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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   समकालीन कविता

 

विश्वरंजन की तीन कविताएँ

 

भारत माता की जय

मेरा मन है आप को मार डालूँ

मेरे पास छुरा है

मेरे पास धर्म है

आपके पास भी है

पर वह मेरा धर्म नहीं है

और मेरे पास छुरा है लंबा-सा

आपके पास भी है

पर मेरा ज्यादा लंबा है

मैं आपको आसानी से मार सकता हूँ

आप नहीं

आप कम भी है

हम ज्यादा भी

 

किसी के बाप का क्या जाता है

मेरा मन है आपको मारने का

मुझे लाल रंग पसंद है

और आपका खून लाल रंग का है

और आपका धर्म भी दूसरा है

मैं आपकी बीवी को चीर कर रख दूँगा

मुझे अच्छा लगेगा

आप बच गये तो दूसरी शादी रचा लेना

मुझे आग भी पसंद है

मेरे पास दियासलाई भी है

आपका घर भी है

बगल में पेट्रोल पंप

और फिर आपका धर्म भी अलग है

और यदि खुदा-ना-खास्ता आप बच जायें

आपकी पत्नी बच जाये

आपका घर बच जाये

तो हम आपके घर ज़रूर आयेंगे

चाय पीयेंगे

भजिया खायेंगे

गप्पे उड़ायेंगे

टंडन जी की लड़की को वह ले उड़ा

बातें करेंगे

हम हिंदुस्तानी है

भारतवासी हैं

भाई-भाई हैं

आपके घर मेरा आना भला किसी को क्यों बुरा लगेगा

अब हम विश्व शांति के लिए दो मिनट का मौन रखेंगे

भारत माता की जय !

भारत माता की जय ! !

 

 

 

विश्वरंजन

जन्म

1 अप्रैल, 1952, गया बिहार

(फ़िराक गोरखपुरी के नाती)

शिक्षा

स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)

कृतियाँ

'स्वप्न का होना बेहद ज़रुरी है' (पहला कविता संग्रह) प्रकाशित । दूसरी कविता संग्रह एवं पहला उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य । साहित्य, समाज एवं विचार पर चिंतनपरख लेख प्रकाशित । चित्रकारी में भी सक्रिय ।

संप्रति

पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ शासन

रायपुर, छत्तीसगढ़

 

कविताएँ

- बड़ा स्वप्न

- भारत माता की जय

- अँधेरे से लड़ने के लिए

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