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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   समकालीन कविता

 

विश्वरंजन की तीन कविताएँ

 

बड़ा स्वप्न

वह कहता है बड़े स्वप्न देखो

चार आने में तो आज

मूँगफली भी नहीं मिलती

सौ रुपए में तो लड़की बेज दी जाती है

 

हम एक लड़की से भी बड़ा स्वप्न देखेंगे

एक भरी पूरी औरत का स्वप्न

उसके अधिकारों का स्वप्न

उसकी अस्मिता का स्वप्न

 

और रोज़ अल-सुबह

बेच आयेंगे इन स्वप्नों को

हकीकतों की मंडी में

 

 

विश्वरंजन

जन्म

1 अप्रैल, 1952, गया बिहार

(फ़िराक गोरखपुरी के नाती)

शिक्षा

स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)

कृतियाँ

'स्वप्न का होना बेहद ज़रुरी है' (पहला कविता संग्रह) प्रकाशित । दूसरी कविता संग्रह एवं पहला उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य । साहित्य, समाज एवं विचार पर चिंतनपरख लेख प्रकाशित । चित्रकारी में भी सक्रिय ।

संप्रति

पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ शासन

रायपुर, छत्तीसगढ़

 

कविताएँ

- बड़ा स्वप्न

- भारत माता की जय

- अँधेरे से लड़ने के लिए

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