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तुम्हारे हाथ फौरन पहचान जाऊँगा

प्रकाशन :शनिवार, 17 सितम्बर 2011
विनोद भारद्वाज
 हुसैन का जन्म दिन

कबूल फिदा हुसेन के आखिरी दिनों तक जिसमहिला ने उनका साथ दिया उनका नाम है राशदा सिद्दीकी । लखनवी तहजीब की जीती-जागती मिसाल राशदा जनवरी 1977 में हुसेन साहब के निकट संपर्क में आई थीं । पति आर्मी में कर्नल थे । एक बार एनडीटीवी में हुसेन से पूछा गया कि राशदा आपके लिए क्या हैं ? सीधा सा जवाब था हुसेन का-"शी इज माई शक्ति । औरत हमेशा शक्ति का रूप है।"

हाल में ईद से दो दिन पहले दोपहर को मैं राशदा सिद्दीकी से मिलने जाता हूं- उदय पार्क स्थित उनके घर में। राशदा हुसेन के न रहने के "विषाद" से अभी बाहर नहीं आ पाई हैं । बताती हैं इस बार ईद के दिन सेवैयां नहीं बना पाऊंगी । हुसेन राशदा के हाथों से बहुत प्रभावित थे- एक बार अस्सी के दशक में ईद के मौके पर उन्हें पेंट भी किया था । उन हाथों पर मेहंदी भी "आर्टिस्टिक" ढंग से लगाई थी। "फूल नहीं, चिड़ियां वगैरह बनाई थीं ।"

इस साल लंदन में 8 मई को हुसेन राशदा को छोड़ने एयरपोर्ट गए तो अचानक वह बोले, "तुम फूल डालोगी, तो मैं तुम्हारे हाथ फौरन पहचान जाऊंगा ।" राशदा अपने घर की स्टडी में बैठी हुई बहुत भावुक स्वर में कहती हैं, "मुझे एक क्षण लगा समझने में कि हुसेन साहब क्या कह रहे हैं।"

एक महीने बाद 8 जून की रात (डेढ़ बजे का वक्त था इसलिए कैलेंडर के हिसाब से 9 जून) को लंदन के अस्तपाल रॉयल ब्रांपटन में हुसेन ने अपनी आखिरी सांस ली । रात आठ बजे राशदा जब विदा ले रही थी तो हुसेन ने इशारों में कान में हाथ रखकर कहा, "सुबह फोन करूंगा लेकिन उन्होंने वायदा नहीं रखा ।"

हुसेन अस्पताल से राशदा को सुबह-सुबह फोन करते थे । उस दिन सुबह फोन नहीं किया था तो राशदा घबरा गई थीं । हुसेन के बेटे ओवेस को फोन किया । हुसेन ने बताया, मैंने सोचा तुम नींद में होगी । 8 जून की शाम को हुसेन बातें कर रहे थे । उनका मन सेवैयां खाने का हो रहा था । ड्राइवर किसी रेस्तरां से सूप और सेवैयां लेकर आया । हुसेन बस उसे थोड़ा सा खा पाए । जिस्म के अंदर ताकत नहीं रह गई थी कुछ खा पाने की । राशदा एक मार्मिक बात बताती हैं, हुसेन साहब को कोई दर्द नहीं था- बस, एक ही दर्द था अपने वतन न जा पाने का । वह भारत को बहुत मिस करते थे । स्मृतियों की गलियों में भटकते रहते थे । एक बार अचानक बोले-"क्या मैं कराची चले जाऊं ? मुंबई से बहुत मिलता-जुलता है ।"

राशदा के अनुसार हुसेन ने अपने अंतिम वर्षों में जैसे किसी जुनून में पेंट किया। तीन-तीन बजे रात को उठकर पेंट करने लगते थे । आठ-नौ बजे सुबह तक पेंट करते रहते थे । "सच तो यह है कि जब उनका स्वास्थ्य बेहतर था तो भी वह इतना पेंट नहीं करते थे ।" दुबई में 12-14 फुट लंबी रामायण श्रृंखला की एक पेंटिंग पर झुक-झुक कर काम किया । दुबई में मार्च में ही पहला हार्ट अटैक हो गया था जिसे वक्त पर पहचाना नहीं जा सका था ।

एक पेंटिंग जो अधूरी रह गई थी उसके बारे में वह अपने चित्रकार बेटे शमशाद से बोले, "खाली अच्छी नहीं लग रही है । कलर करो ।"

राशदा के अनुसार "लक्ष्मी मित्तल के लिए भारतीय सभ्यता के इतिहास पर जो वह महत्वाकांक्षी चित्र श्रृंखला पर काम कर रहे थे उसकी 20-24 पेंटिंग उन्होंने बना ली थीं । "पर शायद उस श्रृंखला का कोई अंत ही नहीं था । 200 पेंटिंग भी बना लेते, तो भी शायद अंत न आता । इतनी समृद्ध है भारतीय सभ्यता ...।"

राशदा बताती हैं, "हुसेन साहब की एक खास बात यह भी थी कि उनके कलेक्टर उनके पारिवारिक दोस्त बन जाते थे । वह उनके घर जाते थे, साथ बैठते थे, उनके बच्चों को गोद में बैठा लेते थे । पर दुबई या दोहा के किसी मॉल में जब मजदूर वर्ग के भारतीय हुसेन के साथ फोटो खिंचवा कर खुश होते थे तो उन्हें बहुत अच्छा लगता था ।"

पचास के दशक में " प्राग में एक चेक लड़की मारिया के "प्रेम" में हुसेन उन्हें अपनी पूरी प्रदर्शनी भेंट में दे आए थे । मारिया वृद्धावस्था में आस्ट्रेलिया में इन पेंटिंग के साथ एक सादे से घर में रह रही थीं । उस घर में टेलीविजन भी नहीं था। फर्नीचर भी हाथ का बनाया हुआ । मारिया को मालूम था कि इन पेंटिंग की आज बहुत कीमत है । पर उन्होंने वे चित्र हुसेन को वापस कर दिए । लंदन के चौधरी परिवार ने ये चित्र खरीद लिए और अब इस संग्रह की पुस्तक आ रही है । राशदा ने इन चित्रों की व्याख्या की है । दुबई के लाल रंग के एक फ्लैट में जब वे चित्र थे तो हुसेन उस जगह को "रेड लाइट म्यूजियम" कहते थे । लाल रंग हुसेन का प्रिय रंग था । कार्पेट, पर्दे वगैरह सभी लाल थे । लाली तेरे लाल की जित देखूं तित लाल ....।

  विनोद भारद्वाज
नई दिल्ली-110017
bhardwajvinodk@gmail.com
 
         
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