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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   समकालीन कविता

 

विश्वरंजन की तीन कविताएँ

 

अँधेरे से लड़ने के लिए स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है

अधखुली खिड़की से झाँकता अंधेरा

टेबूल पर भूल से बैठी है लैम्प की रोशनी

सिकुड़ा गोल छोटा पीला सूरज हो जैसे

खुली किताब फड़फड़ाते पन्ने

कोई नहीं है आज यहाँ

क्यों ?

 

शाम सूर्य छुप जाएगा

हृदय के काले आकाश में

घास पीली हो जाएगी आखिरी रोशनी में

पत्ते मरणासन्न बयान देंगे शायद

हवा भारी हो झाँकेगी अधखुली खिड़की से

टेबुल पर बिछ जाएगी लैम्प की रोशनी

खुली किताब के पन्न फड़फड़ायेंगे बस

लगता है यहाँ कभी कुछ नहीं होगा

 

यह सब जानते हुए भी

मैं नहीं मानूँगा हार

अपनी बच्चियों को परी-कथा सुनाऊँगा मैं

उन्हें परिस्तानों की सैर कराऊँगा

उन्हें नई रोशनी दिखाऊँगा

नए फूलों का हुजूम

बैठाऊँगा मन में उनके

एक बिलकुल नए शहर

की नींव डालूँगा उनके अंदर

स्वप्न पैदा करूँगा उनकी आँखों में

 

मैं जानता हूँ

अंधेरे से लड़ने के लिए

एक नए स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है

  

 

 

विश्वरंजन

जन्म

1 अप्रैल, 1952, गया बिहार

(फ़िराक गोरखपुरी के नाती)

शिक्षा

स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)

कृतियाँ

'स्वप्न का होना बेहद ज़रुरी है' (पहला कविता संग्रह) प्रकाशित । दूसरी कविता संग्रह एवं पहला उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य । साहित्य, समाज एवं विचार पर चिंतनपरख लेख प्रकाशित । चित्रकारी में भी सक्रिय ।

संप्रति

पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ शासन

रायपुर, छत्तीसगढ़

 

कविताएँ

- बड़ा स्वप्न

- भारत माता की जय

- अँधेरे से लड़ने के लिए

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