कितना गहरा खोदेंगे हम?
अरुंधती रॉय
अभी
हाल ही में एक युवा कश्मीरी मित्र से मेरी बात हो रही
थी कश्मीर में जीवन के
बारे में। राजनीतिक बिकाऊपन और अवसरवादिता के बारे में,
सुरक्षा बलों की असंवेदनशील
क्रूरता,
हिंसा से सरोबार समाज की रिसती पनपती सीमाओं के बारे
में,
जहाँ हथियारबंद
कट्टरपंथी,
पुलिस,
गुप्तचर सेवाओं के अधिकारी,
सरकारी अफ़सर,
व्यापारी,
यहाँ तक कि
पत्रकार भी एक दूसरे का सामना करते हैं और धीरे-धीरे,
समय के साथ,
एक दूसरे जैसे बन
जाते हैं। उसने बात की अंतहीन हत्याओं के बारे में,
'खो
चुके'
लोगों की बढ़ती हुई
संख्या के बारे में,
कानाफूसी के बारे में,
उन अफ़वाहों के बारे में जिनका कोई जवाब
नहीं देता,
किसी भी तरह के संबंध की उस विक्षिप्त अनुपस्थिति के
बारे में जो होना
चाहिए उस सबके बीच जो असल में कश्मीर में हो रहा है,
जो कश्मीरी जानते हैं कि हो
रहा है और जो हम बाकी लोगों को बताया जा रहा है कि हो
रहा है। उसने कहा कि "कश्मीर
पहले व्यापार हुआ करता था। अब यह पागलखाना बन गया है।"
उस टिप्पणी के बारे में मैं जितना ही सोचती हूँ, उतना ही मुझे वो पूरे भारत के बारे में उपयुक्त लगती है। हाँ, शायद कश्मीर और उत्तर-पूर्व उस इमारत के अलग हिस्से हैं जिनमें पागलखाने के ज़्यादा खतरनाक वार्ड स्थित हैं। लेकिन प्रमुख भू-भाग में भी ज्ञान और सूचना के बीच, जो हम जानते हैं और जो हमें बताया जाता है उसके बीच, जो छिपाया जाता है और जो दिखाया जाता है उसके बीच, तथ्य और अनुमान के बीच, 'असली' और असल-दिखती दुनिया के बीच की खाई अंतहीन अटकलबाज़ी और संभावित विक्षिप्तता की जगह बन गई है। यह एक ऐसा ज़हरीला मिश्रण है जिसे घोला जाता है और पकाया जाता है और एकदम भद्दे, विनाशकारी, राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
हर बार जब कोई कथित 'आतंकवादी हमला' होता है, सरकार हाज़िर हो जाती है दोष मढ़ने के लिए, बिना किसी या नाम-मात्र की जाँच-पड़ताल के। गोधड़ा में साबरमती ऐक्सप्रेस का जलाया जाना, 13 दिसंबर को संसद भवन पर आक्रमण, या चित्तीसिंहपुरा में सिखों का क़त्ले-आम तो इनमें से सिर्फ़ कुछ प्रसिद्ध उदाहरण हैं। (जो लोग कथित आतंकवादी घटना के बाद सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए थे, पता चला कि वे निर्दोष ग्रामीण थे। राज्य सरकार ने बाद में माना कि डी. एन. ए. जाँच के लिए भेजे गए नमूने फर्जी थे) इनमें से हर मामले में बाद में सामने आने वाले सबूतों ने बहुत परेशान करने वाले सवाल खड़े कर दिए और इसलिए उन्हें तुरंत कबाड़खाने में डाल दिया गया। गोधड़ा का ही मामला लीजिए: जैसे ही यह घटना हुई, गृह मंत्री ने घोषणा कर दी कि यह आई. एस. आई. का षड़यंत्र था। वी. एच. पी. का कहना है कि ये मुसलमानों की भीड़ का काम था जो पेट्रोल बम फेंक रहे थे। कई गंभीर प्रश्न हैं जिनके जवाब नहीं मिलते। अंतहीन अटकलबाज़ी है। हर कोई वही मान रहा है जो वह मानना चाहता है, लेकिन सच-झूठ की परवाह किए बगैर योजनाबद्ध तरीके से इस घटना का इस्तेमाल सांप्रदायिक उन्माद भड़काने के लिए किया जा रहा है।
अमरीकी सरकार ने 11 सितंबर से उपजे झूठों और विकृत सूचनाओं का इस्तेमाल एक नहीं बल्कि दो देशों पर आक्रमण करने के लिए किया - कौन जाने आगे क्या किया जाने वाला है। भारतीय सरकार भी इसी रणनीति का प्रयोग करती है, लेकिन अपने ही लोगों के विरुद्ध। पिछले दशक के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए लोगों की संख्या हज़ारों में है। अभी हाल ही में मुम्बई पुलिस के कई प्रवक्ताओं ने खुले आम प्रेस को बताया कि किस तरह उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के 'आदेशों' पर कई 'गैंग्सटरों' को खत्म कर दिया। आंध्र प्रदेश प्रतिवर्ष करीब 200 'अतिवादियों' की 'मुठभेड़' में मौतों का औसत काट लेता है। कश्मीर में जहाँ हालत लगभग युद्ध जैसी है, अनुमानतः 80,000 लोग 1989 से अब तक मारे जा चुके हैं। हज़ारों तो एकदम 'गायब' हो गए हैं। असोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स ऑफ़ डिसअपिअर्ड पीपुल (ए. पी. डी. पी.) के रिकॉर्डों के अनुसार 2003 में कश्मीर में 3000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से 463 सैनिक थे। ए. पी. डी. पी. का कहना है कि अक्तूबर 2002 में 'हीलिंग टच' लाने के वादे पर मुफ़्ती मुहम्मद सईद सरकार के सत्ता में आने के बाद से 54 लोगों की हिरासत में मौतें हो चुकी हैं। धुआँधार राष्ट्रवाद के इस युग में मारे गए लोगों पर गैंग्सटर, आतंकवादी, उपद्रवी या अतिवादी होने का आरोप लगा देना काफ़ी है, और उनके हत्यारे शान से राष्ट्रीय हित के रक्षक बन कर घूम सकते हैं, बिना किसी जवाबदेही के। अगर यह सच भी हो (जो कि यह निश्चित ही नहीं है) कि मारा गया हर आदमी वास्तव में गैंग्सटर, आतंकवादी, उपद्रवी या अतिवादी था - तो भी हमें यही पता चलता है कि ऐसे समाज में कुछ बुरी तरह ग़लत है जो इतने सारे लोगों से इस तरह के हताशापूर्ण कदम उठवाता है।
अपने ही देश के लोगों को परेशान और आतंकित करने की भारतीय राज्य की प्रवृत्ति को आतंकवाद रोधक कानून (पोटा) बना कर संस्थाबद्ध और पवित्रीकृत कर दिया गया है। इसे 10 राज्यों में लागू भी कर दिया गया है। पोटा को सरसरी तौर पर पढ़ने से ही आप समझ सकते हैं कि यह लगभग नादिरशाही है और सब कुछ समेट लेने वाला है। यह सर्वतोमुखी कानून है जो किसी पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है - विस्फोटों के जखीरे के साथ पकड़े गए अल क़ायदा सदस्य से लेकर नीम के पेड़ के नीचे बाँसुरी बजा रहे आदिवासी पर, आप पर या मुझ पर। पोटा की बौद्धिक खासियत यह है कि इसे सरकार जो चाहे बना सकती है। हम उनकी कृपा पर जीते हैं, जो हम पर राज करते हैं। तमिलनाडु में इसका प्रयोग सरकार की आलोचना को दबाने के लिए किया गया है। झारखंड में 3,200 लोगों, जिनमें अधिकतर माओवादी करार दिए गए गरीब आदिवासी हैं, का नाम पोटा के अंतर्गत एफ़. आई. आर. में दर्ज किया गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस कानून का उपयोग उन लोगों को कुचलने के लिए किया जा रहा है जो ज़मीन और रोज़गार के अपने अधिकारों के लिए विरोध प्रदर्शन करने की हिम्मत कर रहे हैं। गुजरात और मुम्बई में इसका इस्तेमाल सिर्फ मुसलमानों के विरुद्ध किया जा रहा है। गुजरात में 2002 के राज्य प्रायोजित सामूहिक हत्याकांड, जिसमें करीब 2000 मुसलमानों की हत्या की गई थी और 150,000 को बेघर कर दिया गया था, 287 लोगों पर पोटा के अंतर्गत आरोप लगाए गए हैं। इनमें से 286 मुसलमान हैं और एक सिख है! पोटा के अंतर्गत पुलिस हिरासत में लिए गए इकबालिया बयानों को न्यायिक प्रमाण माना जाएगा। प्रभावी तौर पर इसका मतलब है पुलिस की जाँच पड़ताल की जगह पुलिस की यातना ले लेगी। यह तरीका जल्दी और यकीनी परिणाम देनेवाला है। सरकारी खर्चे को कम करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है।
पिछले महीने मैं पोटा पर एक जन न्यायाधिकरण की सदस्य थी। दो दिन तक हमने अपने अद्भुत जनतंत्र में जो कुछ होता है उसके बारे में बयान सुने। मुझे आपको विश्वास दिलाना पड़ेगा कि हमारे पुलिस स्टेशनों में इसका मतलब है सब कुछ - लोगों को ज़बरदस्ती पेशाब पिलाए जाने से लेकर उन्हें निर्वस्त्र किया जाना, अपमानित किया जाना, बिजली के झटके दिए जाना, सिगरेट के टुकड़ों से जलाया जाना, उनके गुदा में लोहे की छड़ें घुसाए जाना और लातों से इस हद तक पीटा जाना कि मौत हो जाए।
देश में जगह-जगह सैकड़ों लोगों को, जिनमें बहुत छोटे बच्चे भी शामिल है, को पोटा के अंतर्गत क़ैद किया गया है और बिना ज़मानत के क़ैद रखा जा रहा है, उन पोटा न्यायालयों में मुकद्दमा चलाए जाने के इंतज़ार में जो सार्वजनिक निरीक्षण के लिए खुले नहीं हैं। पोटा के अंतर्गत जिन पर मामले दर्ज किए गए हैं उनमें से अधिकतर दो में से एक अपराध के दोषी हैं। या तो वे गरीब हैं - ज़्यादातर दलित और आदिवासी। या फिर वे मुसलमान हैं। पोटा ने आपराधिक कानून की सर्वसम्मत उक्ति को उलट कर रख दिया है - कि कोई व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक उसे दोषी साबित नहीं कर दिया जाता। पोटा के अंतर्गत आपको तब तक ज़मानत नहीं मिल सकती जब तक आप खुद को निर्दोष नहीं साबित कर देते - एक ऐसे अपराध का जिसका आप पर औपचारिक रूप से आरोप भी नहीं लगाया गया है। असल में इसका मतलब है कि आपको साबित करना है कि आप निर्दोष हैं चाहे आप यह भी न जानते हों कि आपको किस अपराध का दोषी माना गया है। और यह हम सभी पर लागू होता है। तकनीकी तौर पर हम एक देश हैं जो कभी भी आरोपित किया जा सकता है। यह समझना नादानी होगी कि पोटा का 'दुरुपयोग' किया जा रहा है। सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। इसे ठीक उन्हीं उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनके लिए इसे बनाया गया था। वैसे यह सही है कि अगर मलीमत समिति की सिफारिशें मान ली जाती हैं तो पोटा जल्दी ही अनावश्यक हो जाएगा। मलीमत समिति की सिफारिश है कि कुछ मायनों में सामान्य कानून को पोटा के प्रावधानों के अनुरूप ढाला जा सकता है। ऐसा होने पर कोई अपराधी नहीं होगा। सभी आतंकवादी होंगे। बड़ी साफ-सुथरी बात है।
आज जम्मू और कश्मीर में तथा कई उत्तर पूर्वी राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (ए. एफ़. एस. पी. ए.) सेना के न सिर्फ अफसरों बल्कि जूनियर कमीशंड और नॉन-कमीशंड अफसरों को भी यह अधिकार दिए हुए है कि वो शांति भंग करने या हथियार रखने के शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति पर ताकत का प्रयोग (जान लेने तक) कर सकते हैं। शक के आधार पर! भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को भ्रम नहीं हो सकता कि इसके माने क्या हैं। यातना दिए जाने, गायब कर दिए जाने, हिरासती मौतों, बलात्कारों और सामूहिक बलात्कारों (सुरक्षा बलों द्वारा) के दस्तावेज़ आपका खून बर्फ कर देने के लिए काफी हैं। इस सबके बावजूद अगर भारत की अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और अपने ही मध्य वर्ग में एक वैध जनतंत्र होने की साख बनी हुई है तो यह एक शानदार सफलता है।
सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून उस अधिनियम का ही एक अधिक कड़ा रूप है जिसे लॉर्ड लिनलिथगो ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से निपटने के लिए लागू किया था। 1958 में इसे मणिपुर के उन क्षेत्रों में लागू किया गया जिन्हें 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया गया था। 1965 में पूरे मिज़ोरम को, जो तब असम का ही भाग था, 'अशांत क्षेत्र' घोषित कर दिया गया। 1972 में अधिनियम को त्रिपुरा तक लागू कर दिया गया। 1980 तक आते-आते पूरे मणिपुर को 'अशांत क्षेत्र' घोषित कर दिया गया था। कोई इससे ज़्यादा क्या प्रमाण चाहता है यह मानने के लिए कि दमनकारी कदमों का उल्टा असर होता है और उनसे समस्या बढ़ती ही है।
जनता का दमन करने और उनकी जान लेने की इस अशोभनीय आतुरता के दूसरी तरफ है उन मामलों में जाँच करने और मुकद्दमा चलाने की भारतीय राज्य की अनिच्छा, जो किसी से छिपी नहीं है, जिनमें सबूतों की कोई कमी नहीं है - 1984 में दिल्ली में 3000 सिखों की हत्याएँ; 1993 में मुंबई में और 2002 में गुजरात में मुसलमानों की हत्याएँ (एक भी मामले में किसी को सज़ा नहीं मिली!); कुछ साल पहले जे. एन. यू. विद्यार्थी संघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर की हत्या; बारह साल पहले छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे के शंकर गुहा नियोगी की हत्या अादि तो कुछ ही उदाहरण हैं। चश्मदीद गवाहों के बयान और दोष साबित करने वाले ढेर सारे प्रमाण भी काफी नहीं होते जब राज्य का पूरा ताम-झाम आपके विरुद्ध डटा हुआ हो।
इसी बीच निगमी अखबारों से अर्थशास्त्री जयघोष करते हुए हमें बता रहे हैं कि जी. डी. पी. वृद्धि दर असाधारण है, अपूर्व है। दुकानें उपभोग की सामग्री से भरी पड़ी हैं। सरकारी गोदाम अनाज रखने के लिए कम पड़ रहे हैं। इस प्रकाश चक्र के बाहर, कर्ज़ में डूबे हुए किसान सैकड़ों में आत्महत्या कर रहे हैं। भुखमरी और कुपोषण की खबरें देश भर से आ रही हैं। फिर भी सरकार ने 6.3 करोड़ टन अनाज को गोदामों में सड़ने के लिए छोड़ रखा है। 1.2 करोड़ टन अनाज को ऐसी रियायती दरों पर निर्यात किया गया जिन पर सरकार भारत के गरीबों को अनाज बेचने के लिए तैयार नहीं थी। प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री उत्स पटनायक ने पिछले लगभग सौ वर्षों के सरकारी आँकड़ों के आधार पर भारत में अनाज की उपलब्धता और उपभोग की गणना की है। उनकी गणना के अनुसार नब्बे के दशक की शुरुआत से लेकर 2001 के बीच अनाज का उपभोग दूसरे विश्व युद्ध के स्तरों, जिनमें बंगाल का वह अकाल भी शामिल है जिसमें 30 लाख लोग भूख से मारे गए थे, से भी नीचे गिर गया है। जैसा कि हम प्रोफेसर अमार्त्य सेन के काम से जानते हैं, जनतंत्रों में भुखमरी से हुई मौतों को आसानी से सहन नहीं किया जाता। उनके बारे में 'मुक्त प्रेस' बहुत प्रचार कर देती है।
इसलिए कुपोषण के खतरनाक स्तर और स्थाई भूख बेहतर विकल्प हैं। तीन साल से कम उम्र के 47% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, 46% का शारीरिक विकास अवरुद्ध है। उत्स पटनायक का ही अध्ययन बताता है कि भारत की लगभग 40% ग्रामीण जनसंख्या का अनाज उपभोग अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र के स्तरों पर है। आज एक औसत ग्रामीण परिवार 1990 की तुलना में प्रतिवर्ष लगभग 100 किग्रा खाना कम खा रहा है। पिछले पाँच सालों में शहरी-ग्रामीण आय की विषमता में जितनी भयंकर वृद्धि हुई है, उतनी तो स्वतंत्रता के बाद कभी नहीं हुई। लेकिन शहरी भारत में आप जहाँ भी जाएँ, दुकानें, रेस्तराँ, रेल्वे स्टेशन, हवाई अड्डे, जिम्नेज़ियम, अस्पताल, सब जगब आप को टी. वी. मॉनिटर दिखेंगे जिनमें चुनावी आश्वासन पूरे किए भी जा चुके हैं। भारत चमचमा रहा है, आनंद में है। आपको बस इतना करना है कि किसी की पसलियों को कुचलते हुए पुलि
