आज जिस तरह अंतरराष्ट्रीय
जगत ने और हमारी गुलाम मानसिकता ने हमारी मातृभाषा हिन्दी को हमारे ही देश में दूसरा दर्जा कर दिया है, उसी तरह महिला और पुरुष के लेखन को परस्पर अलग करके दूसरा दर्जा तीसरा दर्जा नहीं कर सकते। यह एक ऐसा विषय है जो सदियों तक आपके मनोमस्तिष्क के द्वार खटखटाएगा।
कहते हैं कि इस सृष्टि में सबसे पहले आदम और हव्वा आये थे। उन्होंने ही इस सृष्टि का निर्माण किया किन्तु पुरुष चालाक निकला उसने औरत को घर की देहरी के भीतर कर दिया और ख़ुद बाहर हो गया। यही हाल लेखन के क्षेत्र में भी हम देखते हैं किन्तु,हम लेखन में महिला लेखन पुरुष लेखन इस तरह से अलग नहीं कर सकते। लेखन को जाति के अन्दर बांधने की कोशिश व्यर्थ है।
जहां तक महिलाओं के उन्नयन में साहित्य की भूमिका की बात है तो वह साहित्य ही है कि आज हम मैत्रेयी, गार्गी आदि के नाम बड़े ही आदर के साथ लेते हैं। मीरा बाई को हम सब और सारी दुनिया जानती है, अन्यथा वे भी महल के किसी एकान्त कोने में बैठकर रो गाकर अपने जीवन के दिन काट लेतीं जिस तरह अन्य रानियां करतीं थीं। मीरा ने अपनी व्यथा को भक्ति के माध्यम से ही सही दुनिया के आगे लाकर स्वीकारा कि उसके साथ क्या-क्या अत्याचार, प्रताड़ना किया गया । अन्यथा उनका इतिहास दबा रह गया होता हम जान भी नहीं पाते कि कोई मीरा बाई भी थी हमें ज्ञात होता है कि एक महिला ने यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
नारी जो सृजनधर्मी है आज उसने रोती बिलखती नारी की छबि को अपने लेखन के माध्यम से बदला है, लोक गीतों में हम देखते हैं कि वह नारी हमेशा अपने पति का इंतजार कर रही होती है उसके लिये साज श्रृंगार किये बैठी होती है और वह पुरुष या तो परदेस गया होता है या किसी और नारी की बाहों में रंगरलियां कर रहा होता है। साहब, बीवी और गुलाम फिल्म ने इस पीड़ा को बहुत ही र्मािर्मक ढंग से दिखाया है।
नारी व्यथा का एक उदाहरण बड़ा ही अद्भुत है उसमें नारी ने अपनी व्यथा इस प्रकार से व्यक्त की है कि ................... पंछी बाबुल से जा कहियो मेरे जनम पे तो तूने ताली नहीं बजाई मेरे मरने पर ढोलक बजइयो।
नारी ने लेखन की इस विधा में परिवर्तन किया है अब वह रोती कलपती नारी नहीं बल्कि हक से अपना अधिकार मांगती नज़र आती है। ब्रिटिशों के खिलाफ आन्दोलनरत महिलाओं का जिक्र करना भी हम नहीं भल सकते जिन्होंने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया है। इनमें से ताराबाई शिन्दे को हम प्रथम स्त्रीवादी लेखिका कहने में संकोच नहीं कर सकते। 1882 में ताराबाई शिन्दे ने ‘स्त्री पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक लिखकर जो साहस भरा काम किया वह आज भी किसी भारतीय स्त्री के वश की बात नहीं है। गेरॉलडीन फोर्ब्स नामक चिंतक ने तो ताराबाई को अपनी पुस्तक ‘विमेन इन मॉडर्न इंडिया पार्ट 2’ में दुनिया की पहली स्त्रीवादी लेखिका बताया है।
मैडम भीकाजी कामा जिन्होंने वीरसावरकर की पुस्तक ‘फर्स्ट वार ऑफ इंडिपेंडेंस’ अर्थात भारतीय स्वतंत्रता का पहला युद्ध का फ्रेंच में अनुवाद किया ताकि फ्रांस से भारतीयों को मदद मिल सके। आज पार्लियामेंट में उनकी तस्वीर लगी है। दिल्ली में उनके नाम का संग्रहालय है,तथा मुम्बई में उनके नाम सड़क है।
महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान ,अमृता प्रीतम ,शिवानी ,कृप्णा सोबती, पद्मा सचदेव, मृणाल पाण्डे, मृदुला सिन्हा, मालती जोशी आदि कई नाम हैं जिन्होंने साहित्य जगत में एक उंचा मुकाम हासिल किया है। यह अलग बात है कि नारी के मूल्यांकन में समय ज्यादा लगाया जाता है। प्रोत्साहन के अभाव में वे कुंठित हो जाती हैं। चूंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है और इस दर्पण से सच्चाई की तस्वीर समाज के सामने दिखाने में वह पथ प्रदर्शक की भूमिका का निर्वाह करती है, यथार्थ के धरातल पर टिके होते हैं उसके शब्द, फिर भी चूक कहां होती है यह स्वयं उसे पता नहीं।
शब्द नारी की ताकत हैं और हमें इस ताकत को बरकरार रखना है। एक महिला जब अपने अनुभवों को दूरगामी दृप्टि से देखती है दुनिया को करीब पाती और उसे शब्दों में बांधती है एक रचनाकार जो स्त्री है घर की चहारदीवारी में है साहित्य उसे एक पहचान देता है।
कुछ पुरुषों के सहयोग से आ पाती हैं तो कुछ स्वयं ही संघर्ष कर आगे बढ़ती हैं। किन्तु जहां तक मेरा विचार है संघर्षों में तपकर ही सोना कुंदन बनता है।


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