प्रवासी रचनाकार
बचपन के दिनःयाद आयें पलछिन
आदित्य प्रकाश सिंह
सब मिल गइल
आज से कोई ३० वर्ष पहले की बात है । अभी-अभी पटना
स्टेशन पर एक वृद्ध महिला हाथ में छोटा-सा
सूटकेस लेकर उतरी थी।
उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे, पर चेहरे पर
एक पवित्र तृप्ति साफ-साफ झलक रही थी। स्टेशन पर कुली
बन्धु
तुरंत
भाँप गए कि हो ना हो, यह महिला वर्षों बाद विदेश से
आयी है । कुछ पूछ ही बैठे
–
“माँ
जी,
कहाँ
जाना है?”
महिला भावावेश में कुछ कह नहीं पा रही थी । स्टेशन पर
भीड़ बढ़ती जा रही थी । भीड़ की खुसफुसाहट कुछ पूछ रही
थी और
अन्ततः महिला बोल ही पड़ी: "आज चालीस वर्ष बाद गंगा माई
के दर्शन होई।”
पता चला बालिका वधू बन चालीस वर्ष पहले मॉरिशस चली गयीं थीं, छूट गया था परिवार, गाँव, और देश पर माथे पर कुमकुम सिन्दूर और मन में गंगा मईया को बिठा कर चल पड़ी थी पिया के संग। अखबार वाले भी अपनी कलम-कागज़ लेकर पहुँच गए उसके पास । जिज्ञासु पत्रकारों के पास सैकड़ों प्रश्न थे पर एक ही जवाब था, "सब मिल गइल।" जीवन में बस बची थी तो एक ही प्यास - मरने से पहले क्या देख पाऊँगीं गंगा मईया को फिर एक बार......खुशी के मारे फूट-फूट कर रो रही थी वह। आखिर पहुँच जो गयी थी अपने चिर संचित स्थान - पटना का गंगा घाट।
इस
घटना ने मुझे अपनी संस्कॄति एवं
अतीत के धरोहरों को पुनः जानने एवं समझने का एक दर्शन
दिया ।
सचमुच गंगा-दर्शन,
गंगा-स्नान भावों से भरा है और मन में उठते दिव्य भाव
गंगा को तीर्थ बना देते हैं।
अनायास दिनकर की पंक्तियाँ याद आती हैं-
"भारत एक स्वप्न भू को ऊपर ले जानेवाला,
भारत एक विचार, स्वर्ग को भू पर लानेवाला,
भारत एक भाव जिसको पाकर मनुष्य जगता है,
मानचित्र में जो मिलता है, नहीं देश भारत है,
भू पर नहीं, मनों में ही, बस, कहीं शेष भारत है।"
‘बाढ़’
के दो रूप
बचपन के दिन स्मृति से गायब होना ही नहीं चाहते । कितने अमूल्य थे वे दिन जो पिताजी ने संस्कार बाँटे थे । हम लोग पटना शहर से करीब ४० मील दूर "बाढ़" शहर में रह रहे थे। बाढ़ पटना ज़िला का एक अनुमण्डल था । वह उन दिनों दो बातों के लिए चर्चित था – पहला तो यह कि वहाँ उत्तरायण गंगा बहती (जैसी काशी में है), दूसरी अंग्रेज़ों के समय में एक महिला अपने पति की चिता पर कूद कर सती हो गई थी। उसके परिवार पर अदालती कार्यवाही हुई हो गई पर निर्णय आया परिवार वालों के हित में । और महिला के तरफ से अँगरेज़ों के विरुद्ध केस लड़ने आये थे पंडित मोती लाल नहरू जी(जवाहर लाल नेहरू के पिता) ।
बाढ़ शहर के शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक विकास में मेरे पिताजी स्व.सूरज प्रसाद सिंह ने काफी सक्रिय भूमिका निभाई। १९५१ में दो विद्यार्थी एवं दो कमरे से कॉलेज की स्थापना की और उसी कॉलेज में आज हर विषय की स्नातकोत्तर की पढ़ाई हो रही है।
बालकः बालकौः बालकाः....
पिताजी का देश एवं संस्कृति प्रेम जग ज़ाहिर था । वे सदैव गाँव की शिक्षा, कला, साहित्य और सांस्कृतिक उत्थान के लिए सक्रिय रहते । आये दिन वे इन कार्यों में आसपास के गाँवों में आया जाया करते थे ।
धर्म क्षेत्रे- कुरु क्षेत्रे,
समवेता युयुत्सवः
मामका पाण्डवाश्चैव, किमकुवर्त संजयः।।
इन्ही शब्दों के साथ हमारी सुबह शुरु होती थी,
गीता पाठ,
स्नान आदि के बाद उनके साथ हमलोग योगासन करते,
तब फलहार-दूध और फिर विद्यालय की ओर
चल पड़ते ।
शाम पिताजी जब कॉलेज से लौटते तो चाय अवश्य पीते और
उसी समय हम लोगों
को बुलाते और शुरु हो जाता हम लोगों का पाठ । किसी से
पूछ बैठते चलो बालकः शब्द रुप
वदः,
और हम भी शुरु हो जाते - बालकः बालकौः
बालकाः....पिताजी हिन्दी के प्राध्यापक रह
चुके थे पर वे हमेशा हमें संस्कृत पढ़ाते और कहते कि
संस्कृत सभी भाषाओं
की जननी है अतः शुद्ध रूप से पहले संस्कृत भाषा का
ज्ञान प्रताप करो । संस्कृत ही
हमारी संस्कृति का ज्ञान कराती है।
प्रारंभिक कक्षाओं के दरमियान ही में हम
संस्कृत बोलना सीख गये थे। पिता जी सही उच्चारण पर
काफी ज़ोर देते थे ताकि शब्दों का अशुद्ध
उच्चारण ना हो। पिताजी के साथ संस्कृत के विद्वान पं
कपिल देव शर्माजी का भी
सानिध्य था। पिताजी उन दिनों कपिल देव शर्माजी के साथ
संस्कृत भाषा के उत्थान हेतु
जगह-जगह व्याख्यान देने जाते। पिताजी अच्छे वक्ता थे
और उनके भाषणों में
रामायण या महाभारत से बातें अवश्य उद्धृत होती थीं।
संस्कृत और हिंदी के विद्वान होने के बावजूद उन्हें
अपनी मातृभाषा या लोकभाषा से कोई परहेज नहीं था ।
सच्ची मिट्टी से जो रचे-बुने गये थे । वे जब भी किसी
बड़ी जन सभा को
सम्बोधित करते तो यही कहते
–
"का कहीं कुछ कहाते नईखे,
कहला बिना रहाते नईखे...."
किशन
महराज का तबला और सितारा देवी का नृत्य
मेरे पिताजी संगीत के समर्पित रसिक थे । बताते थे - शुरू से ही उन्हें शास्त्रीय संगीत से प्रेम रहा। भारत के प्रसिद्ध तबला वादक पं किशन महाराज एवं कत्थक नर्तकी "सितारा देवी" का कार्यक्रम पिताजी के कारण बाढ जैसे छोटे शहर में लोगों ने कई बार देखा। किशन महाराज पिताजी के अंतरंग मित्र हो गये थे। किशन महाराज एवं सितारा देवी हमारे घर में ठहरा करते थे । रात में कभी-कभी किशन महाराज हमारे घर के बड़े कमरे में ही तबले का अभ्यास शुरु कर देते और उनका साथ देतीं नृत्य पर सितारा देवी। कभी-कभी तो रात सुबह की आँचल में सिमटने लगती पर दोनों इतने मगन हो जाते कि सोने का नाम तक नहीं लेते । क्या इसे भूलाया जा सकता है ! जब भी उन दिनों का तबला-नृत्य का अद्भुत प्रदर्शन याद करता हूँ एक अलग अनुभव से भर उठता हूँ । जैसे कड़क घाम वाले दोपहर में सघन बरगद की छाँव में जा पहुँचा होऊँ ।
पिताजी का भारतीय संस्कृति प्रेम प्रायः विलक्षण
प्रतिभाओं को बरबस हमारे
घर खींच लाता था । कभी-कभी छुट्टियों के दिन बिताने
वाई. जी. कृष्णामूर्ति जी आया
करते । वे घंटों सूर्य-त्राटक किया करते थे,
लगातार सूर्य को देखने की विशेष योग-विधि
के कारण कृष्णामूर्ति जी अखबारों कि सुर्खियों में
रहते। कृष्णामूर्ति जी ने नेपाल
सरकार के आमंत्रण पर स्व. राजा महेंद्र पर बड़ी अच्छी
पुस्तक लिखी थी, जो आज भी नेपाल
के हर अच्छे पुस्तकालयों में उपलब्ध है।
नेपाली
काका, कविता सुनाओ ना !
याद आते हैं१९६२ के वे दिन जब भारत-चीन युद्ध चल रहा था और इसी के साथ कानों में गूँजने लगती है – देश-प्रेम कविता की चंद पंक्तियाँ - "४० करोड़ों को हिमालय ने पुकारा है... जब कभी इन पंक्तियों को गुनगुनाता हूँ तो नसों में रक्त तेज गति से बहने लगता है ।
यह पंक्तियाँ स्व. गोपाल सिंह नेपाली जी की हैं,
जो हमारे घर कभी-कभी ठहरा करते थे । बड़े ही सीधे एवं
सरल स्वभाव का व्यक्तित्व था उनका । ना कोई बनावटीपन
ना कोई दिखावा । सच-मुच गंगा-यमुना के निर्मल पानी की
तरह । आज जब हम हिंदी के कवियों को देखते हैं तो लगता
है कितना कुछ बदल चुका है कवि के कृतित्व और उसके
व्यक्तित्व में । कहीं कोई साम्यता नहीं । कथनी कुछ और
करनी कुछ । कविता कर्म जैसे फैशन हो, कोई साधना नहीं।
जाने कहाँ ले जायेगा यह उत्तरआधुनिकता को दौर । यह
दोहरा चरित्र । मैं बड़े ही विनम्रता से कहना चाहूँगा
कि उन दिनों नेपालीजी की आर्थिक स्थिति
ठीक नहीं चल रही थी । पर थे बड़े ही स्वाभिमानी । पर
उनका यह स्वाभिमानीपन साहित्य और कविता के मार्ग में
आड़े नहीं आती थी । वे पिताजी से पुस्तक प्रचार हेतु
निःसंकोच मदद की बात करते और पिताजी भी दिल खोलकर उनका
साथ देते । ऐसे पिता जी के चेहरे पर अजीब सा आत्मतोष
नज़र आता था । वे बड़े ही खुश दिखाई देते । मानों गंगा
नहा लिये हों । हमलोग उस
समय बहुत छोटे बच्चे थे फिर भी सुबह नेपालीजी को चाय
पीते समय अवश्य घेर लेते और
आखिरकार नेपालीजी हम बच्चों क मन रख लेते और गा कर
सुनाते-
"
चलो भाई
बॉमडिल
मुर्गे को दाना दे..."
बाद में पता चला एक ही वर्ष बाद १९६३ में
नेपालीजी नहीं रहे
।
नियति भी सचमुच ना जाने क्या-क्या रहस्य बुनती और
खोलती है?
नेपाली जी को याद करके आज भी मन वीर भाव से ओतप्रोत हो
उठता है । मुझे अच्छी तरह याद है- ४०
वर्ष बाद जब हज़ारों मील दूर अमेरिका के रेडियो स्टेशन
पर,
पहली कविता जो मैंने गा
कर सुनाई,
वह नेपालीजी की ही थी-
"यह लघु सरिता का बहता जल,
कितना शीतल कितना निर्मल,
कर-कर निनाद, कल-कल छल-छल...."
आदित्य
प्रकाश सिंह
डैलस, अमेरिका
