विश्वरंजन की तीन कविताएँ
अँधेरे से लड़ने के लिए स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है
अधखुली खिड़की से झाँकता अंधेरा
टेबूल पर भूल से बैठी है लैम्प की रोशनी
सिकुड़ा गोल छोटा पीला सूरज हो जैसे
खुली किताब फड़फड़ाते पन्ने

कोई नहीं है आज यहाँ
क्यों ?
शाम सूर्य छुप जाएगा
हृदय के काले आकाश में
घास पीली हो जाएगी आखिरी रोशनी में
पत्ते मरणासन्न बयान देंगे शायद
हवा भारी हो झाँकेगी अधखुली खिड़की से
टेबुल पर बिछ जाएगी लैम्प की रोशनी
खुली किताब के पन्न फड़फड़ायेंगे बस
लगता है यहाँ कभी कुछ नहीं होगा
यह सब जानते हुए भी
मैं नहीं मानूँगा हार
अपनी बच्चियों को परी-कथा सुनाऊँगा मैं
उन्हें परिस्तानों की सैर कराऊँगा
उन्हें नई रोशनी दिखाऊँगा
नए फूलों का हुजूम
बैठाऊँगा मन में उनके
एक बिलकुल नए शहर
की नींव डालूँगा उनके अंदर
स्वप्न पैदा करूँगा उनकी आँखों में
मैं जानता हूँ
अंधेरे से लड़ने के लिए
एक नए स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है
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