चिंता जिन करियो, हम हँ न !
आर. के. भँवर
डोंट वरी। नो फिक्कर। परेशान काहे की ? सब निपट जायेगा, हम हैं न, ऐसे तमाम हमदर्दियाना बातें अब ज़िंदगी से गुम होती जा रही हैं। इनकी जगह अब तू ही जानें फिर तेरा काम जाने, मेरे से क्या लेना-देना, या ... बोल दिया न कि तेरी किस्मत का ढक्कन ही ऐसा है या .. ये तो होना ही था, अब झेल, ऊपर वाले ने तेरे को झेलने के वास्ते ही तो बनाया है।
... अब इस भीड़नुमा समाज में वह बिल्कुल अकेला है। कोई नही है जो उसकी पीठ पर हाथ रखकर ये कहे कि चिंता जिन किहौ हम तौ हन । ऐसा कहना मात्र अगले के लिए एक जबर्दस्त सामाजिक सुरक्षा का बंदोबस्त कर देता है। समाज से धीरे धीरे मेलजोल, सांझापन और परस्पर सहयोग की भावना खलास होती जा रही है। मानवीय सम्बंधों में अब दूरियाँ अधिक हैं। पड़ोस में आदमी रहते है या उनके कुत्तो, क्या मतलब ? कौन मरा और कब मरा, क्या लेना-देना ? अपनी खिड़की पूरी बंद रहे या थोड़ी सी खुली रहे बस !
ये चिंता जिन किहौं वाला 'हम' जो है, उसे खोजना पड़ेगा, यह कहीं गुम हो गया है । इससे हम में भरपूर ताकत थी। मुठ्ठियाँ बंध जाती थीं तो मजाल क्या कि सत्ता का साया हो या दरोगे की बदमगजी, कोई रत्ती भर बिसात नही रखती थीं। ये वही बेलौस ढंग से 'हम' था 1857 के विद्रोह में और ये 'हम' ही था देष की आजादी के जनम दिन तक। मेरा रंग दे बसंती चोला या सर कटा सकते है पर सर झुका सकते नही ... ये भी 'हम' ने गाया होगा वह भी अंदर की आवाज़ से। ऐसी आवाज कि जिसके हजारों हम अपनी आजादी के वास्ते दीवाने हो गये थे। जब जब 'हम' पीछे धकेला गया है और 'मै' आगे आया है, दिक्कतें ही दिक्कते शुरू हुई हैं। सत्ता की रेवड़ी बंटने के समय 'हम' पर्दे के पीछे धकेल दिया गया और काबिज हो गया 'मै'। नतीजा सामने है। आजादी के छह दशक बाद भी उनका मै सत्ता की मजबूती के वास्ते कश्मीर मुद्दे कह मुरछाई चुहिया को गोबर सुंघाता रहा है। सीमा विवाद, पानी विवाद, भाषा विवाद 'हम' के तिरोहित होने और 'मै' के प्रकट होने से देश की छाती पर बेवजह जकड़े हुए हैं। विवाद 'मै' का बड़ा भाई है, जहाँ पर ये है तो मानकर चलिए कि किसी मै की पसड़ है। अब तक के अठ्ठावन वर्ष की उम्र वाले आजाद भारत के सारे झगड़ों की जड़ों में ये मै पल्थी लगाये बैठा है। इसे धकियाना होगा। अगर ये समय रहते नही गया तो पानी बांध के ऊपर से बहुत आगे निकल जायेगा।
जाओ भाई 'मै' ..... अब जाओ, 'हम' को अपनी जमीन पर पाँव धरने दो। हम नही है इसीलिए आदमी अकेला है और अकेले आदमी की दिक्कते भी हजारों है। सर पर हाथ रखने वाले मुँह फेरे हुए है। किसे सुनाएं और सुनाने से पहले उसकी सुने। सुनीसुनौव्वल में वह आदमी गुमसुम है। सोचता है कि समय कब बदलेगा। वह पीछे जायेगा कि नहीं और गया पीछे तो वह कलेजे वाला आदमी जो पूरे दम से कह सके चिंता जिन किह्यो हम हन न, मिलेगा कि नही । तब तनाव, चिंतायें, मुसीबतें मिल बांट कर झेली जाती थीं, सबके हिस्से में बस थोड़ी-थोड़ी आतीं थीं। फुरसत की चटाई पर मिल बैठकर समाधान निकाल ही लेते थे। एक दूसरे पर इतनी निश्चिंतता, इतना भरोसा और इतना दम, अंदर कहीं किसी कोने में भी दूसरे पर संशय जन्म ही नही लेता था। तब के उस आदमी के चेहरे पर जो प्रफुल्लता थी, वह आज के आदमी के चेहरे पर नही है। क्यों ? फिर आगे की बातों को दोहराना पड़ रहा है। 'मै' जब खंडित होता है, तो 'हम' की शरण में जाता है। ये हम आता है सामुदायिक दायित्व बोध के कारण, समन्वय-सहभागिता से, एक दूसरे से जुड़ने से, ये हमारी तकलीफ है, इससे हम सब निपटेंगे - की सोच से। जिस समाज में हम की जड़े बहुत गहराई में है, वह समाज मजबूत और खुशहाल रहा है और जहां 'मै' तरक्कियों चढ़ा हो, तो ऐसी तरक्की दीर्घजीवी नही होती क्योकि 'मै' खोखलेपन में रहता है।
मै एक मित्र के यहाँ गया , अस्लियतन उन्होंने अपनी कुछ कला कृतियाँ दिखाने के लिए बुलाया था। पहुंचा तो बड़ी गरमजोशी के साथ हाथ मिलाया, ड्राइंगरूम ले गये, परिवार के सदस्यों से जान पहिचान करायी। सब के साथ चाय चली। फिर उन्होंने अपनी आर्ट गैलरी दिखाई। बेहद उम्दा चित्र .... सभी जैसे सजीव हो, मै देखते-देखते उनमें सौ फीसदी खो गया। प्रकृति के रम्य रूपों के चित्रांकन में गजब की बारीकी थी। मुझसे रहा नही गया, पूछ लिया ये कृतियाँ सब के सो जाने के बाद बनाते होंगे ? बोले - दृनही भई, सब के साथ सभी के डिसकशन के साथ बनाई है। उनमें कोई भी ऐसी कला कृति नही है जो मेरे अकेले ने बनाई हो। मेरे हाथ जब कूचियों से खेलते थे, तब मुझे मेरी बेटी चाय का प्याला लेने को कह, सहभागिता का सुर देती थी। पत्नी और बेटा सब के सब अपने लगन व निष्ठा के साथ , इन चित्रों के नेपथ्य में है। इन सबके सामंजस्य से मै हूँ। उनके 'मै' के पीछे भी एक विराट 'हम' है। ये वही हम है जो कुछ कर सकने का जज्बा देता है। मुझे लगा कि एक चित्रकार अपने चित्रों के साथ पूरे पारिवारिक संतुलन में है। उसे ऊँचाईयों पर जाने की ललक नही है। अकेला ही प्रशस्ति नही पाना चाहता है। उसके हम में उपेक्षा व किसी परिजन के प्रति उदासीनता नही है। पत्नी, पुत्री, पुत्र सब खुष है। वहाँ सब एक दूसरे से मुसीबत में यही कहते है चिंता जिन किह्यो हम हूँ न।
एक महाशय ऐसे भी जिन्हें जीवन के पाँच दशक इस वास्ते खर्च हो गये कि वे कुछ है, सब लोग उन्हें जानें, उन्हें माने या उन्हें मान-सम्मान दें। घर में बेटा उनकी अनसुनी करता , बेटी शादी के एक साल के अंदर ही पवीलियन पर लौट आई और पत्नी .. कोउ नृप होय हमै का हानी, यानी कि उदासीन सम्प्रदाय की आजीवन सदस्या। अब ये महाशय अपने घर में अपने मै के कारण अकारण जिल्लत झेलते है । उनके जितने हम थे, उनकी वजह से ही किनारे हट गये।
चिंतायें 'हम' से डरती है और 'मै' से दिल लगाती है। मै को अकेला पायें तो दबोच लें। चिंताएं तो चाहती है कि आदमी 'मै' के फांस में फंसा रहे और 'हम' से दूर रहे। 'हम' चिंताओं पर चौतरफा हमला करता है। वे कट-कट कर गिरती रहतीं हैं, क्योकि 'हम' 'मै' नही है, अकेला नही है, वह सर्वजन का अंग है। बहुजन से पोषित है। इसलिए डर किस बात का ? ये दुनिया तितली की तरह रंगीली है। इसके रंग में कोई मै का भंग न डाले तो इसकी खूबसूरती के क्या कहने ! आज के तार-तार हो रहे इंसानी मूल्यों के लिए 'हम' को बचाये रखना बेइन्तेहां जरूरी है। यही है जो कहेगा - ! का हो, अब चिंता जिन किह्यो हम हँ न।
आर.के.भँवर
सी-501/सी,
इंदिरा नगर
लखनऊ, उत्तरप्रदेश
