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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   प्रसंगवश

   

सलमान रुश्दी 'सर' तो बिन लाडेन 'सैफुल्लाह'


तनवीर जाफ़री

 

      भारतीय मूल के विवादित लेखक सलमान रुश्दी एक बार फिर चर्चा का विषय बने हुए हैं। परन्तु इस बार रुश्दी के सुर्खियों में रहने का कारण रुश्दी द्वारा लिखी कोई पुस्तक नहीं बल्कि ब्रिटेन द्वारा उन्हें दिया गया प्रतिष्ठित 'नाईटहुड' सम्मान है। विभाजन से पूर्व भारत में अति लोकप्रिय समझे जाने वाले इस सम्मान को जहाँ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कुछ उच्चकोटि के शिक्षाविदों तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों को दिया जाता था वहीं बर्तानवी हुकूमत यही सम्मान अपने विशिष्ट कृपा पात्रों को भी देती रही है। सर सैय्यद अहमद खां, अल्लामा इकबाल तथा अल्लामा मशरिकी जैसे महान शिक्षाविद इस सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। इनके अतिरिक्त भी भारत व पाकिस्तान में तमाम ऐसे नाम मिल सकते हैं जिन्हें नाईटहुड का सम्मान देकर 'सर' की उपाधि से सुशोभित किया जा चुका है। गत् दिनों 60 वर्षीय सलमान रुश्दी सहित 950 व्यक्तियों को ब्रिटेन की महारानी एलिंजाबेथ द्वित्तीय के जन्मदिन के अवसर पर 'नाईटहुड' अर्थात् 'सर' की उपाधि से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।

 

              सलमान रुश्दी को नाईटहुड का सम्मान दिए जाने की ब्रिटिश सरकार की घोषणा के बाद मुस्लिम जगत में एक स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया होनी शुरु हो गई है। पाकिस्तान व ईरान जैसे देशों ने सरकारी व आधिकारिक रूप से सलमान रुश्दी को यह सम्मान दिए जाने के विरोध में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। दुनिया के अनेकों देशों में इस विषय को लेकर ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया जा रहा है। याद रहे कि सलमान रुश्दी ने उस समय प्रसिद्धि के शिखर को छुआ था जबकि 1988 में उनका अतिविवादित उपन्यास सैटेनिक वर्सेंज (शैतानी आयात) प्रकाशित हुआ था। हालांकि इसके पूर्व सर्वप्रथम 1975 में उनका पहला उपन्यास 'ग्रिम्स' प्रकाशित हो चुका था परन्तु इस उपन्यास के प्रति पाठकों व साहित्यकारों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इसके पश्चात उनका दूसरा उपन्यास 'मिडनाईट्स चिल्ड्रन' प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने 1981 में रुश्दी को बुकर सम्मान दिलवा दिया। इसके पश्चात 1993 में सलमान रुश्दी को बुकर ऑफ बुकर्स नामक विशेष सम्मान से नवाजा गया। उनके उपन्यास को 25 वर्षों में बुकर पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासों में सर्वोत्तम माना गया था। परन्तु इसके पश्चात उनके द्वारा लिखित उनकी चौथी पुस्तक सैटेनिक वर्सेंज ने तो उन्हें शोहरत तथा विवादों के उत्कर्ष तक ही पहुँचा दिया।

 

              विवादित उपन्यास सैटेनिक वर्सेंज में सलमान रुश्दी ने गहन कल्पनाशीलता, दर्शन तथा घोर विडम्बनाओं के साथ खुदा और शैतान के मध्य संघर्ष को चित्रित किया है। इस विवादित पुस्तक में जिन पात्रों को दर्शाया गया है उनके नाम एवं चरित्र पैंगम्बर हजरत मोहम्मद व उनके परिवार के कुछ सदस्यों से मिलते जुलते हैं। सैटेनिक वर्सेंज को भारत सहित दुनिया के अनेकों देशों द्वारा इसी कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था कि इस पुस्तक में ईश निंदा की गई है तथा पैंगम्बर हजरत  मोहम्मद को अपमानित किया गया है। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद जहाँ पूरी दुनिया के मुसलमानों ने सलमान रुश्दी को अपनी नज़रों  से गिरा दिया था वहीं ईरान के सर्वोच्च अध्यात्मिक नेता आयतुल्ला खुमैनी ने 1989 में ही रुश्दी के विरुद्ध मौत का फतवा जारी कर दिया था। उसके पश्चात पूरे एक दशक अर्थात् 1999 तक रुश्दी सार्वजनिक जीवन से दूर स्कॉटलैंड यार्ड की उच्चकोटि की सुरक्षा के अन्तर्गत अज्ञातवास में रहे। हालांकि 1998 में ईरान सरकार ने यह घोषणा भी की थी कि अब ईरान सरकार सलमान रुश्दी के विरुद्ध जारी किए गए मौत के फ़तवे का समर्थन नहीं करती परन्तु इसके बावजूद कुछ इस्लामी विद्वानों का मत है कि आयतुल्ला खुमैनी द्वारा जारी किए गए फ़तवे को वापस लेने का अधिकार ईरान सरकार को नहीं है अत: रुश्दी के विरुद्ध मौत का फ़तवा पूर्ववत बरकरार है। बहरहाल आज के ऐसे संवेदनशील दौर में जबकि चारों ओर यह चर्चा आम है कि कहीं इस्लामी जगत व पश्चिमी देशों के मध्य सभ्यता एवं संस्कृति का अघोषित युद्ध तो नहीं छिड़ चुका है। यह जानना जरूरी हो गया है कि आखिर ब्रिटिश हुकूमत ने किन विशेषताओं के आधार पर सलमान रुश्दी को सर की उपाधि देने हेतु चुना जाना जरूरी समझा। क्या यह सच नहीं कि सलमान रुश्दी ने दुनिया के मुसलमानों को आहत करने वाली सैटेनिक वर्सेंज जैसी विवादित पुस्तक लिखकर मुस्लिम जगत को जो आघात पहुँचाया है, उसी सलमान रुश्दी को प्रतिष्ठित नाईटहुड सम्मान देकर एक बार फिर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दुनिया के मुसलमानों के ज़ख्मों को कुरेदने का प्रयास किया जा रहा है? क्या अपने धर्म, इतिहास परम्परा तथा सभ्यता आदि का विरोध करना ही ब्रिटिश हुकूमत की ऩजर में सबसे बड़ी योग्यता अथवा पात्रता रह गई है?

 

              सलमान रुश्दी को मिले इस ताजातरीन नाईटहुड सम्मान पर ईरान ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि 'ब्रिटेन द्वारा एक ऐसे व्यक्ति को सम्मानित किया गया है जिसकी गिनती इस्लाम जगत में सबसे नापसंद किए जाने वाले लोगों में होती है। यह बर्तानवी अधिकारियों के इस्लाम विरोधी रुख को दर्शाता है। ऐसे धर्मत्यागी को सम्मान देना ब्रितानी अधिकारियों को इस्लामी समाज के विरुद्ध लाकर खड़ा करता है' वास्तव में ब्रिटिश सरकार द्वारा सलमान रुश्दी को नाईटहुड देने के फैसले से यह जाहिर होता है कि इस्लामी भावनाओं को ठेस पहुँचाने की धारणाओं का पश्चिमी देश कितना समर्थन करते हैं। पाकिस्तान की संसद में भी इस सम्मान को लेकर निंदा प्रस्ताव पारित किया गया। पाक नेशनल असेम्बली में पारित किए गए प्रस्ताव में कहा गया है कि रुश्दी को सम्मानित करने से मुस्लिम भावनाएं आहत हुई हैं। इस सम्मान का विरोध करने वालों का मानना है कि ब्रिटिश सरकार के इस फैसले से यह जाहिर होता है कि वह इस्लामोफोबिया से किस कद्र ग्रस्त है। इस वर्ग का यह भी मानना है कि सलमान रुश्दी को इस प्रकार का सम्मान दिए जाने से पैगम्बर हजरत मोहम्मद की निंदा करने वालों को बल व प्रोत्साहन मिलेगा। पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया है कि सलमान रुश्दी को यह सम्मान दिए जाने से आत्मघाती हमले बढ़ने की आशंका है। पाक मंत्री के इस बयान ने तो ब्रिटिश हुकूमत के कान ही खड़े कर दिए हैं।

 

              जहाँ सलमान रुश्दी को नाईटहुड दिए जाने की चारों ओर निंदा की जा रही है वहीं तालिबानी विचारधारा के पोषक कट्टरपंथी इस्लामी शक्तियों को भी गोया एक सुनहरा अवसर हाथ लग गया है। पाकिस्तान की उलेमा कौंसिल ने ब्रिटिश सरकार के फैसले का जवाब उसी भाषा में देते हुए कुख्यात आतंकवादी तथा 11 सितंबर को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले का जिम्मेदार समझे जाने वाले ओसामा बिन लाडेन को 'सैफुल्लाह' (अल्लाह की तलवार) की उपाधि देने की घोषणा की है। सैफुल्लाह अर्थात् अल्लाह की तलवार पाकिस्तान उलेमा कौंसिल संस्था का सर्वोच्च सम्मान है। संस्था के प्रमुख के अनुसार ओसामा बिन लाडेन इस सम्मान का हकदार इसलिए है क्योंकि वह एक सच्चा मुस्लिम लड़ाका है तथा इस्लामी जेहाद के प्रसार हेतु युद्धरत है।

 

              इसमें कोई संदेह नहीं कि रुश्दी को मिले सम्मान से मुस्लिम जगत आहत हुआ है तथा रुश्दी का उपन्यास सैटेनिक वर्सेज अत्यन्त आपत्तिजनक भी था। परन्तु इसके जवाब में लाडेन को सैफुल्लाह से नवाजा जाना भी कट्टरपंथी एवं आतंकवादी सोच को प्रदर्शित करता है। यदि रुश्दी की लेखनी ईश निंदा कही जाने योग्य है तो लाडेन का कृत भी कोई कम इस्लाम विरोधी नहीं। आज पाकिस्तान का अफगानिस्तान से लगता सीमांत क्षेत्र हो, अफगानिस्तान हो या इराक, इन सभी स्थानों पर मुसलमानों पर आए दिन जो बर्बरतापूर्ण हमले नाटो देशों की सेनाओं अथवा अमेरिकी गठबंधन सेनाओं द्वारा किए जा रहे हैं इसकी जिम्मेदारी की जड़ अकेले ओसामा बिन लाडेन व उसका इस्लाम विरोधी रहस्यमयी संगठन अलकायदा ही है। सैफुल्लाह (खुदा की तलवार) आतंक व अत्याचार का पर्याय हरगिज नहीं हो सकती। सैफुल्लाह का धारक गुफाओं व कंदराओं में छिपने वाला कोई बुजदिल नायक नहीं हो सकता। ओसामा बिन लाडेन ने इस्लाम को सलमान रुश्दी से कहीं अधिक आहत किया है। आज इस्लाम को आतंक के नाम से जोड़कर देखे जाने की एकमात्र वजह ओसामा बिन लाडेन ही है। ऐसे व्यक्ति को सैफुल्लाह कहना अल्लाह की तौहीन करना है। बेहतर होता कि सलमान रुश्दी की निंदा करने वाले तथा उसे इस्लाम विरोधी समझने वाले लोग धर्मान्धता से अलग हटकर ओसामा बिन लाडेन के कारनामों पर भी नज़र डालते। यदि ऐसा होता तो ओसामा बिन लाडेन को सैफुल्लाह नहीं बल्कि लानतुल्लाह की (भर्त्सना योग्य) उपाधि से नवाजा गया होता।

    तनवीर जाफ़री

(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

 22402, नाहन हाऊस अम्बाला शहर। हरियाणा

 

 

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