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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

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   कविता

 

पहाड़ की चार कविताएँ

 

पृथ्वी का सुन्दरतम रूप

बर्फ चूप रही है

धरती का चप्पा-चप्पा

लदे पड़े हैं पेड़

अटी-पड़ी है शाखाएं

झाड़-झंखाड़ बर्फ से

पहाड़ों ने पहन लिया है

चांदी का श्वेत मुकुट

आँगन-खेत

 नरेश कुमार उदास

पहाड़

पृथ्वी का सुन्दरतम रूप

सब हैं अजनबी

कविता का विद्रोह

पगडण्डियों पर

पसरी पड़ी है बर्फ

बच्चे खेल रहे हैं मचल रहे हैं

आओ बाहर चलें

छोड़ें यह तकरार

मन-मुटाव की बातें

देखो प्राकृतिक सौन्दर्य

कितना आलौकिक लग रहा है

डूबता सूर्य

चमकते पहाड़

यह बादलों के मचलते झुंड

गगनचुम्बी वृक्ष

नीड़ों को लौटते

यह पक्षियों की अन्तहीन कतारें

डूबती यह साँझ की लालिमा

सब कितना भला-भला लग रहा है

आओ सब भूल जाएं

बस निहारें

पृथ्वी का सुन्दरतम रूप

और मन की सारी कड़वाहट

भूल जाएं

नरेश कुमार उदास

हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान

(सीएसआईआर), पालमपुर

हिमाचल प्रदेश - 176061

 

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