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साहोर से शान्तिनिकेतन

प्रकाशन :गुरूवार, 22 सितम्बर 2011
मदन गोपाल लढ़ा

ह अगस्त माह के दूसरे सप्ताह की एक उमस भरी दोपहर थी जब मैं अपने गांव साहोर यानी महाजन से कवीन्द्र रवीन्द्र की जन्मभूमि जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी व कर्मभूमि शान्तिनिकेतन के लिए रवाना हुआ। जैसी उमस बाहर थी, वैसी ही, या उससे कहीं ज्यादा मेरे मन में भी थी। इसकी वजह थी एक नई जगह, नए परिवेश में, देश भर के विभिन्न अंचलों से आए भारतीय भाषाओं के युवा रचनाकारों से पहली मुलाकात। बीकानेर से हावड़ा एक्सप्रेस से रवाना होने के बाद आगरा निकलते ही झमाझम बारिश ने जहां वातावरण की उमस को मिटाकर मौसम को खुशनुमा बना दिया वहीं देश के युवा कलमकारों के साथ चार दिनों के सार्थक संवाद ने अंतस की व्याकुलता को हर कर शीतल बयार-सा सुकून दिया। लब्बो-लुआब विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के एक सौ पचासवें जयंती वर्ष के अवसर पर साहित्य अकादमी की ओर से भारतीय भाषाओं के युवा रचनाधर्मियों की कविगुरु के जन्मस्थल व कर्मस्थल की यात्रा व ’राईटर्स मीट’ में बतौर राजस्थानी लेखक मेरी भागीदारी एक यादगार अनुभव बन गई।

कोलकाता के हावड़ा स्टेशन पर दस अगस्त के तड़के पोने चार बजे जब मैंने कदम रखा तब बादलों ने रिमझिम से स्वागत किया। बरसात को अच्छा सगुन मानने के मरुस्थलीय संस्कारों के कारण मन में कुछ तसल्ली हुई, जो विश्वकवि के विराट कृतित्व, युवा लेखकों की रचनात्मक ऊर्जा व अकादमी की सुव्यवस्थाओं से पुष्ठ हो गई। सुबह-सवेरे हुगली के किनारे खड़ा होकर विश्व प्रसिद्ध हावड़ा ब्रिज को देर तक ताकता रहा, जिसे देखकर कभी एक ठेठ बीकानेरी ग्रामीण ने महाराजा गंगासिंह का बनाया मानकर कहा था, "वाह गंगा बाबा, क्या पुळ बणायो है!" प्रवासी राजस्थानियों के केंद्र बड़ा बाजार, प्रख्यात ईडन गार्डन होते होते हुए पूर्व नियत चौधरी गेस्ट हाऊस पहुंचा, तब तक दस बज चुके थे। मैं वहां पहुंचने वाला दूसरा लेखक था, मगर दोपहर के भोजन तक बीस से अधिक लोग पहुंच गए। खाने की टेबल पर कन्नड़ के प्रसिद्ध समालोचक जी.के. गोवंदराव व कालेगौड़ा नागवरा , मलयालम के कथाकार सी. अनूप, नेपाली व्यंग्यकार हीरा छेत्री आदि से सामान्य परिचय से जो बात शुरू हुई, वह बाद में भारतीय भाषाओं के समकालीन परिदृश्य पर बहुमुखी संवाद में तब्दील हो गई।

मलयालम में नरीमन पोईण्ट, नेपोलियंट पोचा, इयमेसुम देयवुम, विशुद्धा युद्धम जैसी कथाकृत्तियों के लेखक व त्रिवेन्द्रम के एक दैनिक के रविवारीय परिशिष्ठ के संपादक सी. अनूप ने बताया कि मलयालम का गद्य साहित्य अत्यंत समृद्ध है। वहां कहानी-उपन्यास के साथ निबंध, व्यंग्य, यात्रा वृतांत जैसी विधाओं में भरपूर काम हुआ है। उन्होने बड़े गर्व से बताया कि मलयालम के पांच लेखकों को भारत में साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ से नवाजा जा चुका है। मैं मौन था। यदि मातृभाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाता तो शायद मुझे इस बिंदु पर मौन नहीं रहना पड़ता। मैंने उनको राजस्थानी के गौरवमय अतीत व समृद्ध लोक साहित्य की जानकारी दी। अनूप के अनुसार मलयालम में दो दर्जन से अधिक दैनिक पत्र निकलते हैं, जिनमें से "मलयालम मनोरमा" व "मातृभूमि" की प्रसार संख्या बारह लाख से अधिक है। देर रात सोने तक उनसे गुफ़्तगूं चलती रही।

अगली सुबह नहा-धोकर एवं चाय-नाश्ता लेकर दो दर्जन युवा लेखकों का दल बस से शान्तिनिकेतन के लिए निकला। बस में दार्जीलिंग से पधारे नेपाली लेखक हीरा छेत्री वार्तालाप में शामिल हो गए। छेत्री ने गोरखालेण्ड प्रदेश की मांग की समीक्षा करते हुए बताया कि असल में यह मुद्दा विकास की दौड़ में पिछड़ने का नहीं है बल्कि अपनी जुदा भाषाई पहचान एवं सांस्कृतिक अस्मिता का है। छेत्री ने कवि विचंद्र व मन प्रसाद सुब्बा का जिक्र करते हुए नेपाली कविता के समकालीन स्वरूप से रूबरू करवाया। इस बीच सफ़र में अनौपचारिक रूप से कविता-पाठ का कार्यक्रम शुरू हो गया जिसमें युवा कवियों ने अपनी क्षेत्रीय भाषा में रचनाएं सुनाई। ताज्जुब की बात यह थी कि भाषा से अनजान होने के बावजूद रचनाओं का भाव काफ़ी कुछ संप्रेषित हो रहा था। इस बीच मैथिली की युवा कवयित्री निक्की प्रियदर्शिनी चर्चा में जुड़ गई। विद्यापति की पदावली से प्राप्त मैथिली का परिचय निक्की से आधुनिक भाव बोध से युक्त नई कविताओं से अपडेट हुआ, वहीं उनके मन में अपनी भाषा के प्रति गहरे अनुराग ने ध्यान खींचा।

शान्तिनिकेतन के सुरम्य वातावरण में संग्रहालय व रवीन्द्र भवन में उदयन, उदीचि, कोणार्क, श्यामली व पुनश्च नामक छोटे-छोटे घरों को घूम- घूम कर दे्खा, जहां महाकवि रवीन्द्र ने लम्बा वक्त गुजारा, गीतांजलि सरीखी कविताएं रचीं व सैंकड़ों चित्र बनाए। शान्तिनिकेतन के परिवेश में एक खास किस्म की शान्ति व पावनता महसूस हुई। प्रकृति के साथ कवि का घरोपा था। वहां चारों तरफ़ हरियाली है। पंक्षियों का कलरव है। बादलों की ओट से झांकते सूर्यनारायण हैं। मंद शीतल बयार हैं। इसी माहौल में वर्षों पहले कवि की वाणी फ़ूटी- "एई तो तोमार प्रेम ओगो/ हृदय हरण/ एइजे जताय आलो वाचे/ सोनार बरम/ एइजे मधुर आलस भरे/ मेघ भैसे जाय आकाश परे/ अमृत क्षरण/ एइ तोमार प्रेम ओगो/ हृदय हरण।" प्रसिद्ध कवि प्रयाग शुक्ल ने कवि की इन पंक्तियों का हिंदी में इस तरह अनुवाद दिया है- "हृदय हरण, ओ हृदय हरण! पात-पात में प्रेम तुम्हारा दिखता स्वर्ण-बदन। नभ में घुमड़ रहे जो घन हैं, वे भी प्रेम भरा ही मन हैं। अरे, हवा से झर-झर पड़ते, उसके ही मधुकण।" रवि बाबू की विरासत विश्वभारती विश्वविद्यालय के अवलोकन के साथ वहां के भाषा व संगीत विभाग की ओर युवा लेखकों का अदिति आटोडोरियम में गरिमामय सम्मान व मधुर रवींद्र संगीत, केरल के कत्थकली नृत्य और मणिपुरी लोक नृत्य से सजी सांस्कृतिक संध्या का आयोजन अनूठा अनुभव रहा।

शान्तिनिकेतन के होटल वसुंधरा में लेखक मंडली फ़िर जमी एवं इस बार संथाली के अनपा मरांडी व कश्मीरी कवि मोहम्मद मजीद मजेजी ने अपनी भाषा की तस्वीर सामने रखी। मरांडी ने अवगत कराया कि संथाली में आदिवासी समाज की परम्परागत संस्कृति के साथ वक्त के साथ आ रहे बदलावों का विश्वसनीय अंकन हुआ है। मजेजी ने कश्मीरी की प्रमुख पत्रिकाओं व पाठ्यक्रम के बारे में बताकर संवाद को आगे बढ़ाया।

अगले दिन यानी बारह अगस्त को उपासना मंदिर में ध्यान के बाद लेखकों की टीम बस द्वारा कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी स्थित कवीन्द्र रवीन्द्र के पैतृक घर पहुंची, जहां महाकवि का जन्म हुआ था। यहां कवि गुरु के जीवन से जुड़े पत्रों पुस्तकों, पांडुलिपियों, वस्त्रों व चित्रों को करीब से देखने का मौका मिला। इसी दिन शाम को साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय कार्यालय के सभागार में अकादमी अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय, चर्चित बांग्ला कवि तरुण सान्याल, तेलुगु लेखिका के. सुनीता रानी व अकादमी के क्षेत्रीय सचिव रामकुमार मुखोपाध्याय के सान्निध्य में युवा रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का हिंदी अथवा अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा।

मैने भी अपनी कविता पुस्तक "म्हारै पांती री चिंतावा" से कुछ कविताओं के अनुवाद सुनाए। इस सत्र के बाद गेस्ट हाउस में फ़िर बैठक जुड़ी, जिसमें सुरिन्दर नीर ने पंजाबी व सुशील बेगाना ने डोगरी साहित्य के बारे में जानकारी दी। अधिकांश लेखक भारतीय भाषाओं के बीच सार्थक संवाद के लिए अनुवाद की जरूरत महसूस कर रहे थे, वहीं कईयों ने अनुवाद की गुणवत्ता से असंतोष जताया। अगले दिन तेरह अगस्त को भी बातों का सिलसिला अपने गंतव्य के लिए अलग-अलग मार्गों व साधनों से प्रस्थान करने तक जारी रहा। रात्रि पौने ग्यारह बजे जोधपुर एक्सप्रेस से घर के लिए रवाना होते वक्त मैं अपने साथ युवा कलमकारों से सार्थक संवाद की ऊर्जा व यादों के रेले को बखूबी महसूस कर रहा था।

  मदन गोपाल लढ़ा
महाजन, बीकानेर, राजस्थान
madanrajasthani@gmail.com
 
         
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