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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   संस्मरण

 

खैरागढ़ को याद करते हुए...


संजीव बख्शी

 

 (खैरागढ़= पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी जी की कर्मस्थली)

खैरागढ़ के साथ एक बड़ी दिक्कत है जब भी खैरागढ़ के बारे में लिखना शुरु करता हूँ उहापोह में फँस जाता हूँ कहाँ से शुरु करुँ । विक्टोरिया हाई स्कूल से, वर्तमान में इसका नाम पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी के नाम से रखा गया है। अपने एक विद्यार्थी के नाम से अपना नाम पाने वाले इस स्कूल से यदि बात शुरु करुँ तो दूसरी बातें रह जाएंगी । यही बात एशिया  का इकलौता संगीत विश्वविद्यालय के साथ भी है जो राजा के शानदार महल में लगता है यह भी कि यह महल राजा साहब ने तब इस महल को इस षर्त में दान में दिया था कि यहाँ संगीत विश्वविद्यालय हो यह दो गुणा महत्व का महापुण्य का कार्य । मैं जानता हूँ वैसे भी बहुत सी जरुरी बातें रह जाने वाली है चाहे मैं कितना ही सतर्क हो कर लिखूँ मुझे अभी माफी माग लेना चाहिए ।बहुत सी बातें सुनी हुई है दादी ने बताई थी । कुछ बचपन की कच्ची बुध्दि से जानी हुई बहुत प्रमाणिक होने का कहीं दावा नहीं । खैरागढ़ की बातों में मस्ती भी इतनी है कि कहीं भी फिसल जाने का डर है इस सबके बावजूद लिखने का हौसला भी तो खैरागढ़ ने ही दिया है एक कविता के संदर्भ में एक दिन हीरा लाल अग्रवाल से एक पत्र पाता हूँ 'आप अच्छा लिख रहें हैं, लिखते रहें और खैरागढ़ का नाम रोशन करें। इस पत्र से मुझे खैरागढ़ की आवाज़ आती है ।

 

क्या रुक्खड़ स्वामी से बात शुरु की जाए या राजफेमली, दाउचौरा, इतवारी बाजार से, या बड़े पुल से जो अभी तो छोटा दिखता है पर जब बना होगा सबसे बड़ा रहा होगा चूना, गोंद, बेल और न जाने क्या-क्या मिलाकर तब बनाते थे गारा ।

 

तय कर लेता हूँ पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी से ......तब ही सामने आ जाते हैं कुछ जरुरी चेहरे और साथ ही पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी का आदेश 'भैया इन्हें मत भूलना' । मास्टर जी का इशारा मन ही मन मूब जी, भुनू दर्जी, बुतकँवर बरेठ, गुहा और उसका लाल रंग का तंदरुस्त घोड़ा जो जालबांधा बाजार जाने के लिए तैयार रहता, जैसे चरित्रों की ओर है मुझे ऐसा लगता है लछमन होटल, बलभद्दर होटल को भला कोई कैसे भूल सकता है वहाँ का रसगुल्ला, मीठा समोसा, मामा सेठ, गोविंद सिंधी, कपूरचंद, हरसेवक,कूर दर्जी, मल्ले याद आते हैं वही दया राम जी शीतोपलादीचूर्ण की पुड़िया बनाते दिखते विजयलाल  ओसवाल टुटकणेटहनगुरिया, माणिक गुप्ता, शिवकुमार तिवारी ऐसे चरित्रों की सूची भी है तो दूसरी ओर हेमदत्त झा, कर्महे ........।

 

कभी खैरागढ जाईए, पूछिए ये जेलर कौन है यह कोई सामान्य ज्ञान का प्रश्न नहीं, पूछिए डिप्टी इंस्पेक्टर का मकान, या नाजिर के बारे में कुछ जानेंगे घनी और सफेद मूछों वाले एक रूआबदार व्यक्तित्व वाले खान साब थे जो स्टेट के जमाने में जेलर थे, केव प्रसाद श्रीवास्तव डिप्टी इंस्पेक्टर आफ स्कूल हुआ करते थे पर मकान अब भी डिप्टी इंस्पेक्टर का मकान कहलाता है। ऐसा लगता है कि ये सब पदनाम न होकर उनके नाम थे सचमुच वह समय ही ऐसा था कि सब अपने पद को अपने नाम जैसा मानते ।

 

खैरागढ़ की अपनी एक पहचान यहाँ की छत्तीसगढ़ी बोली में अपनापन को लेकर है जो और दूसरे स्थानों से बिलकुल ही अलग है। बस्ती में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी बोली से राज फेमली में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी बोली मीठा में कुछ और मीठा है । राजफेमली एक मोहल्ला है राज परिवार से संबंधित सारे परिवार के लोग यहाँ रहते हैं उनका प्यार अनायास झलकता है जब अपने से छोटों को भाँचा संबोधित करते हैं यह एक मीठा ब्द बनकर हरदम उनके जुबान पर रहता हैं। ''अइहा'' जाने कितनी बार  अनजाने ही जुबान पर आ जाती है और मिसरी की तरह घुल जाती है । यह छत्तीसगढ़ी बोली और  खैरागढ़  एक दूसरे के पर्याय हैं । खैरागढ़ में जिन्हें कभी मौका लगा हो दावत खाने का या शादी आदि की पार्टी में जाने का उनसे जरूर पूँछें वहाँ मिला अपनत्व और सत्कार उन्हें कैसा लगा और यह भी कि वैसा नानवेज जो राज फेमली में खाया क्या और कहीं खाने को मिला ।

 

राजा बहादुर विरेंद्र बहादुर, रानी पदमावती देवी का यह खैरागढ़ है वहीं विक्टर लल्ला, ज्ञानेन्द्रसिंह,जोधा सिंह, जनार्दनसिंह, विध्नहरण सिंह, नारायण सिंह जैरण सर से लेकर लाल रामकुमार सिंह, रूद्रभूषण सिंह, सिध्दार्थ सिंह .............यहाँ स्थान कम है, नाम बहुत उन्हें सबको शामिल करते हुए उनके स्नेहमयी स्वभाव को प्रणाम करता हूँ ।

 

खैरागढ़ की बात हो तो नदियों का जिक्र जरूरी है आमनेर, मुस्का, नदियों के नाम हैं, खैरागढ़ चारो ओर से नदियों से घिरा है बाढ़ आने के अनेक किस्से हैं वहीं यहाँ का ऐतिहासिक फतह मैदान अनेक मार्मिक क्षणों का साक्षी बना खैरागढ़ की शान बढ़ा रहा है। एक बात जो  खैरागढ़  के साथ है कि बात चाहे कहीं से शुरु की जाए बात आकर पुराने बस स्टैंड के एक पान ठेले के सामने  पहुँच जाती है।अभी-अभी एक अपरिचित व्यक्ति बस से उतर कर पान वाले से पूछता है तुरकारी पारा में मंजूर भाई का घर किधर है । पान लगाते- लगाते कहता है पान वाला रुको मैं किसी को साथ करता हूँ, वह पुकारता है एक नाम ''भैया घर जावथो का जरा इनला मंजूर भाई के घर देखाना रहिस हे '' यह  खैरागढ़  का चरित्र है, भैया जाते हैं और अपरचित को घर तक छोड़ आते हैं।

 

हाफ चाय लेकिन डबल पान एक और पहचान। राजनांदगाँव में एक बार साथ गए मित्र ने पान लेने के बाद दुबारा सुपारी मागी तो पान वाला कहता है "खैरागढ़  से आए हो क्या ।" बहुत बड़ी-बड़ी पहचान के साथ-साथ ऐसी छोटी-छोटी पहचान भी महत्वपूर्ण ढंग से खैरागढ़ के चरित्र में शामिल ह

           

 

तब का खैरागढ़ और आज का  खैरागढ़, कोई तुलना नहीं। सचमुच इलेक्ट्रॉनिक ने दे-दुनिया को एक जैसे बना दिया है सब ओर एक जैसी तरक्की । खैरागढ़  भी इसके लिए सीना ताने तैयार खड़ा है पर अपने मूल चरित्र का झंडा लिए हुए। कोई काम धंधे से बाहर चला भी जाता है अपने साथ साथ यहाँ की यादें जरुर रखता है यानी थोड़ा खैरागढ़। आज हर हाथ में मोबा, हर घर में टीवी है एक समय था जब खैरागढ़ में सबसे पहले दो रेडियो लाए गए एक तो राज महल में और दूसरा बैन लाल बख्शी के यहाँ । सेकंड वर्ल्ड वार का तब न्यूज़ आया करता था रेडियो में । न्यूज़ के समय में घर के सामने भीड़ लगती, सामने लाकर रेडियो रखा जाता और लोग देखते विज्ञान के इस चमत्कार को, सुनते दुनिया की सबसे बड़ी खबर । घर में एक परछी का नाम रेडियो वाली परछी है। बचपन में पूछने पर दादी ने यह पूरी कहानी विस्तार से बताती थी कि इसका नाम रेडियो वाली परछी क्यों पड़ा ।  बैनलाल बख्शी इस पूरे क्षेत्र के पहले एल एल बी थे और इस कारण उन्हें राजरत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया । कहि देबे संदेश पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म में प्रमुख रोल में रमाकांत बख्शी थे वे बैनलाल बख्शी के पुत्र थे और मेरे पिता ।

 

दाउचौरा में एक खैरागढ़ रहता है यह इसलिए क्योंकि बिना वहाँ गए  खैरागढ़  की यात्रा पूरी नहीं होती कम से कम उसकी तो बिलकुल भी नहीं जो साहित्य के लिए इमानदारी से कुछ कर रहा है यहाँ रमाकांत श्रीवास्तव, गोरेलाल चंदेल, जीवन यदु राही रहते हैं।

 

दंतेश्वरी माई जी की मंदिर, शिव मंदिर, रुक्खड़ स्वामी का मंदिर, बम्बई बाज का मंदिर श्रध्दा के केंद्र में हैं सुबह मुँह अंधेरे भजन गाते जब निकलती है एक टोली और शहर के बीचोंबीच स्थित मस्जिद से अजान की आवाज आती है तो सचमुच एक नए दिन के शुरूआत की अनुभूति होती है । रुक्खड़ स्वामी के मंदिर की चर्चा करते हुए उसके बारे में उससे संबंधित थोड़ी जानकारी देना जरूरी है यह राज फेमली के एरिया में स्थित है यहाँ अखंड धुनी आज भी जल रही है कहते हैं इस स्थान पर बरसों पहले एक संत आकर कुछ दिन से रूके थे राजा साहब उनसे मिलना चाहते थे खबर आई तब संत बुखार की हालत में थे, उन्होने अपनी बुखार एक कम्बल को दे दी वह कम्बल काँपने लगा, संत जी राजा से मिल कर आए और जब वे खैरागढ़ से जाने लगे तो जहाँ रूके थे उस स्थान में एक चिमटी भभूत रख कर गए । यही भभूत अपने आप धीरे धीरे बढ़ता हुआ पूरे कमरे में फैल गया है एक समिति इसकी देखरेख करती है ।

 

खैरागढ़ की बसाहट की यह खासियत है कि सोनार पारा, बरेठपारा, कुम्हार पारा, सिविल लाइंस, राजफेमली यह अलग अलग बसाहट में है बीचोबीच गोल बाजार है जहाँ प्रति दिन का बाजार भरता है । इतवारी बाजार में केवल इतवार को बाजार भरता है इस दिन  काफी भीड़ आती है आसपास के गाँवों से । दशहरा पर्व काफी उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है। पहले राजा साहब की बड़ी लम्बी, गरिमामयी सवारी निकलती थी पहले मशाल लिए लोगों की जुलुस, फिर हाथी सजेधजे, उसके पीछे पुलिस बैंड, घोड़ों की कतार और तब राजा साहब की सवारी । उत्साह अब भी बरकरार है, काफी जोर-शोर के साथ दशहरा  मनाया जाता है ।

 

खैरागढ़ को सीताफल खेड़ा भाजी, चेज भाजी आदि  के लिए लोग दूर दूर तक जानते हैं मटिया का नाम मुझे याद है जो सीताफल खेड़ा भाजी आदि लेकर घर घर जाती थी खरीद-बिक्री के बाद पास के दीवार पर लाल भाजी से निशान बना देती इन्हें देखकर लगता कि ये सिर्फ हिसाब के निशान नहीं बल्कि ये विश्वास और ईमानदारी के निशान थे। काफी पहले यहाँ खैर का जंगल हुआ करता था जिससे खैरागढ़  का नामकरण हुआ पर आज कहीं एक भी खैर का वृक्ष नहीं है। यहाँ काफी पहले से बिजली, नल की व्यवस्था है आसपास के स्टेट में यह व्यवस्था बहुत बाद में हुई।          

 

खैरागढ़ के बारे में इतना कुछ लिखते यह महसूस हो रहा है कि सिर्फ प्रस्तावना ही लिखा गया है काफी कुछ लिखा जाना है । अभी और बिलकुल अभी का खैरागढ़ जो कि और भी महत्वपूर्ण है निखरा हुआ चरित्र के साथ उसके बारे में लिखा जाना बचा है । बचा हुआ है बहुत कुछ मास्टर जी पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी  के बारे में लिखा जाना जिनका यह जन्म स्थली है। बख्शी भवन जहाँ सूर्यकांत बख्शी बड़े भैया निवास करते हैं उससे लगे हुए मकान में उनका जन्म हुआ था यह अवश्य ही एक संरक्षित स्थान के रूप में विकसित होगा और देश के नक्षे में चिन्हित किया जाएगा। यही वह स्थान है जहाँ छह सात पीढ़ी पहले की बात है कहते हैं यहाँ काँवरिया के रूप धर कर श्री कृष्ण आए थे

     

बहरहाल अपनी जेब में एक अलग पहचान रखने वाला खैरागढ़ आज के आपाधापी के समय में संगीतमय, अपनत्व सादगी जैसे कठिन चरित्र को अपना मूल स्वभाव बनाया हुआ है यह अपने आप में महत्वपूर्ण है ।

 

संजीव बख्शी

न्यू पंचशील नगर, रायपुर

छत्तीसगढ़

 

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