पहाड़ की चार कविताएँ
सब हैं अज़नबी
कविता पूछती है मुझसे
सच बताना
मेरे कविमित्र
मुझे गढ़ने वाले
कहने वाले
क्या जैसा तुम लिखते हो
जैसा तुम दिखते हो
सचमुच में तुम वैसे ही हो
कविता का यह प्रश्न
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मेरी आत्मा को झिंझोड़ता मेरे अंदर के मानव को नंगा कर देता है तब मैं और मेरा कविरूप कितना विरोधाभास लिये होते हैं मैं ही जानता हूँ
मेरे लिखे शब्द मेरा मुँह चिढ़ाते हैं कहते हैं कविता और मैं का अंतर कब मिटेगा
और तब कविता मुझसे विद्रोह करती अपने शब्दों का तेज मुझसे छीनती मुझे ललकारती है कविता से खिलवाड़ कब तक करोगे
कविता नन्हें बच्चे-सा बिदकती आँख मिचौनी खेलती मुझसे दूर भागती चली आती है
और मैं कविता को शब्दों के रूप में सच बटोरता घूमता हूँ झोपडियों,कच्चे-मकानों, नदी नालों मछुआरों-चरवाहों के बीच ढूँढता हूँ अपनी खोई हुई कविता
मैं अपने अंतरमन के मानव को टटोलता ढूँढता हूँ नई कविता जो मेरे अंतरमन की गहराईयों से फूटे जो मेरे खून में रची-बसी हो
हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (सीएसआईआर), पालमपुर हिमाचल प्रदेश - 176061
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