तो उसमें जगह-जगह ज़र लगा मिला। यूँ ही फेंकनी पड़ी थी डैडी की कार।

एक ओर घर में सब खुश थे तो दूसरी ओर डैडी का मूड बदलने लगा। वह रवि से खफ़ा-खफ़ा से रहने लगे। रवि कार में सबको इधर-उधर घुमाता रहता, पर डैडी उसके साथ कम ही बैठते। वीक एंड पर गुरुद्वारे तक ही जाते। मैं डैडी को कुरेदने का यत्न करती कि उनके मन में क्या है, पर वे कुछ न कहते। एक दिन, वह मुझसे पूछने लगे, “तुम लोग पैसे भी जोड़ते हो कि कारें ही खरीदे जाते हो।"

यह बात तो मैंने कभी सोची ही नहीं थी। उन्होंने फिर कहा, “कितने पैसे हैं तुम्हारी बुक में?”

पता नहीं डैडी।"

पता रखा कर न... मुझे तो लगता है, इसने ये कार खरीद ली है और बाकी के इंडिया भेज रहा है।"

यह सच था कि रवि इंडिया में पैसे भेजता ही रहता था। यह बात तो उसने मुझे विवाह के बाद ही बता दी थी कि उसके घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। अब न उसने मुझे कुछ बताया था और न ही मैंने कभी पूछा था। मैं फिर से उसी स्टोर में काम करने लगी थी और सारी तनख्वाह लाकर रवि को दे देती थी। अगर रवि इंडिया में पैसे भेजता भी था तो मुझे एतराज नहीं था। डैडी बोले, “हम चाहते हैं कि तुम डिपोजिट लायक पैसे जोड़कर अपना घर लो। अगर यह इसी तरह सारी तनख्वाहें इंडिया भेजता रहा तो फिर ले लिया घर!

मुझे डैडी की बात ठीक लगती थी। इंडिया में तो जितने भी भेज दो, उतने ही कम होते हैं। मैंने घर लेने की बात रवि से की तो वह कहने लगा, “जान, यह साल तो हमें इंडिया के लेखे ही लगना है। अगले साल डिपोजिट लायक हो जाएँगे और घर ले लेंगे।"

मैंने यह बात डैडी को बताई तो वह आग-बबूला होकर बोले, “यहाँ फ्री में रहता है, न किराया, न रोटी का कुछ, हम तो सोचते थे कि घर ले लोगे, पर इसे तो पीछे वालों की ही चिंता पड़ी है।"

डोंट वरी डैडी, आइ विल टॉक टू हिम।"

डैडी कुछ सोचते हुए कहने लगे,  “नहीं, तू कोई बात न करना। बस, तू घर लेने की बात कर, घर ले लिया तो खुद ही कुछ नहीं बचेगा। किस्त और बिल ही सांस नहीं लेने देंगे।"

मुझे तो याद ही नहीं था, डैडी ने ही याद दिलाया कि विवाह से पहले मेरे द्वारा जोड़े गये पन्द्रह सौ पोंड यूँ ही पड़े थे। मेरे विवाह पर खर&